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क्या कांग्रेस के तुष्टीकरण और जिन्ना की राजनीति ने वंदे मातरम को विवाद का मुद्दा बना दिया?

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क्या कांग्रेस के तुष्टीकरण और जिन्ना की राजनीति ने वंदे मातरम को विवाद का मुद्दा बना दिया?

सारांश

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वंदे मातरम के 150 वर्ष पर चर्चा करते हुए कांग्रेस और जिन्ना के बीच की राजनीति पर सवाल उठाए। क्या यह तुष्टीकरण और विभाजन की राजनीति ने वंदे मातरम को विवाद का मुद्दा बना दिया?

मुख्य बातें

वंदे मातरम का महत्व केवल एक गीत तक सीमित नहीं है।
कांग्रेस की तुष्टीकरण राजनीति ने इसे विवादित किया।
जिन्ना ने इसे सांप्रदायिक रंग दिया।
हमें अपने राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा करनी चाहिए।
ऐतिहासिक भूलों से सीखकर आगे बढ़ना जरूरी है।

लखनऊ, 22 दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को सीधे तौर पर भारत के सांस्कृतिक विभाजन और अंततः देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया।

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम पर किया गया समझौता किसी धार्मिक भावना का सम्मान नहीं, बल्कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का पहला, सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक प्रयोग था, जिसने अलगाववाद को जन्म दिया। जब तक मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस में थे, तब तक वंदे मातरम कोई विवाद नहीं था। कांग्रेस छोड़ते ही जिन्ना ने इस राष्ट्रगीत को मुस्लिम लीग की राजनीति का औजार बनाया और जानबूझकर इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। गीत वही रहा, लेकिन एजेंडा बदल गया।

सीएम योगी ने कहा कि 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ से जिन्ना ने वंदे मातरम के विरुद्ध नारा बुलंद किया, जबकि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसके तुरंत बाद 20 अक्टूबर 1937 को नेहरू द्वारा सुभाष चंद्र बोस को लिखा गया पत्र, जिसमें कहा गया कि यह मुद्दा मुसलमानों को 'आशंकित' कर रहा है, कांग्रेस के तुष्टीकरण की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है। 26 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ अंश हटाने का निर्णय लिया, जिसे उस समय 'सद्भाव' कहा गया, लेकिन वास्तव में यह राष्ट्र चेतना की बलि थी। देशभक्तों ने इसका विरोध किया, प्रभात फेरियां निकाली गईं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्र के साथ खड़ा होने की बजाय वोट बैंक के साथ खड़ा हो गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने मांग की कि वंदे मातरम पूरा बदला जाए, लेकिन कांग्रेस ने प्रतिकार नहीं किया। परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का साहस बढ़ता गया, अलगाववाद की धार तेज हुई और सांस्कृतिक प्रतीकों पर पहला समझौता हुआ, जिसने अंततः भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन की नींव रखी। वंदे मातरम का विरोध न तो धार्मिक था और न ही आस्था से जुड़ा, बल्कि यह पूरी तरह राजनीतिक था। उन्होंने याद दिलाया कि 1896 से 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन में वंदे मातरम गाया जाता रहा। न कोई फतवा था, न कोई धार्मिक विवाद। खिलाफत आंदोलन तक भी यह गीत हर मंच से गूंजता था। मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता इसके समर्थक थे। समस्या मजहब को नहीं, बल्कि कुछ लोगों की राजनीति को थी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जौहर ने पहली बार वंदे मातरम का विरोध किया। यह विरोध धार्मिक नहीं, बल्कि खिलाफत की राजनीति से प्रेरित था। जब विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा गीत गाया तो जौहर मंच छोड़कर चले गए। मंच छोड़ना उनका व्यक्तिगत निर्णय था, लेकिन कांग्रेस का झुकना उसकी नीति बन गई। इसके बाद कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की बजाय समितियां बनाईं और अंततः 1937 में फैसला हुआ कि केवल दो छंद गाए जाएंगे और वह भी अनिवार्य नहीं होंगे। इसे उन्होंने राष्ट्रीय आत्मसमर्पण बताया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा जिस खंडित वंदे मातरम को मान्यता दी गई, वह भी कांग्रेस की इसी तुष्टीकरण नीति का परिणाम था। राष्ट्र ने गीत को अपनाया, लेकिन कांग्रेस पहले ही उसे काट चुकी थी। वंदे मातरम केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, यह प्रभात फेरियों, सत्याग्रहों और क्रांतिकारियों की अंतिम सांस तक का मंत्र रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे भारत की आत्मा, अरविंद घोष ने इसे मंत्र कहा। मैडम भीकाजी कामा द्वारा फहराए गए पहले विदेशी तिरंगे पर वंदे मातरम लिखा था, मदानलाल ढींगरा के अंतिम शब्द भी वंदे मातरम थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम के साथ किया गया समझौता केवल गीत का अपमान नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय दिशा पर किया गया क्रूर प्रहार था। उन्होंने चेतावनी दी कि आज भी कुछ राजनीतिक शक्तियां उसी विभाजनकारी सोच को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं। तब राष्ट्रगीत को निशाना बनाया गया था, आज राष्ट्रभाव को कमजोर करने की कोशिश हो रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम का अर्थ केवल मातृभूमि को प्रणाम करना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा, समृद्धि और गौरव का संकल्प लेना है। तुष्टीकरण की ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर ही श्रेष्ठ, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव है। उन्होंने सदन से आह्वान किया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंद मठ’ का अध्ययन कर राष्ट्र चेतना को समझा जाए और वंदे मातरम के 150 वर्ष को भविष्य के संकल्प के रूप में अपनाया जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि राष्ट्र की पहचान और एकता का है। कांग्रेस और जिन्ना की राजनीति ने इसे एक सांस्कृतिक संघर्ष में बदल दिया। हमें इस पर गहराई से विचार करना चाहिए।
RashtraPress
27 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या वंदे मातरम विवाद का विषय है?
हां, कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना की राजनीति ने इसे विवादित बना दिया है।
क्या वंदे मातरम केवल एक गीत है?
यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है।
क्यों वंदे मातरम का विरोध हुआ?
विपक्षी राजनीति और धार्मिक तुष्टीकरण के कारण इसका विरोध हुआ।
क्या वंदे मातरम का महत्व आज भी है?
बिल्कुल, यह आज भी हमारे राष्ट्रीय विचार और पहचान का हिस्सा है।
क्या यह मुद्दा राजनीतिक है?
हां, यह पूरी तरह से राजनीतिक और सांस्कृतिक है।
राष्ट्र प्रेस
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