क्या दही चीनी के बहाने शेखर कपूर ने पूछा ह्यूमन इंटेलिजेंस से जुड़ा सवाल?
सारांश
Key Takeaways
- दही चीनी की परंपरा का वैज्ञानिक महत्व है।
- दिल और दिमाग के बीच एक जटिल संबंध है।
- हमारी ह्यूमन इंटेलिजेंस केवल दिमाग में नहीं, बल्कि माइक्रोबायोम में भी हो सकती है।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा में हमें असली बुद्धि को समझना चाहिए।
- शेखर कपूर के विचार हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।
मुंबई, 29 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। फिल्म निर्देशक शेखर कपूर अक्सर सोशल मीडिया पर विचारों से भरे पोस्ट करते हैं, और इस बार उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उन्होंने दादी-नानी के समय की दही चीनी की पुरानी परंपरा का जिक्र करते हुए पूछा कि असली ह्यूमन इंटेलिजेंस कहां है?
इंस्टाग्राम पर शेखर कपूर ने एक तस्वीर के साथ अपनी दादी द्वारा बताई गई पुरानी परंपरा ‘दही-चीनी’ को मॉडर्न साइंस और ह्यूमन इंटेलिजेंस से जोड़ा। उन्होंने लिखा, "बचपन में परीक्षा से पहले मेरी दादी मुझे एक चम्मच दही-चीनी देती थीं। उस समय मेरे दोस्त मुझ पर और मैं खुद दादी पर हंसता था कि क्या यह खाने से मैं पास हो जाऊंगा। हम इसे मजाक समझते थे, लेकिन आज मेडिकल साइंस कहता है कि हमारा पेट भी एक तरह का ‘दूसरा दिमाग’ (गट ब्रेन) है। इसे ‘गट फीलिंग’ या गट इंट्यूशन कहा जाता है।"
निर्देशक ने आगे सवाल उठाते हुए कहा, "जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बात करते हैं तो मान लेते हैं कि सारी बुद्धि सिर्फ दिमाग में होती है, लेकिन सच क्या है? उन्होंने बताया कि दिल और दिमाग के बीच संदेश भेजने वाली वेगस नर्व दिल से दिमाग की ओर ज्यादा जानकारी भेजती है, न कि उल्टा। जब दिल तेज धड़कता है तो क्या दिमाग दिल को प्यार का आदेश देता है या दिल दिमाग को बताता है कि प्यार हो गया?"
शेखर कपूर यहीं नहीं रुके। उन्होंने लिखा, "हमारे शरीर की लगभग 80 प्रतिशत कोशिकाएं तो बैक्टीरिया, वायरस और माइक्रोबायोम की हैं। ऐसे में सवाल यह है कि असल में ‘ह्यूमन’ हिस्सा कौन सा है? क्या हमारी बुद्धि, हमारा सहज ज्ञान और हमारी भावनाएं हमारे माइक्रोबायोम में भी छिपी हो सकती हैं?"
पोस्ट के अंत में शेखर कपूर ने सवाल करते हुए कहा, “जब पूरी दुनिया में यह बहस चल रही है कि कहीं एआई इंसानी बुद्धि पर हावी न हो जाए, तो क्या हमें पहले यह समझना नहीं चाहिए कि असली ह्यूमन इंटेलिजेंस है क्या और वह रहती कहां है?”