क्या न्यायाधीश राजनीति में आएंगे तो उनकी आलोचना होगी? दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस.एन. ढींगरा का बयान

सारांश
Key Takeaways
- न्यायाधीश का राजनीति में आना उनके इतिहास की जांच को आवश्यक बनाता है।
- जनता का अधिकार है कि वे राजनीतिक व्यक्तियों के इतिहास को जानें।
- न्यायिक स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 27 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस.एन. ढींगरा ने 56 पूर्व न्यायाधीशों द्वारा जारी किए गए बयान पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि जब कोई न्यायाधीश राजनीति में प्रवेश करता है, तो वह एक राजनीतिक व्यक्ति बन जाता है और उसका पूर्व इतिहास जानना जनता का अधिकार है।
जस्टिस एस.एन. ढींगरा ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत करते हुए कहा, "जब एक न्यायाधीश राजनीति में आता है, तो वह एक राजनीतिक व्यक्ति बनता है। एक राजनीतिक व्यक्ति की पृष्ठभूमि और इतिहास को जानना, समझना और उसकी जांच करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आपको भारत का उपराष्ट्रपति चुनना है, जो कई जिम्मेदारियों का बोझ उठाता है। यदि आप उनके इतिहास के बारे में नहीं जानते हैं, तो आप किस आधार पर वोट देंगे? इसलिए उनका इतिहास जानना बेहद महत्वपूर्ण है।"
उन्होंने जोड़ा, "एक न्यायाधीश का इतिहास उनके द्वारा दिए गए निर्णयों से स्पष्ट होता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनके लंबे कार्यकाल के दौरान क्या वे अपराधियों के पक्ष में रहे, खालिस्तान समर्थक या नक्सली समर्थक रहे, ये बातें उनके निर्णयों में झलकती हैं। न्यायाधीश का निर्णय उनके विचारों को दर्शाता है और उनके विचार को जनता के समक्ष लाना कर्तव्य है, और यही कर्तव्य गृह मंत्री ने निभाया है।"
जस्टिस ढींगरा ने कहा, "वे किस सुरक्षा की बात कर रहे हैं? न्यायाधीश को सुरक्षा तब तक मिलती है, जब तक वे अपनी कुर्सी पर हैं। फिर भी उनकी व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जाती, बल्कि उनके निर्णयों की समीक्षा होती है। उन्होंने जनता के उस अधिकार को छीन लिया, जिसमें जनता को आत्मरक्षा का अधिकार मिला हुआ था। उन्हें नक्सलियों के मानवाधिकार तो दिखे, लेकिन गांव वालों के अधिकार नजर नहीं आए।"
ज्ञात रहे कि देश के पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लेकर कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताया था।
56 पूर्व न्यायाधीशों ने बयान में कहा था कि कुछ पूर्व न्यायाधीशों द्वारा बार-बार राजनीतिक बयान देना और न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर पक्षपाती रुख अपनाना न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता को क्षति पहुंचा रहा है।