क्या महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार?
सारांश
Key Takeaways
- महाकाल के सामने सभी श्रद्धालु समान हैं।
- गर्भगृह में प्रवेश का निर्णय मंदिर प्रशासन के हाथ में है।
- सुप्रीम कोर्ट ने वीआईपी प्रवेश पर हस्तक्षेप से इंकार किया।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
- मंदिर प्रशासन को नियमों को पारदर्शी तरीके से लागू करना चाहिए।
उज्जैन, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाकाल के समक्ष कोई भी वीआईपी नहीं होता और गर्भगृह में किसका प्रवेश होगा, यह निर्णय मंदिर प्रशासन ही करेगा, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी मांग मंदिर प्रशासन के समक्ष रखें। कोर्ट ने कहा, “महाकाल के सामने सभी समान हैं, कोई विशेष दर्जा नहीं होता। गर्भगृह में प्रवेश के नियम निर्धारित करने का अधिकार मंदिर समिति और जिला प्रशासन के पास है, अदालत इस मामले में क्यों हस्तक्षेप करे?”
याचिकाकर्ता का आरोप था कि गर्भगृह में सामान्य श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश पिछले ढाई वर्षों से बंद है, जबकि इस दौरान वीआईपी और प्रभावशाली लोगों को नियमों का उल्लंघन कर अंदर जाने की अनुमति दी जाती है। उनका कहना था कि यह नियम संविधान के समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता है।
इससे पहले अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भी इसी तरह की याचिका खारिज की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि गर्भगृह में प्रवेश का निर्णय उज्जैन के जिला कलेक्टर और महाकाल मंदिर प्रशासक को ही करना है, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
महाकाल मंदिर में कोरोना काल के बाद से गर्भगृह में आम दर्शन बंद हैं। श्रद्धालु बाहरी क्षेत्र से ही भगवान महाकाल का दर्शन कर पाते हैं। हालांकि कई बार वीआईपी नेता और प्रभावशाली व्यक्तियों को विशेष अनुमति से गर्भगृह में प्रवेश की खबरें सामने आती रही हैं, जिससे आम भक्तों में नाराजगी बनी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब याचिकाकर्ता को मंदिर प्रशासन से बातचीत करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों के आंतरिक नियमों और प्रबंधन में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। इस फैसले से मंदिर प्रशासन पर दबाव बढ़ सकता है कि वह नियमों को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू करे।