महिलाओं की भागीदारी: विकसित भारत की नींव
सारांश
Key Takeaways
- महिलाओं की भागीदारी विकास के लिए आवश्यक है।
- सशक्तिकरण के लिए कानूनी और मानसिकता में बदलाव जरूरी है।
- सरकार की योजनाएं महिलाओं के जीवन में बदलाव ला रही हैं।
- महिलाओं का आर्थिक योगदान पहचान की आवश्यकता है।
- सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन हो रहा है।
नई दिल्ली, 26 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली में चिंतन रिसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम 'सशक्त नारी, विकसित भारत' का मुख्य फोकस महिलाओं के अधिकारों और उनकी सक्रिय भागीदारी पर रहा। इस कार्यक्रम में विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी चर्चा की गई। इसमें नीति, कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सिनेमा से जुड़े कई प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें रक्षा मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव दीप्ति मोहिल चावला, पूर्व भारतीय उच्चायुक्त वीना सीकरी, और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि शामिल थीं। सभी ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत करते हुए अपने विचार साझा किए।
रक्षा मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव दीप्ति मोहिल चावला ने कहा, ''विकसित भारत 2047 का सपना तभी पूरा होगा, जब महिलाएं वास्तव में सशक्त हों। महिला सशक्तिकरण के लिए तीन महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। पहला, भारत का मजबूत संवैधानिक और कानूनी ढांचा, जो महिलाओं को समानता, समान अवसर और सुरक्षा देता है। दूसरा, प्रतिबद्ध नेतृत्व, जिसने ग्रामीण स्तर से लेकर राजनीतिक भागीदारी तक महिलाओं को आगे बढ़ाने वाली योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक शक्ति... वह सामाजिक परिवर्तन, जिसके चलते महिलाएं आज रक्षा क्षेत्र में सक्रिय भूमिकाएं निभा रही हैं और न्यायपालिका सहित अन्य क्षेत्रों में नेतृत्व कर रही हैं। यह परिवर्तन अभी समाज के हर स्तर तक नहीं पहुंचा है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।''
पूर्व भारतीय उच्चायुक्त वीना सीकरी ने ऐसे कार्यक्रमों को ज़रूरत बताया। उन्होंने कहा, "अगर विकास की प्रक्रिया में महिलाओं को पीछे छोड़ दिया जाए तो कोई भी विकास स्थायी नहीं हो सकता। सरकार की 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'उज्ज्वला योजना' जैसी पहलों ने महिलाओं के जीवन में बदलाव लाया है। असली चुनौती कानूनों से परे मानसिकता में बदलाव लाना है। आज भी पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करती है, चाहे वे कितनी भी शिक्षित या सफल क्यों न हों। महिलाओं पर हो रही हिंसा उनके आत्मविश्वास और संभावनाओं को कुचल देती है।"
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि ने आर्थिक दृष्टिकोण से महिलाओं की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा, ''महिलाएं अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, लेकिन घरेलू कार्य के रूप में यह योगदान न तो जीडीपी में दिखता है और न ही इसे सामाजिक मान्यता मिलती है। ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो परिवार-अनुकूल हों और महिलाओं के इस अदृश्य श्रम को पहचान दिला सकें। जब तक महिलाओं के योगदान को सही मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक समावेशी विकास अधूरा रहेगा।''