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राधिका आप्टे का बड़ा बयान: 'सेट पर महिलाएं नहीं, पुरुष होते हैं ज़्यादा असुरक्षित'

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राधिका आप्टे का बड़ा बयान: 'सेट पर महिलाएं नहीं, पुरुष होते हैं ज़्यादा असुरक्षित'

सारांश

राधिका आप्टे ने सेट पर महिलाओं के झगड़ने वाली पुरानी धारणा को चुनौती दी और कहा कि असल में पुरुष ज़्यादा असुरक्षित होते हैं। उनकी नई सीरीज़ 'अक्का' — एक महिला-केंद्रित गैंगस्टर कहानी — 30 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर आ रही है।

मुख्य बातें

राधिका आप्टे ने कहा कि फिल्म सेट पर महिलाओं के झगड़ने की धारणा पुरानी और गलत है।
उनके अनुसार, पुरुष महिलाओं से कहीं ज़्यादा असुरक्षित होते हैं; माहौल जेंडर नहीं, आपसी तालमेल से बनता है।
'अक्का' सेट पर कैमरे के सामने और पीछे लगभग बराबर संख्या में पुरुष और महिलाएं थीं।
सीरीज़ 1980 के दशक पर आधारित महिला-केंद्रित गैंगस्टर कथा है, जिसे धर्मराज शेट्टी ने लिखा और निर्देशित किया है।
'अक्का' 30 अक्टूबर 2026 को नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी; कीर्ति सुरेश भी मुख्य भूमिका में हैं।

अभिनेत्री राधिका आप्टे ने अपनी आगामी नेटफ्लिक्स वेब सीरीज़ 'अक्का' की प्रमोशन के दौरान उस बहुप्रचलित धारणा को सिरे से नकार दिया कि फिल्म सेट पर महिला कलाकारों के बीच अक्सर टकराव या झगड़े होते हैं। 26 अक्टूबर 2026 को एक विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि वर्कप्लेस का माहौल जेंडर से नहीं, बल्कि लोगों के आपसी तालमेल से तय होता है।

राधिका का स्पष्ट रुख

राधिका ने बेबाकी से कहा, 'यह बहुत पुरानी धारणा है कि महिलाएं आपस में झगड़ती हैं। मुझे लगता है कि पुरुष महिलाओं से कहीं ज़्यादा असुरक्षित होते हैं।' उन्होंने जोड़ा कि सच में यह मर्द या औरत की बात नहीं है — यह आपसी तालमेल की बात है। आप कुछ लोगों के साथ घुल-मिल जाते हैं और कुछ के साथ नहीं।

'अक्का' सेट का माहौल

अभिनेत्री ने 'अक्का' के सेट के अनुभव को बेहद सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा, 'हमारा सेट वाकई बहुत अच्छा था। सेट पर लगभग बराबर संख्या में पुरुष और महिलाएं थीं। कास्ट में कई महिलाएं थीं और पर्दे के पीछे काम करने वाली टीम में भी कई महिलाएं थीं।' उन्होंने बताया कि इस 'सिस्टरहुड' की भावना ने पूरे माहौल को और अधिक सहज बना दिया।

प्रोफेशनलिज़्म पर ज़ोर

राधिका ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी के साथ घुलने-मिलने का यह अर्थ नहीं कि वह आपका करीबी दोस्त बन जाए — चाहे वह पुरुष हो या महिला। उनके अनुसार, पेशेवर और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने के लिए गहरी दोस्ती अनिवार्य नहीं है।

'अक्का' सीरीज़ के बारे में

वेब सीरीज़ 'अक्का' एक गैंगस्टर कहानी है जिसमें महिलाएं केंद्रीय भूमिका में हैं। यह 1980 के दशक पर आधारित एक काल्पनिक दुनिया में घटती है, जिसे पीढ़ियों से महिलाओं ने बनाया, चलाया और संरक्षित किया है। सीरीज़ को धर्मराज शेट्टी ने लिखा और निर्देशित किया है — यह निर्देशन में उनका डेब्यू है। कीर्ति सुरेश भी इस सीरीज़ में अहम भूमिका में नज़र आएंगी। 'अक्का' 30 अक्टूबर 2026 को नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी।

यह सीरीज़ ऐसे समय में आ रही है जब हिंदी और क्षेत्रीय OTT कंटेंट में महिला-केंद्रित कथाओं की माँग लगातार बढ़ रही है। राधिका और कीर्ति की यह जोड़ी दर्शकों के बीच पहले से ही चर्चा में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि पुरुष कलाकारों की टकरावों को शायद ही इसी नज़रिए से देखा जाता है। 'अक्का' जैसी महिला-केंद्रित OTT कंटेंट की बढ़ती माँग के बीच यह बयान उद्योग के भीतर भी एक ज़रूरी बहस को जन्म देता है — कि 'सिस्टरहुड' को उत्सव की तरह पेश करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है, जबकि पुरुषों के बीच सहयोग को डिफ़ॉल्ट माना जाता है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राधिका आप्टे ने सेट पर झगड़े की धारणा पर क्या कहा?
राधिका आप्टे ने कहा कि यह धारणा पुरानी और गलत है कि महिलाएं सेट पर आपस में झगड़ती हैं। उनके अनुसार पुरुष महिलाओं से कहीं ज़्यादा असुरक्षित होते हैं और वर्कप्लेस का माहौल जेंडर नहीं, आपसी तालमेल पर निर्भर करता है।
वेब सीरीज़ 'अक्का' कब और कहाँ रिलीज़ होगी?
'अक्का' 30 अक्टूबर 2026 को नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी। यह एक महिला-केंद्रित गैंगस्टर कहानी है जो 1980 के दशक पर आधारित है।
'अक्का' में कौन-कौन से कलाकार हैं?
वेब सीरीज़ 'अक्का' में राधिका आप्टे और कीर्ति सुरेश मुख्य भूमिकाओं में हैं। सीरीज़ को धर्मराज शेट्टी ने लिखा और निर्देशित किया है, जो उनका निर्देशन डेब्यू है।
'अक्का' सीरीज़ की कहानी किस पर आधारित है?
'अक्का' 1980 के दशक की एक काल्पनिक दुनिया में घटती है जिसे पीढ़ियों से महिलाओं ने बनाया, चलाया और संरक्षित किया है। यह एक गैंगस्टर कथा है जिसमें महिलाएं केंद्रीय भूमिका में हैं।
राधिका आप्टे ने 'अक्का' के सेट के माहौल को कैसा बताया?
राधिका आप्टे ने 'अक्का' के सेट को बेहद सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि कैमरे के सामने और पीछे दोनों जगह लगभग बराबर संख्या में पुरुष और महिलाएं थीं, और वहाँ एक 'सिस्टरहुड' की भावना थी जिसने माहौल को और सहज बना दिया।
राष्ट्र प्रेस
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