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विजय मर्चेंट: प्रथम श्रेणी में 71.64 की औसत, भारत के 'डॉन ब्रैडमैन' की विरासत

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विजय मर्चेंट: प्रथम श्रेणी में 71.64 की औसत, भारत के 'डॉन ब्रैडमैन' की विरासत

सारांश

71.64 की प्रथम श्रेणी औसत, केवल डॉन ब्रैडमैन से पीछे — विजय मर्चेंट वह बल्लेबाज थे जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध ने 10 साल के अवसर छीन लिए, फिर भी उन्होंने भारतीय क्रिकेट में ऐसी छाप छोड़ी जो आज भी मिटी नहीं।

मुख्य बातें

विजय मर्चेंट का जन्म 12 अक्टूबर 1911 को मुंबई में हुआ; मूल नाम विजय ठाकरसे था।
उन्होंने 150 प्रथम श्रेणी मैचों में 71.64 की औसत से 13,470 रन बनाए — 45 शतक और 52 अर्धशतक सहित।
भारत के लिए 10 टेस्ट मैचों में 47.72 की औसत से 859 रन ; द्वितीय विश्व युद्ध के कारण करीब 10 साल क्रिकेट से दूर रहे।
1937 में विज़डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुने गए; अंग्रेज खिलाड़ी सीबी फ्राई ने उनकी तकनीक की सराहना की।
अंतिम दो टेस्ट में शतक: 128 रन (अगस्त 1946, इंग्लैंड के खिलाफ) और 154 रन (नवंबर 1951, नई दिल्ली)।
27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में निधन; उनके नाम पर 1985-86 से विजय मर्चेंट ट्रॉफी (अंडर-16) खेली जाती है।

भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम इतिहास में विजय मर्चेंट का नाम उन बल्लेबाजों में सर्वोच्च है जिन्होंने अपनी तकनीकी दक्षता से न केवल भारतीय दर्शकों को, बल्कि अंग्रेज खिलाड़ियों और समीक्षकों को भी मंत्रमुग्ध किया। 71.64 की प्रथम श्रेणी बल्लेबाजी औसत के साथ वह सर डॉन ब्रैडमैन के बाद विश्व इतिहास में दूसरे स्थान पर हैं — इसीलिए उन्हें भारत का 'डॉन ब्रैडमैन' कहा जाता है। 27 अक्टूबर 1987 को उनके निधन की पूर्वसंध्या पर यह उस महानायक को श्रद्धांजलि है जिसने सीमित अवसरों में असीमित प्रतिभा का प्रमाण दिया।

जन्म और नाम की अनोखी कहानी

विजय माधवजी मर्चेंट का जन्म 12 अक्टूबर 1911 को मुंबई के एक व्यापारी परिवार में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम 'विजय ठाकरसे' था। बचपन में एक बार उनके अंग्रेज़ी शिक्षक ने उनके पिता का पेशा पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे 'मर्चेंट' यानी व्यापारी हैं। शिक्षक को लगा यही उनका उपनाम है — और इस सहज गलतफहमी से 'विजय मर्चेंट' नाम अस्तित्व में आया, जो आगे चलकर भारतीय क्रिकेट का पर्याय बन गया।

टेस्ट करियर: युद्ध की छाया में दबी प्रतिभा

मर्चेंट ने 22 वर्ष की आयु में भारतीय टेस्ट टीम में जगह बनाई। हालाँकि, महात्मा गांधी के विचारों और देशभक्ति की प्रबल भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भारत के शुरुआती कुछ टेस्ट मैचों में खेलने से इनकार कर दिया था। दिसंबर 1933 में उन्होंने मुंबई में इंग्लैंड के विरुद्ध अपना पहला टेस्ट मैच खेला, जिसमें उन्होंने 23 और 30 रन बनाए।

मर्चेंट का अंतरराष्ट्रीय करियर करीब 18 वर्ष लंबा रहा, किंतु द्वितीय विश्व युद्ध ने उनसे क्रिकेट के लगभग 10 बेशकीमती वर्ष छीन लिए। इस त्रासदी के बावजूद उन्होंने भारत के लिए 10 टेस्ट मैचों में 47.72 की औसत से 859 रन बनाए, जिनमें 3 शतक और 3 अर्धशतक शामिल हैं। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय क्रिकेट बुनियादी ढाँचे की दृष्टि से विश्व क्रिकेट से काफी पीछे था।

प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अद्वितीय औसत

टेस्ट क्रिकेट में सीमित अवसर मिलने के बावजूद घरेलू क्रिकेट में मर्चेंट का प्रदर्शन किसी करिश्मे से कम नहीं था। उन्होंने 150 प्रथम श्रेणी मुकाबलों की 234 पारियों में 71.64 की औसत से 13,470 रन बनाए। उनके नाम 45 शतक और 52 अर्धशतक दर्ज हैं। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सर्वाधिक बल्लेबाजी औसत की सूची में वह केवल डॉन ब्रैडमैन से पीछे हैं — यह तथ्य स्वयं उनकी श्रेष्ठता का प्रमाण है।

तकनीक और विदेशी प्रशंसा

विजय मर्चेंट अपनी निर्दोष तकनीक, सटीक लेट कट और आक्रामक हुक शॉट के लिए विशेष रूप से पहचाने जाते थे। उनकी बल्लेबाजी से प्रभावित होकर प्रसिद्ध अंग्रेज खिलाड़ी सीबी फ्राई ने भी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। 1937 में उन्हें प्रतिष्ठित 'विज़डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर' के सम्मान से नवाजा गया — वह दौर जब किसी भारतीय बल्लेबाज को यह पुरस्कार मिलना असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी।

अंतिम पारियाँ और विरासत

मर्चेंट ने अपने अंतिम दो टेस्ट मैचों में यादगार शतक जड़े। अगस्त 1946 में इंग्लैंड के विरुद्ध उन्होंने 128 रन की पारी खेली, और नवंबर 1951 में नई दिल्ली में 154 रन बनाकर विदाई ली। कंधे की चोट के कारण उन्होंने 1951 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिया। 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए 1985-86 में विजय मर्चेंट ट्रॉफी की स्थापना की गई, जो भारत की प्रमुख अंडर-16 घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता है। आज भी यह ट्रॉफी उस महान बल्लेबाज की याद में युवा पीढ़ी को प्रेरित करती है — एक ऐसी विरासत जो आँकड़ों से परे है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि खोए हुए अवसरों की भी है — द्वितीय विश्व युद्ध ने उनसे वह 10 वर्ष छीन लिए जो शायद उन्हें टेस्ट इतिहास के सर्वकालिक महान बल्लेबाजों की पंक्ति में और ऊपर ले जाते। यह विडंबना है कि जिस खिलाड़ी की प्रथम श्रेणी औसत ब्रैडमैन के बाद सर्वोच्च है, वह मात्र 10 टेस्ट मैच खेल सका। मुख्यधारा की क्रिकेट चर्चाएँ अक्सर उन्हें 'पुराने ज़माने का खिलाड़ी' मानकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं, जबकि उनकी तकनीकी श्रेष्ठता आधुनिक बल्लेबाजी पाठ्यक्रम में भी प्रासंगिक है। विजय मर्चेंट ट्रॉफी एक सांस्थानिक स्मृति है, लेकिन युवा पीढ़ी तक उनकी असली विरासत पहुँचाने के लिए उससे कहीं अधिक की ज़रूरत है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विजय मर्चेंट को भारत का 'डॉन ब्रैडमैन' क्यों कहा जाता है?
विजय मर्चेंट को यह उपाधि उनकी असाधारण प्रथम श्रेणी बल्लेबाजी औसत — 71.64 — के कारण मिली, जो विश्व इतिहास में केवल डॉन ब्रैडमैन के बाद दूसरी सर्वोच्च है। उनकी निर्दोष तकनीक और निरंतरता ने उन्हें ब्रैडमैन की श्रेणी में रखने पर विवश किया।
विजय मर्चेंट ने टेस्ट क्रिकेट में कितने रन बनाए?
विजय मर्चेंट ने भारत के लिए 10 टेस्ट मैचों में 47.72 की औसत से 859 रन बनाए, जिनमें 3 शतक और 3 अर्धशतक शामिल हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण वह करीब 10 वर्षों तक टेस्ट क्रिकेट से दूर रहे, जिससे उनके टेस्ट मैचों की संख्या सीमित रह गई।
विजय मर्चेंट ट्रॉफी क्या है और यह किसके लिए होती है?
विजय मर्चेंट ट्रॉफी भारत में खेली जाने वाली एक प्रमुख अंडर-16 घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता है, जिसकी शुरुआत 1985-86 में हुई थी। यह प्रतियोगिता महान बल्लेबाज विजय मर्चेंट की स्मृति में उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में आयोजित की जाती है।
विजय मर्चेंट का नाम 'मर्चेंट' कैसे पड़ा?
उनका मूल नाम विजय ठाकरसे था। बचपन में एक बार अंग्रेज़ी शिक्षक ने उनके पिता का पेशा पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे 'मर्चेंट' यानी व्यापारी हैं। शिक्षक ने इसे उनका उपनाम समझ लिया और इस गलतफहमी के कारण उनका नाम 'विजय मर्चेंट' पड़ गया।
विजय मर्चेंट का निधन कब और कैसे हुआ?
विजय मर्चेंट का निधन 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से हुआ। इससे पहले कंधे की चोट के कारण उन्होंने 1951 में ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया था।
राष्ट्र प्रेस
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