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विजय मर्चेंट जयंती: जिन्हें न देख पाने का मलाल खुद डॉन ब्रैडमेन को था, 154 रन का रिकॉर्ड आज भी अटूट

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विजय मर्चेंट जयंती: जिन्हें न देख पाने का मलाल खुद डॉन ब्रैडमेन को था, 154 रन का रिकॉर्ड आज भी अटूट

सारांश

एक महान खिलाड़ी जिसे देखने की तड़प खुद ब्रैडमेन को थी — विजय मर्चेंट की कहानी सिर्फ रन और रिकॉर्ड की नहीं, बल्कि देशभक्ति, संघर्ष और विरासत की भी है। 115वीं जयंती पर याद करें उस बल्लेबाज़ को जिसका 154 रन का रिकॉर्ड सात दशक बाद भी भारतीय क्रिकेट में अजेय है।

मुख्य बातें

विजय मर्चेंट का जन्म 12 अक्टूबर 1911 को मुंबई में हुआ था; कल उनकी 115वीं जयंती है।
राष्ट्रीय नेताओं की कैद के विरोध में उन्होंने 1932 के भारत के पहले टेस्ट में खेलने से इनकार किया।
1936 के इंग्लैंड दौरे में 51 की औसत से 1,475 रन बनाकर 1937 में विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुने गए।
154 रन की पारी (कोटला, 1951-52 ) — टेस्ट शतक जड़ने वाले सबसे उम्रदराज भारतीय का रिकॉर्ड आज भी अटूट।
खुद डॉन ब्रैडमेन ने कहा: 'हम विजय मर्चेंट को देखने से चूक गए।' 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में हृदयाघात से निधन; सभी पुरस्कार राशि दिव्यांग जनों को दान की।

भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम इतिहास में विजय मर्चेंट का नाम उन चुनिंदा बल्लेबाजों में आता है जिनकी प्रतिभा ने सात समंदर पार भी धाक जमाई। 12 अक्टूबर 1911 को मुंबई में जन्मे मर्चेंट उस युग के खिलाड़ी थे जब ऑस्ट्रेलिया के महान सर डोनाल्ड ब्रैडमेन की बल्लेबाज़ी से दुनियाभर के गेंदबाज़ थर-थर काँपते थे — और फिर भी उस दौर के जानकार मर्चेंट की तुलना ब्रैडमेन से करते थे। कल उनकी 115वीं जयंती है।

असाधारण पृष्ठभूमि और देशभक्ति का जज्बा

मर्चेंट का पूरा नाम विजयसिंह माधवजी मर्चेंट था। वे मुंबई के एक संपन्न व्यापारिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनका अंतरराष्ट्रीय डेब्यू 1932 में भारत के पहले टेस्ट मैच में हो सकता था, लेकिन उस समय कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं के जेल में बंद होने की वजह से उन्होंने स्वेच्छा से उस ऐतिहासिक मैच से अपना नाम वापस ले लिया। इस देशभक्तिपूर्ण निर्णय की कीमत उन्हें अपने अंतरराष्ट्रीय डेब्यू में एक साल की देरी के रूप में चुकानी पड़ी।

आखिरकार दिसंबर 1933 में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। द्वितीय विश्व युद्ध ने भी उनके करियर को प्रभावित किया — उस दौर में कई अंतरराष्ट्रीय श्रृंखलाएँ बाधित हुईं, जिससे एक महान बल्लेबाज के खाते में जुड़ने वाले और भी शतक अधूरे रह गए।

ब्रैडमेन की तड़प और ऑस्ट्रेलिया न जाने की कहानी

मर्चेंट इंग्लैंड के खिलाफ केवल भारत और इंग्लैंड की धरती पर खेले। ऐसा करने वाले वे ब्रैडमेन के बाद दूसरे खिलाड़ी हैं — एक तथ्य जो उनकी विशिष्टता को रेखांकित करता है। ऑस्ट्रेलिया दौरे का मौका था और ऑस्ट्रेलियाई प्रशंसकों के साथ-साथ स्वयं ब्रैडमेन भी मर्चेंट की बल्लेबाज़ी देखने के लिए उत्सुक थे, लेकिन खराब सेहत ने उन्हें यह दौरा करने से रोक दिया।

इस पर ब्रैडमेन ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था, 'हम विजय मर्चेंट को देखने से चूक गए।' क्रिकेट जगत के महानतम बल्लेबाज़ के मुँह से किसी समकालीन के लिए ऐसे शब्द दुर्लभ थे।

1936 का इंग्लैंड दौरा और विज्डन सम्मान

दाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ ने 1936 के इंग्लैंड दौरे में अपने खेल से इतिहास रच दिया। पूरी सीरीज़ में उन्होंने 51 की औसत से 1,475 रन बनाए — एक ऐसा प्रदर्शन जिसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की साख को नई ऊँचाई दी। इस कारनामे की बदौलत उन्हें 1937 में प्रतिष्ठित विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का सम्मान मिला।

करियर का समापन और अटूट रिकॉर्ड

1951-52 की घरेलू सीरीज़ में इंग्लैंड के खिलाफ नई दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान पर मर्चेंट ने 154 रन की पारी खेली — यह उनका आखिरी टेस्ट मैच था। इस शतक ने उन्हें टेस्ट शतक जड़ने वाला सबसे उम्रदराज भारतीय बल्लेबाज़ बना दिया, और यह रिकॉर्ड आज भी अटूट है।

उसी सीरीज़ में फ़ील्डिंग के दौरान कंधे में आई चोट ने उन्हें क्रिकेट के मैदान को हमेशा के लिए अलविदा कहने पर मजबूर कर दिया। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर 18 वर्षों के लंबे अंतराल में फैला रहा — 10 टेस्ट मैचों की 18 पारियों में 3 शतक और 3 अर्धशतक सहित कुल 859 रन, जिसमें सर्वाधिक स्कोर 154 रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका कद और भी विशाल था — 150 मैचों की 234 पारियों में 45 शतक और 52 अर्धशतक के साथ 13,470 रन, और इसके अलावा 65 विकेट भी।

मैदान के बाहर विरासत: प्रशासक, आवाज़ और परोपकारी

क्रिकेटर के रूप में संन्यास लेने के बाद मर्चेंट ने भारतीय क्रिकेट की सेवा एक प्रशासक के रूप में जारी रखी। 1960 के दशक में वे मुख्य चयनकर्ता बने और उन्होंने सुनील गावस्कर, एकनाथ सोलकर तथा गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे भविष्य के महान खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे एक कुशल लेखक और रेडियो कमेंटेटर भी थे। विविध भारती पर हर रविवार प्रसारित होने वाला उनका कार्यक्रम 'क्रिकेट विद विजय मर्चेंट' लाखों श्रोताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय था। युवा प्रतिभाओं को क्रिकेट की बारीकियाँ सिखाने के लिए वे नियमित रूप से क्रिकेट अकादमियों में जाते थे। अपने सभी पुरस्कारों और सम्मान राशियों को उन्होंने दिव्यांग जनों की भलाई के लिए दान कर दिया। 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में हृदयाघात से उनका निधन हुआ, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनकी विरासत आज भी जीवित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

केवल शिष्टाचार नहीं था — यह उस समय की समग्र क्रिकेट बिरादरी की मान्यता थी। आज जब भारतीय क्रिकेट अपने नायकों को चुनता है, तो मर्चेंट जैसे खिलाड़ी याद दिलाते हैं कि महानता केवल संख्याओं में नहीं, चरित्र में भी होती है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विजय मर्चेंट कौन थे और भारतीय क्रिकेट में उनका क्या योगदान है?
विजय मर्चेंट भारत के सबसे महान शुरुआती बल्लेबाज़ों में से एक थे, जिन्होंने 1933 से 1952 तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला। 10 टेस्ट में 859 रन और 150 प्रथम श्रेणी मैचों में 13,470 रन बनाने वाले मर्चेंट ने भारतीय क्रिकेट को वैश्विक पहचान दिलाई और बाद में सुनील गावस्कर जैसे खिलाड़ियों के चयन में अहम भूमिका निभाई।
डॉन ब्रैडमेन ने विजय मर्चेंट के बारे में क्या कहा था?
खराब सेहत के कारण मर्चेंट ऑस्ट्रेलिया दौरे पर नहीं जा सके, जिस पर ब्रैडमेन ने कहा था, 'हम विजय मर्चेंट को देखने से चूक गए।' यह टिप्पणी इस बात की गवाह है कि क्रिकेट के सर्वकालिक महान खिलाड़ी भी मर्चेंट की बल्लेबाज़ी के क़ायल थे।
विजय मर्चेंट का वह रिकॉर्ड कौन-सा है जो आज भी नहीं टूटा?
1951-52 में दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ अपने अंतिम टेस्ट में मर्चेंट ने 154 रन बनाए। इस पारी ने उन्हें टेस्ट क्रिकेट में शतक बनाने वाला सबसे उम्रदराज भारतीय खिलाड़ी बना दिया, और सात दशक बाद भी यह रिकॉर्ड अटूट है।
विजय मर्चेंट ने 1932 के पहले टेस्ट में क्यों नहीं खेला?
1932 में भारत के पहले टेस्ट के समय कई बड़े राष्ट्रीय नेता जेल में बंद थे। मर्चेंट ने देशभक्ति की भावना से उस ऐतिहासिक मैच में भाग लेने से इनकार कर दिया, जिसके चलते उनका डेब्यू एक साल टलकर दिसंबर 1933 में हुआ।
विजय मर्चेंट का निधन कब और कैसे हुआ?
विजय मर्चेंट का निधन 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में हृदयाघात से हुआ। वे अपने जीवनकाल में क्रिकेट प्रशासक, रेडियो कमेंटेटर और परोपकारी के रूप में भी जाने जाते रहे और उन्होंने अपनी सभी पुरस्कार राशियाँ दिव्यांग जनों की सहायता के लिए दान कर दी थीं।
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