विजय मर्चेंट जयंती: जिन्हें न देख पाने का मलाल खुद डॉन ब्रैडमेन को था, 154 रन का रिकॉर्ड आज भी अटूट
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम इतिहास में विजय मर्चेंट का नाम उन चुनिंदा बल्लेबाजों में आता है जिनकी प्रतिभा ने सात समंदर पार भी धाक जमाई। 12 अक्टूबर 1911 को मुंबई में जन्मे मर्चेंट उस युग के खिलाड़ी थे जब ऑस्ट्रेलिया के महान सर डोनाल्ड ब्रैडमेन की बल्लेबाज़ी से दुनियाभर के गेंदबाज़ थर-थर काँपते थे — और फिर भी उस दौर के जानकार मर्चेंट की तुलना ब्रैडमेन से करते थे। कल उनकी 115वीं जयंती है।
असाधारण पृष्ठभूमि और देशभक्ति का जज्बा
मर्चेंट का पूरा नाम विजयसिंह माधवजी मर्चेंट था। वे मुंबई के एक संपन्न व्यापारिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनका अंतरराष्ट्रीय डेब्यू 1932 में भारत के पहले टेस्ट मैच में हो सकता था, लेकिन उस समय कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं के जेल में बंद होने की वजह से उन्होंने स्वेच्छा से उस ऐतिहासिक मैच से अपना नाम वापस ले लिया। इस देशभक्तिपूर्ण निर्णय की कीमत उन्हें अपने अंतरराष्ट्रीय डेब्यू में एक साल की देरी के रूप में चुकानी पड़ी।
आखिरकार दिसंबर 1933 में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। द्वितीय विश्व युद्ध ने भी उनके करियर को प्रभावित किया — उस दौर में कई अंतरराष्ट्रीय श्रृंखलाएँ बाधित हुईं, जिससे एक महान बल्लेबाज के खाते में जुड़ने वाले और भी शतक अधूरे रह गए।
ब्रैडमेन की तड़प और ऑस्ट्रेलिया न जाने की कहानी
मर्चेंट इंग्लैंड के खिलाफ केवल भारत और इंग्लैंड की धरती पर खेले। ऐसा करने वाले वे ब्रैडमेन के बाद दूसरे खिलाड़ी हैं — एक तथ्य जो उनकी विशिष्टता को रेखांकित करता है। ऑस्ट्रेलिया दौरे का मौका था और ऑस्ट्रेलियाई प्रशंसकों के साथ-साथ स्वयं ब्रैडमेन भी मर्चेंट की बल्लेबाज़ी देखने के लिए उत्सुक थे, लेकिन खराब सेहत ने उन्हें यह दौरा करने से रोक दिया।
इस पर ब्रैडमेन ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था, 'हम विजय मर्चेंट को देखने से चूक गए।' क्रिकेट जगत के महानतम बल्लेबाज़ के मुँह से किसी समकालीन के लिए ऐसे शब्द दुर्लभ थे।
1936 का इंग्लैंड दौरा और विज्डन सम्मान
दाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ ने 1936 के इंग्लैंड दौरे में अपने खेल से इतिहास रच दिया। पूरी सीरीज़ में उन्होंने 51 की औसत से 1,475 रन बनाए — एक ऐसा प्रदर्शन जिसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की साख को नई ऊँचाई दी। इस कारनामे की बदौलत उन्हें 1937 में प्रतिष्ठित विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का सम्मान मिला।
करियर का समापन और अटूट रिकॉर्ड
1951-52 की घरेलू सीरीज़ में इंग्लैंड के खिलाफ नई दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान पर मर्चेंट ने 154 रन की पारी खेली — यह उनका आखिरी टेस्ट मैच था। इस शतक ने उन्हें टेस्ट शतक जड़ने वाला सबसे उम्रदराज भारतीय बल्लेबाज़ बना दिया, और यह रिकॉर्ड आज भी अटूट है।
उसी सीरीज़ में फ़ील्डिंग के दौरान कंधे में आई चोट ने उन्हें क्रिकेट के मैदान को हमेशा के लिए अलविदा कहने पर मजबूर कर दिया। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर 18 वर्षों के लंबे अंतराल में फैला रहा — 10 टेस्ट मैचों की 18 पारियों में 3 शतक और 3 अर्धशतक सहित कुल 859 रन, जिसमें सर्वाधिक स्कोर 154 रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका कद और भी विशाल था — 150 मैचों की 234 पारियों में 45 शतक और 52 अर्धशतक के साथ 13,470 रन, और इसके अलावा 65 विकेट भी।
मैदान के बाहर विरासत: प्रशासक, आवाज़ और परोपकारी
क्रिकेटर के रूप में संन्यास लेने के बाद मर्चेंट ने भारतीय क्रिकेट की सेवा एक प्रशासक के रूप में जारी रखी। 1960 के दशक में वे मुख्य चयनकर्ता बने और उन्होंने सुनील गावस्कर, एकनाथ सोलकर तथा गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे भविष्य के महान खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वे एक कुशल लेखक और रेडियो कमेंटेटर भी थे। विविध भारती पर हर रविवार प्रसारित होने वाला उनका कार्यक्रम 'क्रिकेट विद विजय मर्चेंट' लाखों श्रोताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय था। युवा प्रतिभाओं को क्रिकेट की बारीकियाँ सिखाने के लिए वे नियमित रूप से क्रिकेट अकादमियों में जाते थे। अपने सभी पुरस्कारों और सम्मान राशियों को उन्होंने दिव्यांग जनों की भलाई के लिए दान कर दिया। 27 अक्टूबर 1987 को 76 वर्ष की आयु में हृदयाघात से उनका निधन हुआ, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनकी विरासत आज भी जीवित है।