भारत का ओवरसीज एफडीआई सितंबर 2026 में 14% घटकर $4.34 अरब, RBI डेटा जारी
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के सोमवार को जारी आँकड़ों के अनुसार, भारत का ओवरसीज प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (ओवरसीज एफडीआई) सितंबर 2026 में सालाना आधार पर 14 प्रतिशत गिरकर $4.34 अरब डॉलर रह गया, जो सितंबर 2025 में $5.04 अरब डॉलर था। मासिक आधार पर भी यह गिरावट उल्लेखनीय है — अगस्त 2026 में यह आँकड़ा $6.87 अरब डॉलर पर था।
ओवरसीज एफडीआई क्या होता है
ओवरसीज एफडीआई वह निवेश है जो भारतीय कंपनियाँ किसी विदेशी देश में व्यावसायिक उद्यम स्थापित करने के लिए करती हैं। इसमें इक्विटी निवेश, लोन प्रतिबद्धताएँ और जारी की गई गारंटियाँ शामिल होती हैं। यह आँकड़ा वैश्विक बाज़ार में भारतीय कॉर्पोरेट महत्वाकांक्षा का एक महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है।
इक्विटी में उछाल, लोन और गारंटी में गिरावट
कुल एफडीआई में गिरावट के बावजूद, इक्विटी प्रतिबद्धता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। सितंबर 2026 में भारतीय कंपनियों की इक्विटी प्रतिबद्धता सालाना आधार पर करीब 25 प्रतिशत बढ़कर $3.26 अरब डॉलर हो गई, जो सितंबर 2025 में $2.59 अरब डॉलर थी।
दूसरी ओर, लोन प्रतिबद्धताएँ सितंबर 2026 में सालाना आधार पर घटकर $54.91 करोड़ डॉलर रह गईं, जो सितंबर 2025 में $98.11 करोड़ डॉलर थीं। हालाँकि, मासिक आधार पर इनमें मामूली सुधार हुआ — अगस्त 2026 में यह $47.35 करोड़ डॉलर पर थीं।
इसी तरह, जारी की गई गारंटियाँ सितंबर 2026 में सालाना आधार पर तेज़ी से घटकर $52.82 करोड़ डॉलर रह गईं, जो सितंबर 2025 में $1.47 अरब डॉलर थीं। मासिक रूप से भी यह अगस्त 2026 के $2.29 अरब डॉलर से काफी नीचे आ गईं।
प्रमुख कंपनियों का योगदान
इक्विटी आउटफ्लो में सन फार्मा लैबोरेटरीज का दबदबा रहा, जिसने $1.99 अरब डॉलर का निवेश किया। इसके बाद व्हाइट ओक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट ने $14.6 करोड़ डॉलर और नैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड ने $4.8 करोड़ डॉलर का आउटफ्लो दर्ज किया।
लोन के मामले में, निर्माण कंपनी हाईवे कंस्ट्रक्शंस ने अपनी यूके सहायक कंपनी को $8 करोड़ डॉलर का हस्तांतरण किया। वहीं, पहारपुर कूलिंग टावर्स ने अपनी सिंगापुर सहायक कंपनी को $10.3 करोड़ डॉलर की गारंटी जारी की।
समग्र परिदृश्य और आगे की राह
गौरतलब है कि ओवरसीज एफडीआई में यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब वैश्विक अनिश्चितता और उच्च ब्याज दरों के कारण कॉर्पोरेट विदेशी विस्तार योजनाओं पर दबाव बना हुआ है। इक्विटी निवेश में वृद्धि यह संकेत देती है कि भारतीय कंपनियाँ दीर्घकालिक रणनीतिक हिस्सेदारी को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि अल्पकालिक लोन और गारंटी प्रतिबद्धताओं में सतर्कता बरत रही हैं। आने वाले महीनों में RBI के अगले डेटा से यह स्पष्ट होगा कि यह प्रवृत्ति जारी रहती है या बदलती है।