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भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर पर, वैश्विक गिरावट के बीच मजबूत उछाल: बैंक ऑफ बड़ौदा

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भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर पर, वैश्विक गिरावट के बीच मजबूत उछाल: बैंक ऑफ बड़ौदा

सारांश

जब दुनिया भर में विदेशी निवेश सिकुड़ रहा था, भारतीय कंपनियाँ बाहर की ओर बढ़ रही थीं। वित्त वर्ष 2024 के 25 अरब से वित्त वर्ष 2026 के 47 अरब डॉलर तक — यह सिर्फ रिकवरी नहीं, रणनीतिक बदलाव है। वित्तीय सेवाओं और आईटी की अगुवाई में भारत का वैश्विक विस्तार एक नई आर्थिक महत्वाकांक्षा की कहानी कह रहा है।

मुख्य बातें

भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर पर पहुँचा, जो वित्त वर्ष 2024 में 25 अरब डॉलर था।
गारंटी छोड़कर वित्त वर्ष 2026 में आउटवर्ड एफडीआई 28 अरब डॉलर रहा।
इक्विटी निवेश की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2017 के 31% से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 42% हुई।
सिंगापुर सबसे बड़ा गंतव्य ( 30% हिस्सेदारी); अमेरिका में हिस्सेदारी 9.9% से बढ़कर 13.6% ।
वित्तीय सेवाएँ और आईटी-आधारित क्षेत्र भारतीय आउटवर्ड एफडीआई के प्रमुख चालक।
गिफ्ट सिटी का बढ़ता महत्व और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विस्तार की संभावना भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत।

भारत का आउटवर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (आउटवर्ड एफडीआई) कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में उल्लेखनीय रफ्तार से बढ़ा है — और यह तब हुआ जब वैश्विक स्तर पर विदेशी निवेश प्रवाह में गिरावट दर्ज की जा रही थी। बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा 23 जून 2026 को जारी एक विश्लेषण रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आउटवर्ड एफडीआई में कोविड के बाद एक तीव्र यू-आकार की रिकवरी देखी गई है, जो भारतीय कंपनियों के बढ़ते वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का प्रमाण है।

आँकड़ों में कितनी बड़ी है यह छलाँग

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2024 में 25 अरब डॉलर था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 42 अरब डॉलर हो गया और वित्त वर्ष 2026 में यह आँकड़ा 47 अरब डॉलर तक पहुँच गया। हालाँकि, गारंटी को छोड़कर देखें तो वित्त वर्ष 2026 में यह आँकड़ा 28 अरब डॉलर रहा। सबसे तेज वृद्धि वित्त वर्ष 2025 में दर्ज की गई, जब एक ही वर्ष में निवेश 17 अरब डॉलर बढ़ा।

किन क्षेत्रों और देशों में जा रहा है भारतीय निवेश

बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दिपन्विता मजूमदार ने बताया कि क्षेत्रवार आँकड़ों के अनुसार वित्तीय सेवाएँ भारत के आउटवर्ड एफडीआई में सबसे बड़ी हिस्सेदार हैं। उन्होंने कहा कि यह इस बात का संकेत है कि भारतीय कंपनियाँ पारंपरिक पूँजी-आधारित विनिर्माण की तुलना में ज्ञान-आधारित और आईटी-संबंधित सेवाओं को प्राथमिकता दे रही हैं।

गंतव्य देशों में सिंगापुर की हिस्सेदारी सबसे अधिक 30 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में हुए कर नियमों और संधि संशोधनों का प्रभाव इस रुझान के पीछे हो सकता है। इसके अलावा, अमेरिका में भारतीय निवेश की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2017 के 9.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 13.6 प्रतिशत हो गई है।

निवेश की संरचना में बदलाव

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारतीय कंपनियाँ अब प्रत्यक्ष स्वामित्व के ज़रिए विदेशी बाज़ारों में अपनी उपस्थिति मज़बूत करना चाहती हैं। पूर्णतः स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों (व्हॉली ओन्ड सब्सिडियरी) के ज़रिए निवेश का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इसके साथ ही, आउटवर्ड एफडीआई में इक्विटी निवेश का अनुपात वित्त वर्ष 2017 के 31 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 42 प्रतिशत हो गया है — जो दर्शाता है कि भारतीय कंपनियाँ अब अधिक दीर्घकालिक और नियंत्रण-आधारित विदेशी निवेश रणनीति अपना रही हैं।

गिफ्ट सिटी और भविष्य की संभावनाएँ

रिपोर्ट में गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) के बढ़ते महत्व को भी इस रुझान में योगदान देने वाले एक प्रमुख कारक के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भारत के आउटवर्ड एफडीआई की हिस्सेदारी अभी अपेक्षाकृत कम है, जिसका अर्थ है कि नए व्यापार और निवेश समझौतों के ज़रिए इस दिशा में विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार और तेज़ होने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी संरचना पर ध्यान देना ज़रूरी है — सिंगापुर में 30% हिस्सेदारी का एक बड़ा हिस्सा कर-अनुकूल रूटिंग से प्रेरित हो सकता है, न कि वास्तविक उत्पादक निवेश से। वित्तीय सेवाओं और आईटी की प्रधानता यह भी दर्शाती है कि भारतीय कंपनियाँ अभी विनिर्माण में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दाँव लगाने से हिचकिचा रही हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कम हिस्सेदारी एक अवसर तो है, पर यह भारतीय कंपनियों की वहाँ प्रतिस्पर्धात्मक सीमाओं का भी संकेत है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह विस्तार दीर्घकालिक रोज़गार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बदलता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में कितना रहा?
बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर रहा। गारंटी को छोड़कर यह आँकड़ा 28 अरब डॉलर था।
कोविड के बाद भारत के आउटवर्ड एफडीआई में किस तरह की रिकवरी आई?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आउटवर्ड एफडीआई में कोविड-19 के बाद तीव्र यू-आकार की रिकवरी देखी गई। वित्त वर्ष 2024 के 25 अरब डॉलर से यह वित्त वर्ष 2025 में 42 अरब और वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर तक पहुँचा, जबकि वैश्विक स्तर पर विदेशी निवेश में गिरावट रही।
भारतीय कंपनियाँ सबसे अधिक किन देशों में निवेश कर रही हैं?
सिंगापुर भारत के आउटवर्ड एफडीआई का सबसे बड़ा गंतव्य है, जिसकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है। अमेरिका दूसरा प्रमुख गंतव्य है, जहाँ हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2017 के 9.9% से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 13.6% हो गई है।
भारत के आउटवर्ड एफडीआई में कौन-से क्षेत्र अग्रणी हैं?
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दिपन्विता मजूमदार के अनुसार, वित्तीय सेवाएँ भारत के आउटवर्ड एफडीआई में सबसे बड़ी हिस्सेदार हैं। भारतीय कंपनियाँ पारंपरिक विनिर्माण की बजाय ज्ञान-आधारित और आईटी-संबंधित सेवाओं को प्राथमिकता दे रही हैं।
गिफ्ट सिटी का भारत के विदेशी निवेश से क्या संबंध है?
रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) का बढ़ता महत्व भारत के आउटवर्ड एफडीआई के रुझान में अहम योगदान दे रहा है। यह वित्तीय और तकनीकी सेवाओं के ज़रिए भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को सुगम बना रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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