भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2026 में 47 अरब डॉलर पर, वैश्विक गिरावट के बीच मजबूत उछाल: बैंक ऑफ बड़ौदा
सारांश
मुख्य बातें
भारत का आउटवर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (आउटवर्ड एफडीआई) कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में उल्लेखनीय रफ्तार से बढ़ा है — और यह तब हुआ जब वैश्विक स्तर पर विदेशी निवेश प्रवाह में गिरावट दर्ज की जा रही थी। बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा 23 जून 2026 को जारी एक विश्लेषण रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आउटवर्ड एफडीआई में कोविड के बाद एक तीव्र यू-आकार की रिकवरी देखी गई है, जो भारतीय कंपनियों के बढ़ते वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का प्रमाण है।
आँकड़ों में कितनी बड़ी है यह छलाँग
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का आउटवर्ड एफडीआई वित्त वर्ष 2024 में 25 अरब डॉलर था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 42 अरब डॉलर हो गया और वित्त वर्ष 2026 में यह आँकड़ा 47 अरब डॉलर तक पहुँच गया। हालाँकि, गारंटी को छोड़कर देखें तो वित्त वर्ष 2026 में यह आँकड़ा 28 अरब डॉलर रहा। सबसे तेज वृद्धि वित्त वर्ष 2025 में दर्ज की गई, जब एक ही वर्ष में निवेश 17 अरब डॉलर बढ़ा।
किन क्षेत्रों और देशों में जा रहा है भारतीय निवेश
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दिपन्विता मजूमदार ने बताया कि क्षेत्रवार आँकड़ों के अनुसार वित्तीय सेवाएँ भारत के आउटवर्ड एफडीआई में सबसे बड़ी हिस्सेदार हैं। उन्होंने कहा कि यह इस बात का संकेत है कि भारतीय कंपनियाँ पारंपरिक पूँजी-आधारित विनिर्माण की तुलना में ज्ञान-आधारित और आईटी-संबंधित सेवाओं को प्राथमिकता दे रही हैं।
गंतव्य देशों में सिंगापुर की हिस्सेदारी सबसे अधिक 30 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में हुए कर नियमों और संधि संशोधनों का प्रभाव इस रुझान के पीछे हो सकता है। इसके अलावा, अमेरिका में भारतीय निवेश की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2017 के 9.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 13.6 प्रतिशत हो गई है।
निवेश की संरचना में बदलाव
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारतीय कंपनियाँ अब प्रत्यक्ष स्वामित्व के ज़रिए विदेशी बाज़ारों में अपनी उपस्थिति मज़बूत करना चाहती हैं। पूर्णतः स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों (व्हॉली ओन्ड सब्सिडियरी) के ज़रिए निवेश का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इसके साथ ही, आउटवर्ड एफडीआई में इक्विटी निवेश का अनुपात वित्त वर्ष 2017 के 31 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 42 प्रतिशत हो गया है — जो दर्शाता है कि भारतीय कंपनियाँ अब अधिक दीर्घकालिक और नियंत्रण-आधारित विदेशी निवेश रणनीति अपना रही हैं।
गिफ्ट सिटी और भविष्य की संभावनाएँ
रिपोर्ट में गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) के बढ़ते महत्व को भी इस रुझान में योगदान देने वाले एक प्रमुख कारक के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भारत के आउटवर्ड एफडीआई की हिस्सेदारी अभी अपेक्षाकृत कम है, जिसका अर्थ है कि नए व्यापार और निवेश समझौतों के ज़रिए इस दिशा में विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार और तेज़ होने की उम्मीद है।