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ताऊ देवी लाल जयंती: किसान परिवार से उप-प्रधानमंत्री तक का सफर, हरियाणा की राजनीति के अमर नायक

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ताऊ देवी लाल जयंती: किसान परिवार से उप-प्रधानमंत्री तक का सफर, हरियाणा की राजनीति के अमर नायक

सारांश

किसान परिवार से निकले चौधरी देवी लाल ने हरियाणा की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया — न्याय युद्ध से लेकर बुजुर्ग पेंशन तक। प्रधानमंत्री पद ठुकराने की कहानी आज भी राजनीतिक विरलेपन की मिसाल है। 25 सितंबर को उनकी जयंती पर याद करें उस ताऊ को जो सत्ता के शिखर पर भी किसान बना रहा।

मुख्य बातें

चौधरी देवी लाल का जन्म 25 सितंबर 1914 को सिरसा जिले के तेजाखेड़ा गाँव में हुआ था।
वे दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे — 1977-79 और 1987-89 ।
1989 में प्रधानमंत्री पद ठुकराकर वीपी सिंह को PM बनाया; स्वयं 19 अक्टूबर 1989 से 21 जून 1991 तक उप-प्रधानमंत्री रहे।
1991, 1996 और 1998 में रोहतक से भूपेंद्र सिंह हुड्डा से तीन बार लोकसभा चुनाव हारे।
1998 में राज्यसभा सदस्य बने और 6 अप्रैल 2001 को निधन हुआ।
उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी हरियाणा की राजनीति में सक्रिय है।

हरियाणा की राजनीति में चौधरी देवी लाल का नाम सर्वाधिक सम्मान के साथ लिया जाता है। 25 सितंबर 1914 को सिरसा जिले के तेजाखेड़ा गाँव में एक किसान परिवार में जन्मे देवी लाल ने साधारण खेतिहर पृष्ठभूमि से निकलकर देश के उप-प्रधानमंत्री पद तक का असाधारण सफर तय किया। अपनी अंतिम साँस तक वे स्वयं को किसान और मजदूर का बेटा कहते रहे — यही उनकी पहचान थी, यही उनकी ताकत।

प्रारंभिक जीवन और स्वतंत्रता संग्राम

देवी लाल के पिता का नाम लेखराम था और 1926 में उनका विवाह हरखी देवी से हुआ। वे उन विरले नेताओं में शामिल थे जो आज़ादी से पूर्व और पश्चात दोनों कालखंडों में समान रूप से सक्रिय रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, जेल की सज़ा भोगी और देश की आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति में कदम रखा। गौरतलब है कि उस दौर में हरियाणा, पंजाब का हिस्सा था।

1952 में पहले विधानसभा चुनाव में वे पहली बार विधायक बने। इसके बाद 1957 और 1962 में भी वे पंजाब विधानसभा के सदस्य चुने गए। यह ऐसे समय में आया जब हरियाणा को अलग राज्य का दर्जा मिलना अभी बाकी था।

हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में दो कार्यकाल

हरियाणा के अलग राज्य बनने के बाद देवी लाल इसकी राजनीति के केंद्रबिंदु बन गए। वे दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे — पहली बार 21 जून 1977 से 28 जून 1979 तक और दूसरी बार 17 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 1989 तक।

दूसरे कार्यकाल में उनकी 'न्याय युद्ध' मुहिम और बुजुर्गों के लिए ₹100 मासिक पेंशन की योजना ने उन्हें हरियाणा के घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। यह पेंशन योजना उस समय के हिसाब से एक क्रांतिकारी कल्याणकारी कदम थी, जिसने उनकी किसान-मजदूर हितैषी छवि को और मजबूत किया।

राष्ट्रीय राजनीति में शिखर और उप-प्रधानमंत्री पद

1989 का वर्ष देवी लाल के राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम अध्याय रहा। केंद्र में जनता दल की सरकार बनी और कहा जाता है कि संसदीय दल ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर सहमति जताई थी, किंतु उन्होंने वह पद ठुकराकर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। इसके पश्चात वे 19 अक्टूबर 1989 से 21 जून 1991 तक देश के उप-प्रधानमंत्री रहे — पहले वीपी सिंह और फिर चंद्रशेखर की सरकार में।

हालाँकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चंद्रशेखर को रोकने के लिए वीपी सिंह की एक रणनीतिक चाल थी और देवी लाल उस बिसात में एक मोहरा बन गए थे। बाद में देवी लाल ने चंद्रशेखर गुट को समर्थन देकर उनकी सरकार में भी उप-प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला।

चुनावी हार और राज्यसभा तक का सफर

उप-प्रधानमंत्री पद के बाद का दौर देवी लाल के लिए कठिन रहा। 1991, 1996 और 1998 में उन्होंने रोहतक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन तीनों बार वे अपने प्रतिद्वंद्वी भूपेंद्र सिंह हुड्डा से पराजित हुए।

1972 में नाराजगी के चलते उन्होंने आदमपुर और तोशाम दोनों सीटों से निर्दलीय चुनाव लड़ा और दोनों जगह हार का सामना करना पड़ा। आदमपुर में भजनलाल ने उन्हें लगभग 10 हजार मतों से और तोशाम में बंसीलाल ने लगभग 20 हजार मतों से पराजित किया। अंततः 1998 में वे राज्यसभा के सदस्य बने।

राज्यसभा सदस्य रहते हुए ही 6 अप्रैल 2001 को उनका निधन हो गया। उनके पाँच संतानें हुईं — चार बेटे और एक बेटी। आज उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी भी हरियाणा की राजनीति में सक्रिय है, जो उनकी विरासत को जीवंत रखे हुए है।

देवी लाल की विरासत और आज की प्रासंगिकता

देवी लाल को 'ताऊ' की उपाधि जनता ने अपनेपन से दी — एक ऐसा संबोधन जो हरियाणा में बड़े भाई या बुजुर्ग को दिया जाता है। उनका किसान आंदोलन और कल्याणकारी नीतियाँ आज भी राज्य की राजनीति में संदर्भ बिंदु बनी हुई हैं। उनकी जयंती पर हर साल हरियाणा में सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो बताते हैं कि उनकी स्मृति आज भी उतनी ही जीवंत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह इस सवाल का जवाब है कि भारतीय राजनीति में जमीनी पहचान कितनी टिकाऊ होती है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकराया — यह कहानी दशकों से सुनाई जाती है, लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर यह नहीं बताती कि उस फैसले के पीछे की राजनीतिक पेचीदगियाँ क्या थीं। 1989 के बाद उनके तीन-तीन चुनावी पराजय यह दर्शाते हैं कि किसानों का मसीहा भी परिवर्तित राजनीतिक समीकरणों में कमज़ोर पड़ सकता है। उनकी विरासत का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी उस जमीनी संवेदनशीलता को बनाए रख सकती है, जो 'ताऊ' की असली राजनीतिक पूँजी थी।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ताऊ देवी लाल कौन थे और उन्हें 'ताऊ' क्यों कहा जाता था?
चौधरी देवी लाल हरियाणा के किसान नेता, दो बार के मुख्यमंत्री और देश के उप-प्रधानमंत्री थे। हरियाणा में 'ताऊ' बड़े भाई या बुजुर्ग के लिए सम्मानजनक संबोधन है — जनता ने उन्हें यह उपाधि उनके जमीनी जुड़ाव और किसान-हितैषी छवि के कारण दी।
देवी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री कब-कब रहे?
देवी लाल दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे — पहली बार 21 जून 1977 से 28 जून 1979 तक और दूसरी बार 17 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 1989 तक। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने बुजुर्गों के लिए ₹100 मासिक पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाएँ लागू कीं।
देवी लाल ने प्रधानमंत्री पद क्यों ठुकराया?
कहा जाता है कि 1989 में जनता दल के संसदीय दल ने प्रधानमंत्री पद के लिए देवी लाल के नाम पर सहमति जताई थी, लेकिन उन्होंने वह पद ठुकराकर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। हालाँकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह वीपी सिंह की रणनीतिक चाल थी।
देवी लाल उप-प्रधानमंत्री कब बने और उनका कार्यकाल कितना रहा?
देवी लाल 19 अक्टूबर 1989 से 21 जून 1991 तक देश के उप-प्रधानमंत्री रहे — पहले वीपी सिंह और फिर चंद्रशेखर की सरकार में। यह उनके राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन का शिखर था।
देवी लाल की राजनीतिक विरासत आज कैसी है?
देवी लाल का निधन 6 अप्रैल 2001 को राज्यसभा सदस्य रहते हुए हुआ। उनके चार बेटों और एक बेटी सहित परिवार की तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी हरियाणा की राजनीति में सक्रिय है और उनकी जयंती पर राज्यभर में कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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