क्या लाला लाजपत राय का जीवन संघर्ष और बलिदान की मिसाल है?
सारांश
Key Takeaways
- लाला लाजपत राय का जीवन संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है।
- उन्होंने आर्य समाज के माध्यम से सामाजिक सुधार का कार्य किया।
- उनकी शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें एक महान विचारक बनाया।
- स्वदेशी आंदोलन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।
- उनका योगदान आज भी प्रेरणादायक है।
नई दिल्ली, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हर वर्ष 28 जनवरी हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाता है जिसने विचार, कार्य, संघर्ष और बलिदान को समाहित करके भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया मोड़ दिया। 28 जनवरी, 1865 को पंजाब के लुधियाना जिले के धुदिके गाँव में जन्मे लाला लाजपत राय केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, पत्रकार, वक्ता और सांसद थे। देश उन्हें पंजाब केसरी के नाम से जानता है।
उनके पिता राधा किशन उर्दू और फारसी के शिक्षक थे, जबकि माता गुलाब देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। पिता से उन्हें कर्तव्यनिष्ठा, उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता का भाव मिला, जबकि माता से विशालहृदयता और दयालुता जैसे गुण विरासत में प्राप्त हुए। यही संस्कार उनके सम्पूर्ण जीवन और संघर्ष की नींव बने।
लाजपत राय की प्रारंभिक शिक्षा घर और विद्यालय दोनों में हुई। उन्होंने कक्षाओं में सामान्यतः प्रथम स्थान प्राप्त किया, अनेक पुरस्कार जीते और शिक्षकों से प्रशंसा प्राप्त की। उन्होंने लुधियाना और अंबाला के मिशन स्कूलों से पढ़ाई की। खराब स्वास्थ्य के बावजूद, उन्होंने हर शैक्षिक चरण में अपनी विशिष्टता बनाए रखी।
वर्ष 1880 में उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया और विधि कॉलेज में भी दाखिला लिया। 1883 में राजस्व न्यायालय में वकालत शुरू की। 1886 में पंजाब विश्वविद्यालय से प्लीडर की परीक्षा पास कर हिसार में वकालत आरंभ की। 1882 में आर्य समाज की शिक्षा ग्रहण की और इसके अग्रणी नेताओं में शामिल हो गए।
कॉलेज जीवन के दौरान उन्होंने स्थानीय आर्य समाज के सचिव के रूप में कार्य किया और रोहतक को आर्य समाज की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया। उन्होंने आर्य समाज को एक व्यावहारिक सामाजिक सेवा संगठन का स्वरूप दिया।
लाला लाजपत राय एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता थे। 1896, 1899-1900, 1907-1908 के अकालों में उन्होंने पीड़ितों की सहायता की। उन्होंने अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए आर्य समाज के अभियानों का समर्थन किया और दलित वर्गों को सम्मानित स्थिति दिलाने के लिए भूमि खरीदी।
शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान भी महत्वपूर्ण था। उन्होंने आर्य समाज के शैक्षिक कार्यक्रमों को अपना केंद्र बनाया और शिक्षा को व्यक्ति के भविष्य की नींव माना। उनके लेखन में सहजता और प्रभावशीलता थी।
1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उन्हें भारतीय समस्याओं को ब्रिटिश जनता के समक्ष रखने के लिए प्रतिनिधि चुना। उन्होंने इंग्लैंड में राजनीतिक अभियान चलाया। स्वदेशी आंदोलन के दौरान उन्होंने पंजाब में स्वदेशी का संदेश फैलाया और 9 मई 1907 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनके शब्द 'मुझ पर किया गया लाठी का प्रत्येक प्रहार अंग्रेजी साम्राज्यवाद के ताबूत में एक-एक कील ठोकने के बराबर है' आज भी गूंजते हैं।