लाल बहादुर शास्त्री जयंती: दहेज में चरखा स्वीकारा, PM रहते ₹5,000 का बैंक लोन लिया
सारांश
मुख्य बातें
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती 2 अक्टूबर को मनाई जाती है — एक ऐसे नेता की, जिनका जीवन सादगी, नैतिक साहस और राष्ट्रसेवा की अप्रतिम मिसाल है। मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में 2 अक्टूबर 1904 को जन्मे शास्त्री ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी इतनी सादगी बरती कि कार खरीदने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से ₹5,000 का ऋण लेना पड़ा। 'जय जवान, जय किसान' का ऐतिहासिक नारा देने वाले इस नेता की विरासत आज भी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में जीवित है।
बचपन और संघर्षमय शुरुआत
शास्त्री के पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक शिक्षक थे, जिनका निधन तब हो गया जब लाल बहादुर बहुत छोटे थे। माँ रामदुलारी देवी ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बच्चों का पालन-पोषण किया। परिवार में प्यार से 'नन्हे' कहे जाने वाले शास्त्री अपनी उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी में रिश्तेदारों के यहाँ रहे। कहा जाता है कि कई बार वे नंगे पैर स्कूल जाते थे, फिर भी पढ़ाई के प्रति उनकी लगन कभी कम नहीं हुई।
स्वतंत्रता आंदोलन और 'शास्त्री' उपाधि
महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित शास्त्री ने 16 वर्ष की उम्र में असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ दी। परिवार की चिंताओं के बावजूद वे अपने संकल्प पर अडिग रहे। बाद में उन्होंने काशी विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की और 'शास्त्री' की उपाधि हासिल की, जो आगे चलकर उनके नाम का अभिन्न हिस्सा बन गई। देश की आज़ादी के लिए उन्होंने कई बार जेल की यातनाएँ भी सहीं।
दहेज में चरखा — विवाह की सादगी
1927 में शास्त्री का विवाह ललिता देवी से हुआ। यह विवाह भी उनकी विचारधारा का प्रतिबिंब था — उन्होंने दहेज में किसी महँगी वस्तु को स्वीकार करने से मना कर दिया। ससुराल पक्ष की ओर से चरखा और हाथ से काता हुआ खादी का कपड़ा दिया गया, जिसे उन्होंने सहर्ष ग्रहण किया। यह प्रसंग उस दौर में जब दहेज प्रथा समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए थी, एक असाधारण सामाजिक संदेश था।
प्रधानमंत्री पद और ऐतिहासिक चुनौतियाँ
27 मई 1964 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस ने सर्वसम्मति से शास्त्री को नेता चुना। 9 जून 1964 को उन्होंने भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल भले ही करीब 18 महीने का रहा, किंतु इस अल्प समय में देश ने खाद्यान्न संकट, आर्थिक दबाव और पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसी असाधारण चुनौतियों का सामना किया। गौरतलब है कि रेल मंत्री रहते हुए एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया था — सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही का वह उदाहरण आज भी बेमिसाल माना जाता है।
PM रहते भी ₹5,000 का बैंक लोन — अटूट ईमानदारी
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' का नारा देकर देश में नई ऊर्जा का संचार किया। युद्ध के बाद सूखे और खाद्यान्न संकट से जूझते देश के लिए उन्होंने नागरिकों से एक दिन के स्वैच्छिक उपवास की अपील की। इसी दौर का एक अत्यंत चर्चित प्रसंग उनकी कार खरीदने से जुड़ा है। परिवार के आग्रह पर उन्होंने ₹12,000 की एक कार खरीदी। उस समय उनके बैंक खाते में केवल ₹7,000 थे, इसलिए शेष ₹5,000 के लिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से ऋण लिया। शास्त्री के निधन के पश्चात उनकी पत्नी ललिता देवी ने यह ऋण अपनी पेंशन से चुकाया। देश के प्रधानमंत्री का यह आचरण उनकी निजी ईमानदारी का सबसे मूर्त प्रमाण बनकर इतिहास में दर्ज हो गया।