मेरठ नीला ड्रम हत्याकांड: साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को फांसी की सजा, मेरठ कोर्ट ने महिला को पहली बार सुनाया मृत्युदंड
सारांश
मुख्य बातें
मेरठ की जिला अदालत ने 14 अक्टूबर 2026 को चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में दोनों आरोपियों — मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला — को मृत्युदंड की सजा सुनाई। यह मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ में नीले ड्रम में सौरभ का शव मिलने के बाद देशभर में सुर्खियों में आया था। अदालत ने दोनों दोषियों पर ₹20,000 का जुर्माना और सात साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई।
मुख्य घटनाक्रम
आरोपियों पर सौरभ राजपूत की हत्या कर उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके नीले ड्रम में रखने का अभियोग था। अदालत में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि किसी ने दोनों को हत्या करते नहीं देखा और दोनों की छोटी-छोटी बेटियां हैं। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य इतने मज़बूती से प्रस्तुत किए कि बचाव की कोई गुंजाइश नहीं बची।
ऐतिहासिक निर्णय: महिला को पहली बार मृत्युदंड
जिला सरकारी वकील कृष्ण कुमार चौबे ने कहा कि यह मेरठ अदालत का ऐतिहासिक निर्णय है, क्योंकि मेरठ की अदालत ने किसी महिला को पहली बार मौत की सजा सुनाई है। उन्होंने बताया कि फैसला सुनाते समय साहिल और मुस्कान के 'होश उड़ गए।' चौबे के अनुसार, पूरे देश की निगाहें इस मामले पर टिकी थीं।
परिवार की प्रतिक्रिया
सौरभ की माँ रेनू देवी ने कोर्ट के फैसले पर संतोष जताते हुए कहा, 'कोर्ट के फैसले से हम पूरी तरह से संतुष्ट हैं। आज कोर्ट ने केवल उन्हें मौत की सजा सुनाई है, लेकिन जब उनकी फांसी की तारीख मुकर्रर हो जाएगी, वह हमारी खुशी का असली दिन होगा।' सौरभ के भाई राहुल ने कहा, 'हमें न्याय मिल गया है। कोर्ट से हमारी मांग मुस्कान और साहिल को मौत की सजा देने की थी। हमारी मांग मान ली गई है।'
वकील और अधिवक्ताओं का जश्न
परिवार की पैरवी करने वाले वकील विजय बहादुर ने कहा कि यह बहुत बड़ा फैसला है और समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है। उनके अनुसार, 'कोर्ट का यह फैसला अपराधियों में खौफ का माहौल पैदा करेगा।' फैसले के बाद मेरठ कचहरी परिसर में अधिवक्ताओं ने जिला न्यायालय के बाहर लड्डू बांटकर जश्न मनाया।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
मृत्युदंड की सजा के लिए उच्च न्यायालय से अनुमोदन की प्रक्रिया अनिवार्य है। गौरतलब है कि ऐसे मामलों में दोषी इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला उच्च न्यायालय के समक्ष जाएगा, जहाँ सजा की पुष्टि या संशोधन होगा।