क्या पाकिस्तान में पत्रकारों के लिए खतरा बढ़ रहा है?
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान में पत्रकारिता की स्वतंत्रता गंभीर संकट में है।
- पत्रकारों को उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।
- महिला पत्रकारों के लिए ऑनलाइन धमकियाँ सामान्य हैं।
- आत्म-सेंसरशिप एक आम प्रवृत्ति बन गई है।
- सार्वजनिक विमर्श पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
इस्लामाबाद, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हाल के वर्षों में पाकिस्तान में पत्रकारों के लिए कार्य करना लगातार खतरनाक होता जा रहा है। ऑनलाइन रिपोर्टिंग के मामले में प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पेसा) के अंतर्गत कार्रवाई, सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और निजी व्यक्तियों द्वारा मानहानि के मुकदमे, साथ ही सुरक्षा एजेंसियों का दबाव- इन सभी ने प्रेस की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट में यह जानकारी शनिवार को सामने आई।
‘जर्नलिज़्म पाकिस्तान’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों, राजनीतिक आंदोलनों और संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों को कवर करने वाले पत्रकारों को शारीरिक हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। प्रेस क्लबों और पत्रकार यूनियनों ने कई ऐसे मामले दर्ज किए हैं, जिनमें रिपोर्टरों पर हमले हुए या उन्हें सुरक्षा अभियानों के दौरान कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन घटनाओं के बाद अक्सर पारदर्शी जांच नहीं होती, जिससे दंडहीनता की भावना और बढ़ती है।
महिला पत्रकारों को अतिरिक्त उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, विशेषकर ऑनलाइन। रिपोर्ट के अनुसार, समन्वित ट्रोलिंग, धमकियां, और उनकी पेशेवर साख को नष्ट करने की कोशिशें आम हैं, खासकर उन महिला पत्रकारों के लिए जो राजनीति, मानवाधिकार या धार्मिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करती हैं। हालाँकि, डिजिटल उत्पीड़न एक वैश्विक समस्या है, लेकिन पाकिस्तान में ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल इसे और बढ़ा देता है।
रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पाकिस्तान में प्रेस की स्वतंत्रता एक प्रतिबंधात्मक माहौल में कार्य कर रही है, जहां कानूनी नियंत्रण, सुरक्षा दबाव, आर्थिक दबाव और डिजिटल पाबंदियाँ हावी हैं। वर्ष 2026 में भी देशभर के पत्रकार ऐसे माहौल में कार्यरत हैं, जहाँ संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से शक्तिशाली संस्थानों, राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक मामलों पर रिपोर्टिंग को सीमित करने वाले कानून और प्रक्रियाएँ मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मानहानि कानून, आतंकवाद निरोधक प्रावधान, ईशनिंदा कानून और साइबर अपराध से जुड़े नियमों का एक व्यापक कानूनी ढांचा है, जिसका उपयोग पत्रकारिता के खिलाफ किया जा सकता है।
कानूनी, सुरक्षा और आर्थिक दबावों के कारण समाचार कक्षों में आत्म-सेंसरशिप एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि संपादक अक्सर किसी खबर के सार्वजनिक हित और उसे प्रकाशित करने के संभावित जोखिमों के बीच संतुलन बनाते हैं। कई बार भाषा को नरम करना, नाम हटाना या खबर को टालना जोखिम प्रबंधन के रूप में देखा जाता है।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस तरह का माहौल सार्वजनिक विमर्श पर दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। जब संवेदनशील मुद्दों पर सीमित या सतर्क कवरेज होती है, तो लोग अप्रमाणित स्रोतों या सोशल मीडिया अटकलों की ओर रुख करते हैं। पत्रकारों का मानना है कि लगातार आत्म-सेंसरशिप से पेशेवर मीडिया पर भरोसा कमजोर होता है और तथ्य-आधारित बहस की गुंजाइश कम होती है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति समान नहीं है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध के कुछ क्षेत्रों में कार्यरत पत्रकारों को बड़े शहरी केंद्रों की तुलना में कहीं अधिक खतरे का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे कानूनी सहायता की कमी, सीमित मीडिया संस्थान और कड़े सुरक्षा अभियान प्रमुख कारण बताए गए हैं।