क्या पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में अस्थिरता बढ़ती जा रही है?
सारांश
Key Takeaways
- खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर है।
- आतंकी हमले बढ़ रहे हैं, जिससे नागरिकों में डर का माहौल है।
- राजनीतिक उत्पीड़न लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरा है।
- पत्रकारों के खिलाफ हमले बढ़ रहे हैं, जो चिंताजनक है।
- मानवाधिकार आयोग ने स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
इस्लामाबाद, 1 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने वर्ष 2025 में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। आयोग के अनुसार, यह क्षेत्र लगातार अस्थिर बना हुआ है और यहां बार-बार आतंकी हमले हो रहे हैं।
एचआरसीपी की नवीनतम रिपोर्ट में इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि जुलाई 2025 में पूरे देश में कम से कम 82 आतंकी हमले हुए, जिनमें से लगभग दो-तिहाई खैबर पख्तूनख्वा और उसके पूर्ववर्ती कबायली जिलों में हुए।
रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 में भी प्रांत में 45 आतंकी हमले हुए, जिनमें 54 लोग मारे गए और 49 अन्य घायल हुए। इन हमलों में से 20 घटनाएं खैबर पख्तूनख्वा के विलय किए गए जिलों में हुईं, जिनमें 21 लोगों की जान गई। मृतकों में छह पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी, तीन आतंकवादी और 12 आम नागरिक शामिल थे, जबकि सात लोग घायल हुए।
एचआरसीपी के अनुसार, अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) के खैबर पख्तूनख्वा प्रदेश अध्यक्ष मियां इफ्तिखार हुसैन ने सुरक्षा हालात को आम धारणा से कहीं अधिक गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि केवल विलय किए गए जिलों में ही नहीं, बल्कि प्रांत के बसे हुए इलाकों में भी कई उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं और आतंकी संगठन दाएश (आईएसआईएस) की मौजूदगी की भी खबरें हैं।
इसी तरह, क़ौमी वतन पार्टी (क्यूडब्ल्यूपी) के प्रांतीय अध्यक्ष सिकंदर शेरपाओ के हवाले से एचआरसीपी ने कहा कि जनवरी 2025 से अब तक लगभग 550 हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें अधिकांश विलय किए गए जिलों में हुई हैं। शेरपाओ के अनुसार, क्षेत्र में "वास्तविक आतंकी तत्वों" के साथ-साथ "नकलची गिरोह और संगठित आपराधिक नेटवर्क" भी सक्रिय हो गए हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति और जटिल हो गई है।
क्यूडब्ल्यूपी नेता ने वज़ीरिस्तान और बाजौर क्षेत्रों की स्थिति को विशेष रूप से गंभीर बताते हुए कहा कि दाएश या इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वहां सिविल सेवकों और पुलिसकर्मियों को देर दोपहर तक छिपने पर मजबूर होना पड़ता है।
एचआरसीपी मिशन ने जबरन गायब किए जाने की लगातार जारी प्रथा पर भी चिंता जताई। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'राज्य विरोधी' गतिविधियों के आरोप में पकड़े गए लोगों को अक्सर संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अदालतों में पेश नहीं किया जाता। आयोग ने यह भी कहा कि पीटीएम जैसे अधिकार-आधारित आंदोलनों और एएनपी जैसी प्रगतिशील पार्टियों के खिलाफ कथित राजनीतिक उत्पीड़न लोकतांत्रिक राजनीति के लिए नुकसानदेह है।
इसके साथ ही, एचआरसीपी ने प्रांत में पत्रकारों के खिलाफ सेंसरशिप, धमकी और लक्षित हमलों की खबरों पर भी चिंता जताई है, खासकर उन पत्रकारों के खिलाफ जो जबरन गुमशुदगी और आतंकी हिंसा जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं।