पितृ पक्ष 2026: मणिपुर के वैष्णव ब्रज के राधा कुंड में करते हैं तर्पण, शिव कुंड में अस्थि विसर्जन की सदियों पुरानी परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
पितृ पक्ष 2026 के अवसर पर मथुरा के राधा कुंड और शिव कुंड में मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालुओं की अनूठी धार्मिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है। इस वर्ष 26 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष आरंभ हो रहा है, और पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की अस्थियाँ लेकर ब्रज धाम पहुँच रहे हैं। यह परंपरा 18वीं शताब्दी से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
मणिपुर और ब्रज का सदियों पुराना धार्मिक नाता
18वीं शताब्दी में मणिपुर के महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से मणिपुर और ब्रज धाम के बीच गहरा धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध स्थापित हो गया। राधा कुंड स्थित ऐतिहासिक गोपाल मणिपुरी मंदिर और वहाँ मौजूद प्राचीन समाधि स्थल आज भी इस सैकड़ों वर्ष पुराने रिश्ते की जीती-जागती गवाही देते हैं। गौरतलब है कि बिहार के गयाजी, उत्तर प्रदेश के वाराणसी और उत्तराखंड के हरिद्वार की भाँति कृष्णनगरी मथुरा भी पिंडदान के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता रखती है।
राधा कुंड में तर्पण: पितरों को राधा-कृष्ण के चरणों में स्थान की मान्यता
मणिपुर के वैष्णव समाज में पितृ पक्ष (अश्विन मास) के दौरान अथवा सामान्य दिनों में भी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान व तर्पण करने का विशेष विधान है। मणिपुरी भाषा में तर्पण को 'तर्पों' कहा जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि राधा कुंड के पावन जल में भक्तिपूर्वक तर्पण और पूजन करने से पितरों को श्री राधा-कृष्ण के चरण कमलों में स्थान की प्राप्ति होती है — ठीक उसी प्रकार जैसे गयाजी में पिंडदान से मोक्ष की कामना की जाती है।
तीर्थ पुरोहित भूपेंद्र गोस्वामी, जो स्वयं को मणिपुर राज्य का पुरोहित बताते हैं, ने कहा कि राधा कुंड के निकट मणिपुर से आए श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण करते हैं। उन्होंने बताया कि इसके पश्चात श्रद्धालु राधा कुंड में स्नान करते हैं और मंदिर में ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं।
शिव कुंड में अस्थि विसर्जन: वैष्णव आस्था में शिव का विशेष स्थान
गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर राधा कुंड के समीप स्थित शिव कुंड — जहाँ भगवान शिव सिद्धेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं — का मणिपुरी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व है। शास्त्रों में भगवान शिव को 'वैष्णवानां यथा शंभु:' अर्थात वैष्णवों का परम गुरु माना गया है। इसी मान्यता के आधार पर मणिपुर में किसी परिजन के देहावसान के उपरांत उनकी अस्थियों का एक अंश गंगा में और शेष अंश ब्रज के शिव कुंड अथवा मानसी गंगा व राधा कुंड के समीपस्थ कुंडों में विसर्जित किया जाता है।
मथुरा निवासी दीपू जोशी ने बताया कि मणिपुर के लोग परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद उनकी अस्थियाँ राधा कुंड या शिव कुंड लेकर आते हैं। उन्होंने बताया कि ये श्रद्धालु पीपल के वृक्ष के नीचे अस्थियों को गाड़ते हैं और उस पेड़ पर पीला वस्त्र बाँधकर जाते हैं। जोशी के अनुसार, मणिपुरी समाज के लिए राधा कुंड ही उनका गयाजी है।
श्रद्धालुओं का अनुभव: 'राधाकुंड ही हमारा तीर्थ'
मणिपुर के निवासी गोदाधोर सिंह ने कहा कि उनके यहाँ परिवार के किसी सदस्य का निधन होने पर उनकी अस्थियाँ मथुरा के राधा कुंड लाई जाती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोग वाराणसी, प्रयागराज या हरिद्वार जाते हैं, परंतु अधिकांश मणिपुरी श्रद्धालु राधा कुंड आकर ही पिंडदान करना उचित समझते हैं। यह उनके लिए केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
क्या होगा आगे
पितृ पक्ष के दौरान 26 सितंबर से अक्टूबर 2026 के बीच मणिपुर सहित देश के विभिन्न कोनों से हज़ारों श्रद्धालुओं के मथुरा पहुँचने की संभावना है। यह आयोजन न केवल भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि ब्रज धाम की आध्यात्मिक परिधि किस प्रकार पूर्वोत्तर भारत तक फैली हुई है। आने वाले वर्षों में इस परंपरा को संरक्षित करने और तीर्थ सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।