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मणिपुर के वैष्णवों की अनूठी आस्था: राधा कुंड में तर्पण, शिव कुंड में अस्थि विसर्जन — सदियों पुरानी परंपरा

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मणिपुर के वैष्णवों की अनूठी आस्था: राधा कुंड में तर्पण, शिव कुंड में अस्थि विसर्जन — सदियों पुरानी परंपरा

सारांश

ब्रजभूमि के गोवर्धन में राधा कुंड और शिव कुंड, मणिपुर के वैष्णव समाज के लिए उनके 'गया' हैं — जहाँ वे पितरों का तर्पण और परिजनों की अस्थियाँ विसर्जित करते हैं। 18वीं सदी में महाराज भाग्यचंद्र के गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से जुड़ी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

मुख्य बातें

मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु गोवर्धन के राधा कुंड को गयाजी की भाँति पितृ शांति और मोक्ष का पवित्र स्थल मानते हैं।
शिव कुंड में पीपल वृक्ष के नीचे परिजनों की अस्थियाँ विसर्जित करना मणिपुरी समाज की सदियों पुरानी परंपरा है।
18वीं शताब्दी में महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से मणिपुर और ब्रज धाम का गहरा संबंध बना।
राधा कुंड के समीप गोपाल मणिपुरी मंदिर और प्राचीन समाधि स्थल इस ऐतिहासिक जुड़ाव के साक्षी हैं।
मणिपुरी भाषा में तर्पण को 'तर्पों' कहा जाता है; पितृपक्ष के अलावा सामान्य दिनों में भी श्रद्धालु यहाँ आते हैं।

ब्रजभूमि के गोवर्धन स्थित राधा कुंड और शिव कुंड, मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए केवल तीर्थ-दर्शन के केंद्र नहीं, बल्कि पूर्वजों की मुक्ति और अंतिम संस्कार की गहरी आस्था का परम धाम हैं। 18वीं शताब्दी से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है, जितनी पीढ़ियों पहले निभाई जाती थी।

मणिपुर और ब्रजभूमि का सदियों पुराना आध्यात्मिक रिश्ता

18वीं शताब्दी में मणिपुर के राजा महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से ही मणिपुर का ब्रज धाम से गहरा नाता जुड़ गया। राधा कुंड स्थित ऐतिहासिक गोपाल मणिपुरी मंदिर और प्राचीन समाधि स्थल आज भी इस सांस्कृतिक व धार्मिक जुड़ाव की जीवंत गवाही देते हैं। गौरतलब है कि मणिपुर के श्रद्धालु बिहार के गयाजी की भाँति ही राधा कुंड को पितृ शांति और मोक्ष प्राप्ति का परम पवित्र स्थल मानते हैं।

तर्पण और पिंडदान की विशेष परंपरा

मणिपुर के वैष्णव समाज में पितृपक्ष (अश्विन मास) अथवा सामान्य दिनों में भी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण की विशेष परंपरा है। मणिपुरी भाषा में तर्पण को 'तर्पों' कहा जाता है। मान्यता है कि राधा कुंड के पावन जल में भक्तिपूर्वक तर्पण और पूजन करने से पितरों को श्री राधा-कृष्ण के चरण कमलों में स्थान प्राप्त होता है।

राधा कुंड के समीप स्थित श्राद्ध कुंड पर एक गया घाट भी निर्मित है, जहाँ मणिपुरी श्रद्धालु विशेष रूप से पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण संपन्न करते हैं। आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में ब्रजवास करने और पूर्वजों के मोक्ष की कामना लेकर यहाँ पहुँचते हैं।

शिव कुंड में अस्थि विसर्जन की अनूठी परंपरा

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर राधा कुंड के समीप स्थित शिव कुंड में भगवान शिव सिद्धेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं। शास्त्रों में भगवान शिव को 'वैष्णवानां यथा शंभु' अर्थात वैष्णवों का परम गुरु माना गया है। इसी आस्था के आधार पर मणिपुर में किसी परिजन के देहावसान के पश्चात उनकी अस्थियों का एक अंश गंगाजी में और कुछ अंश शिव कुंड अथवा मानसी गंगाराधा कुंड के समीपस्थ कुंडों में विसर्जित किया जाता है।

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भगवान शिव की कृपा से दिवंगत आत्मा को संसार चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। शिव कुंड में एक पीपल का वृक्ष है, जहाँ अस्थियाँ विसर्जित की जाती हैं और वृक्ष पर कपड़ा बाँधकर श्रद्धालु ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, तत्पश्चात राधा कुंड में स्नान कर वापस लौटते हैं।

स्थानीय पुरोहितों और श्रद्धालुओं की राय

स्थानीय निवासी दीपू जोशी ने बताया कि मणिपुर के लोग इस स्थान पर अपने परिजनों की अस्थियाँ लेकर आते हैं, राधा रानी को चढ़ाते हैं और पीपल के पेड़ के नीचे गाड़कर वृक्ष पर कपड़ा बाँधकर जाते हैं। उन्होंने कहा — 'जब से होश संभाला है, देखते आए हैं कि मणिपुर के लोग यहाँ ढोल-नगारों के साथ आकर यह सभी क्रियाएँ करते हैं। उनका गया यहीं है।'

तीर्थ पुरोहित भूपेंद्र गोस्वामी ने बताया कि यह प्रथा काफी पहले से चली आ रही है — मणिपुर के श्रद्धालु राधा कुंड पर पिंडदान और तर्पण के बाद शिव कुंड में अस्थि विसर्जन करते हैं और मंदिर में ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात वापस लौटते हैं। मणिपुर से आए गोदाधोर सिंह ने भी पुष्टि की कि मणिपुर के अधिकांश लोग यहीं आकर परिजनों की अस्थियाँ विसर्जित करने के साथ-साथ पूर्वजों का पिंडदान करते हैं।

सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण

यह परंपरा भारत की उस समृद्ध सांस्कृतिक बुनाई का जीवंत प्रमाण है, जहाँ पूर्वोत्तर और उत्तर भारत की आध्यात्मिक धाराएँ सदियों से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह ऐसे समय में और भी महत्त्वपूर्ण है जब पितृपक्ष के अवसर पर देशभर से श्रद्धालु ब्रजभूमि की ओर उमड़ रहे हैं। इस परंपरा का निरंतर जीवित रहना भारत की सांस्कृतिक एकता और वैष्णव आस्था की अटूट शक्ति का प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

आस्था के धागों से बँधी है — और जिसे अक्सर मुख्यधारा की कवरेज में नज़रअंदाज़ किया जाता है। पूर्वोत्तर भारत को प्रायः सांस्कृतिक रूप से 'अलग' बताया जाता है, लेकिन मणिपुर की यह परंपरा उस कथा को चुनौती देती है — यह दिखाती है कि वैष्णव दर्शन ने 18वीं शताब्दी में ही इस क्षेत्र को ब्रजभूमि से अटूट रूप से जोड़ दिया था। पितृपक्ष के अवसर पर जब राष्ट्रीय विमर्श प्रयागराज और गयाजी पर केंद्रित रहता है, गोवर्धन का यह 'मणिपुरी गया' उन अनगिनत जीवंत परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है जो राष्ट्रीय एकता की असली नींव हैं।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु राधा कुंड को क्यों विशेष मानते हैं?
मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु गोवर्धन के राधा कुंड को बिहार के गयाजी की भाँति पितृ शांति और मोक्ष प्राप्ति का परम पवित्र स्थल मानते हैं। मान्यता है कि राधा कुंड के पावन जल में तर्पण करने से पितरों को श्री राधा-कृष्ण के चरण कमलों में स्थान प्राप्त होता है।
शिव कुंड में अस्थि विसर्जन की परंपरा क्या है?
मणिपुर में परिजन के देहावसान के बाद उनकी अस्थियों का एक अंश गंगाजी में और कुछ अंश गोवर्धन के शिव कुंड में विसर्जित किया जाता है, जहाँ भगवान शिव सिद्धेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं। शास्त्रों में भगवान शिव को 'वैष्णवानां यथा शंभु' — वैष्णवों का परम गुरु — माना गया है, इसी मान्यता पर यह परंपरा आधारित है।
मणिपुर और ब्रज धाम का ऐतिहासिक संबंध कब से है?
18वीं शताब्दी में मणिपुर के राजा महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से मणिपुर और ब्रज धाम का गहरा सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंध स्थापित हुआ। राधा कुंड स्थित गोपाल मणिपुरी मंदिर और प्राचीन समाधि स्थल इस ऐतिहासिक रिश्ते की गवाही देते हैं।
पितृपक्ष में मणिपुरी श्रद्धालु राधा कुंड पर क्या-क्या करते हैं?
पितृपक्ष (अश्विन मास) में मणिपुरी श्रद्धालु राधा कुंड पर पिंडदान और तर्पण (मणिपुरी में 'तर्पों') करते हैं। इसके बाद शिव कुंड में अस्थि विसर्जन, राधा कुंड में स्नान और मंदिर में ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा निभाई जाती है।
क्या यह परंपरा केवल पितृपक्ष में ही निभाई जाती है?
नहीं, मणिपुर के वैष्णव समाज में यह परंपरा पितृपक्ष के अलावा सामान्य दिनों में भी निभाई जाती है। परिजन के देहावसान के बाद कभी भी श्रद्धालु अस्थि विसर्जन और पिंडदान के लिए गोवर्धन पहुँचते हैं, और कई लोग जीवन के अंतिम पड़ाव में ब्रजवास के लिए भी यहाँ आते हैं।
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