पितृ पक्ष 2026: परशुराम कुंड और प्रिंसेप घाट — पितरों की मोक्ष-प्राप्ति के दो महातीर्थ
सारांश
मुख्य बातें
हिंदू पंचांग में पितृ पक्ष को पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष के लिए सर्वाधिक पवित्र काल माना जाता है। इन 16 दिनों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के माध्यम से परिजन अपने पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में किया गया दान और जलांजलि सीधे पूर्वजों तक पहुँचती है। देशभर में दर्जनों तीर्थस्थल इस कर्म के लिए प्रसिद्ध हैं, किंतु अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुंड और कोलकाता का प्रिंसेप घाट अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण सबसे ऊपर गिने जाते हैं।
परशुराम कुंड: पाप-मुक्ति का पवित्र द्वार
अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित परशुराम कुंड हिंदू धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। इस कुंड का सीधा संबंध भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम से जोड़ा जाता है।
पौराणिक आख्यान के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का वध किया था। पिता की भक्ति से माता तो पुनर्जीवित हो गईं, परंतु उन पर मातृ-हत्या का गुरु-पाप आरोपित हो गया, जिसके कारण उनका परशु (कुल्हाड़ी) हाथ से चिपक गया। देश के अनेक तीर्थों में भटकने के पश्चात जब वे लोहित नदी के इस कुंड में पहुँचे और यहाँ स्नान किया, तब वह परशु स्वतः छूट गया और वे पाप-मुक्त हो गए।
इसी पौराणिक प्रसंग के कारण परशुराम कुंड को माता-पिता और पूर्वजों से जुड़े दोषों से मुक्ति का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यहाँ देश के कोने-कोने से श्रद्धालु श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के लिए आते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस कुंड का जल दिव्य और शुद्ध है तथा यहाँ किया गया तर्पण पितरों को मोक्ष दिलाता है। वर्ष में सर्वाधिक भीड़ मकर संक्रांति पर उमड़ती है, जब भारत और नेपाल से लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए यहाँ एकत्रित होते हैं।
प्रिंसेप घाट और हुगली के तट: महालया की अनुपम परंपरा
पितृ तर्पण के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित प्रिंसेप घाट और हुगली नदी के अन्य घाट भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं। हुगली गंगा की ही एक धारा है, इसलिए धार्मिक दृष्टिकोण से यहाँ किया गया पिंडदान और तर्पण उतना ही फलदायी माना जाता है जितना प्रयागराज या काशी में।
पितृ पक्ष के 16 दिनों के दौरान यहाँ हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण दिन पितृ पक्ष का अंतिम दिन अर्थात् महालया अमावस्या होता है। इस दिन प्रातःकाल से ही हुगली के घाटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। लाउडस्पीकरों पर 'महिषासुरमर्दिनी' के चंडीपाठ की गूंज के मध्य श्रद्धालु घुटनों तक जल में खड़े होकर कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों से अपने पूर्वजों को तिलोदक अर्पित करते हैं।
यह क्षण पितृ पक्ष की विदाई और देवी पक्ष अर्थात् दुर्गा पूजा के शुभारंभ का प्रतीक है — एक ऐसा संधि-काल जो बंगाल की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन चुका है।
अन्य प्रमुख घाट और प्रशासनिक प्रबंध
प्रिंसेप घाट के अतिरिक्त बागबाजार घाट, निमतला घाट और हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर भी पितृ पक्ष के दौरान प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं। भीड़ प्रबंधन, सफाई और सुरक्षा के इंतजाम स्थानीय नगर निगम और पुलिस के सहयोग से किए जाते हैं।
पितृ पक्ष का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्त्व
पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह पीढ़ियों के बीच कृतज्ञता और स्मरण का सेतु है। इन तीर्थस्थलों पर श्रद्धा का जो महासागर उमड़ता है, वह भारतीय सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है। परशुराम कुंड की एकांत पहाड़ी शांति हो या कोलकाता के घाटों का सामूहिक उत्सव-बोध — दोनों ही स्थानों पर पितरों के प्रति कृतज्ञता और मोक्ष-कामना का अद्वितीय संगम देखने को मिलता है। आने वाले वर्षों में इन तीर्थों की महत्ता और यात्री-संख्या और बढ़ने की संभावना है, विशेषकर बेहतर हो रही उत्तर-पूर्व भारत की सड़क और वायु कनेक्टिविटी के मद्देनजर।