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पितृ पक्ष 2026: परशुराम कुंड और प्रिंसेप घाट — पितरों की मोक्ष-प्राप्ति के दो महातीर्थ

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पितृ पक्ष 2026: परशुराम कुंड और प्रिंसेप घाट — पितरों की मोक्ष-प्राप्ति के दो महातीर्थ

सारांश

पितृ पक्ष के 16 पवित्र दिनों में अरुणाचल के परशुराम कुंड और कोलकाता के प्रिंसेप घाट दो ऐसे तीर्थ हैं जहाँ पितरों को मोक्ष दिलाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है — एक पहाड़ी नदी के किनारे पाप-मुक्ति की पौराणिक गाथा, दूसरा हुगली के घाट पर महालया की अनुपम सामूहिक श्रद्धा।

मुख्य बातें

पितृ पक्ष के 16 दिनों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान द्वारा पूर्वजों की आत्मिक शांति की कामना की जाती है।
परशुराम कुंड , अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित है और इसे भगवान परशुराम की पाप-मुक्ति का स्थल माना जाता है।
मकर संक्रांति पर परशुराम कुंड में भारत और नेपाल से लाखों श्रद्धालु स्नान के लिए आते हैं।
कोलकाता के प्रिंसेप घाट सहित बागबाजार , निमतला और रामकृष्णपुर घाट पर महालया अमावस्या के दिन विशाल तर्पण आयोजन होता है।
महालया पर 'महिषासुरमर्दिनी' चंडीपाठ के बीच कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों से तिलोदक अर्पित करने की परंपरा पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा के बीच सेतु का काम करती है।

हिंदू पंचांग में पितृ पक्ष को पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष के लिए सर्वाधिक पवित्र काल माना जाता है। इन 16 दिनों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के माध्यम से परिजन अपने पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में किया गया दान और जलांजलि सीधे पूर्वजों तक पहुँचती है। देशभर में दर्जनों तीर्थस्थल इस कर्म के लिए प्रसिद्ध हैं, किंतु अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुंड और कोलकाता का प्रिंसेप घाट अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण सबसे ऊपर गिने जाते हैं।

परशुराम कुंड: पाप-मुक्ति का पवित्र द्वार

अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित परशुराम कुंड हिंदू धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। इस कुंड का सीधा संबंध भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम से जोड़ा जाता है।

पौराणिक आख्यान के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का वध किया था। पिता की भक्ति से माता तो पुनर्जीवित हो गईं, परंतु उन पर मातृ-हत्या का गुरु-पाप आरोपित हो गया, जिसके कारण उनका परशु (कुल्हाड़ी) हाथ से चिपक गया। देश के अनेक तीर्थों में भटकने के पश्चात जब वे लोहित नदी के इस कुंड में पहुँचे और यहाँ स्नान किया, तब वह परशु स्वतः छूट गया और वे पाप-मुक्त हो गए।

इसी पौराणिक प्रसंग के कारण परशुराम कुंड को माता-पिता और पूर्वजों से जुड़े दोषों से मुक्ति का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यहाँ देश के कोने-कोने से श्रद्धालु श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के लिए आते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस कुंड का जल दिव्य और शुद्ध है तथा यहाँ किया गया तर्पण पितरों को मोक्ष दिलाता है। वर्ष में सर्वाधिक भीड़ मकर संक्रांति पर उमड़ती है, जब भारत और नेपाल से लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए यहाँ एकत्रित होते हैं।

प्रिंसेप घाट और हुगली के तट: महालया की अनुपम परंपरा

पितृ तर्पण के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित प्रिंसेप घाट और हुगली नदी के अन्य घाट भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं। हुगली गंगा की ही एक धारा है, इसलिए धार्मिक दृष्टिकोण से यहाँ किया गया पिंडदान और तर्पण उतना ही फलदायी माना जाता है जितना प्रयागराज या काशी में।

पितृ पक्ष के 16 दिनों के दौरान यहाँ हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण दिन पितृ पक्ष का अंतिम दिन अर्थात् महालया अमावस्या होता है। इस दिन प्रातःकाल से ही हुगली के घाटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। लाउडस्पीकरों पर 'महिषासुरमर्दिनी' के चंडीपाठ की गूंज के मध्य श्रद्धालु घुटनों तक जल में खड़े होकर कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों से अपने पूर्वजों को तिलोदक अर्पित करते हैं।

यह क्षण पितृ पक्ष की विदाई और देवी पक्ष अर्थात् दुर्गा पूजा के शुभारंभ का प्रतीक है — एक ऐसा संधि-काल जो बंगाल की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन चुका है।

अन्य प्रमुख घाट और प्रशासनिक प्रबंध

प्रिंसेप घाट के अतिरिक्त बागबाजार घाट, निमतला घाट और हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर भी पितृ पक्ष के दौरान प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं। भीड़ प्रबंधन, सफाई और सुरक्षा के इंतजाम स्थानीय नगर निगम और पुलिस के सहयोग से किए जाते हैं।

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्त्व

पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह पीढ़ियों के बीच कृतज्ञता और स्मरण का सेतु है। इन तीर्थस्थलों पर श्रद्धा का जो महासागर उमड़ता है, वह भारतीय सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है। परशुराम कुंड की एकांत पहाड़ी शांति हो या कोलकाता के घाटों का सामूहिक उत्सव-बोध — दोनों ही स्थानों पर पितरों के प्रति कृतज्ञता और मोक्ष-कामना का अद्वितीय संगम देखने को मिलता है। आने वाले वर्षों में इन तीर्थों की महत्ता और यात्री-संख्या और बढ़ने की संभावना है, विशेषकर बेहतर हो रही उत्तर-पूर्व भारत की सड़क और वायु कनेक्टिविटी के मद्देनजर।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पर्यटन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की भी कहानी है — उत्तर-पूर्व भारत में बेहतर हो रही कनेक्टिविटी के साथ परशुराम कुंड की यात्री-संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, जो लोहित घाटी के स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका का नया स्रोत बन रही है। दूसरी ओर, कोलकाता में महालया की परंपरा मीडिया प्रसारण और सोशल मीडिया के माध्यम से वैश्विक बंगाली समुदाय तक पहुँच रही है, जो सांस्कृतिक पहचान को डिजिटल युग में भी जीवंत रखती है। गौरतलब है कि इन तीर्थों पर भीड़ और पर्यावरणीय दबाव के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए एक उभरती चुनौती है।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

परशुराम कुंड पितृ पक्ष के लिए इतना खास क्यों माना जाता है?
परशुराम कुंड को मातृ-हत्या के पाप से मुक्ति का स्थल माना जाता है क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम को यहाँ स्नान से मातृ-हत्या के दोष से मुक्ति मिली थी। इसलिए पितरों और माता-पिता से जुड़े दोषों के निवारण के लिए यह कुंड विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।
प्रिंसेप घाट पर महालया अमावस्या कैसे मनाई जाती है?
महालया अमावस्या के दिन कोलकाता के हुगली नदी के घाटों पर तड़के सुबह से हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। लाउडस्पीकर पर 'महिषासुरमर्दिनी' चंडीपाठ की गूंज के बीच लोग घुटनों तक जल में खड़े होकर कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों से पूर्वजों को तिलोदक अर्पित करते हैं, जो पितृ पक्ष की समाप्ति और दुर्गा पूजा के आरंभ का प्रतीक है।
पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान क्यों किया जाता है?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों की आत्मा पृथ्वी के निकट होती है। इस दौरान किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान सीधे पितरों तक पहुँचता है और उन्हें आत्मिक शांति तथा मोक्ष प्रदान करता है।
परशुराम कुंड कहाँ स्थित है और कैसे पहुँचें?
परशुराम कुंड अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित है। निकटतम हवाई अड्डा डिब्रूगढ़ (असम) है, जहाँ से सड़क मार्ग द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है। पितृ पक्ष और मकर संक्रांति के दौरान यहाँ विशेष यातायात व्यवस्था की जाती है।
कोलकाता में पितृ तर्पण के लिए प्रिंसेप घाट के अलावा और कौन-से घाट प्रसिद्ध हैं?
प्रिंसेप घाट के अतिरिक्त बागबाजार घाट, निमतला घाट और हावड़ा का रामकृष्णपुर घाट भी पितृ पक्ष में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ के लिए जाने जाते हैं। इन सभी घाटों पर पितृ पक्ष के दौरान प्रशासन द्वारा विशेष प्रबंध किए जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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