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पितृ पक्ष 2026: पितरों की शांति के लिए शूलपाणेश्वर, चाणोद, श्रीरंगम और नर्मदा तट पर पिंडदान का महत्व

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पितृ पक्ष 2026: पितरों की शांति के लिए शूलपाणेश्वर, चाणोद, श्रीरंगम और नर्मदा तट पर पिंडदान का महत्व

सारांश

पितृ पक्ष में पूर्वजों की शांति के लिए भारत के चार प्रमुख तीर्थ — शूलपाणेश्वर, चाणोद, श्रीरंगम और नर्मदा तट — सदियों से पिंडदान और तर्पण की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। पौराणिक कथाओं से लेकर ऐतिहासिक घाटों तक, ये स्थान आस्था और संस्कृति के अनूठे संगम हैं।

मुख्य बातें

शूलपाणेश्वर महादेव तीर्थ गुजरात में नर्मदा तट पर स्थित है; 1994 में सरदार सरोवर बाँध से मूल मंदिर जलमग्न होने के बाद एकता नगर (केवडिया) के निकट नया मंदिर बनाया गया।
चाणोद (वडोदरा, गुजरात) में नर्मदा, ओरसंग और सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है; इसे 'दक्षिणी प्रयाग' कहा जाता है।
मल्हार राव घाट (चाणोद) लगभग 1,000 वर्ष पुराना है — 60 फीट चौड़ा और 64 सीढ़ियों वाला।
श्रीरंगम (तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु) का अम्मा मंडपम घाट कावेरी नदी पर ताई अमावस्या, महालय अमावस्या और आदि अमावस्या पर विशेष तर्पण के लिए प्रसिद्ध है।
वायु पुराण में नर्मदा (रेवा) को 'पितरों की पुत्री' बताया गया है; अमरकंटक से भरूच तक के तट पिंडदान के लिए पवित्र माने जाते हैं।

पितृ पक्ष के पावन अवसर पर शूलपाणेश्वर महादेव तीर्थ (गुजरात), चाणोद त्रिवेणी संगम (वडोदरा), श्रीरंगम का अम्मा मंडपम (तमिलनाडु) और नर्मदा (रेवा) के तट — ये चार तीर्थस्थल पिंडदान, तर्पण और पितृ शांति के लिए देश के सबसे पवित्र केंद्रों में गिने जाते हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इन स्थानों की विशिष्टता इन्हें भारत की मोक्ष-परंपरा का अभिन्न अंग बनाती है।

शूलपाणेश्वर महादेव — नर्मदा तट का पापमुक्ति तीर्थ

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, भगवान शिव ने जब अंधकासुर नामक दैत्य का वध किया, तो उनका त्रिशूल दैत्य के दूषित रक्त से मलिन हो गया। महादेव ने समस्त पृथ्वी का भ्रमण किया और अंततः नर्मदा नदी के तट पर आकर अपना त्रिशूल भूमि में गाड़ दिया, जहाँ एक पवित्र जलधारा ने उसे शुद्ध किया।

उसी स्थान पर एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने स्वयं स्थापित किया — और इसी से इस तीर्थ का नाम 'शूलपाणेश्वर' पड़ा। मूल मंदिर पहले महाराष्ट्र सीमा से सटे मणिबेली गाँव में घने वन क्षेत्र और शूलपाणेश्वर झरने के निकट स्थित था। 1994 में सरदार सरोवर बाँध के जलस्तर बढ़ने से यह मूल मंदिर और शिवलिंग जलमग्न हो गए।

तत्पश्चात् गुजरात सरकार ने एकता नगर (केवडिया) के निकट गोरा ब्रिज के समीप ऊँचाई पर नए शूलपाणेश्वर मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कराया। मान्यता है कि यहाँ नर्मदा में स्नान और पितरों का तर्पण करने से बड़े से बड़े पापों का क्षय होता है, जो इसे पिंडदान के लिए अत्यंत पवित्र स्थल बनाता है।

चाणोद — गुजरात का 'दक्षिणी प्रयाग'

गुजरात के वडोदरा जिले के डभोई तालुका में स्थित चाणोद (जिसे चांदोद भी कहा जाता है) को आध्यात्मिक परंपरा में 'दक्षिणी प्रयाग' की उपाधि दी गई है। यहाँ नर्मदा, ओरसंग और अदृश्य रूप से प्रवाहित होने वाली सरस्वती — इन तीन पवित्र नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। हिंदू धर्म में मृत्योपरांत अंतिम संस्कार, अस्थि विसर्जन और पिंडदान के लिए यह देश के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना गया है।

यहाँ का सबसे प्रसिद्ध 'मल्हार राव घाट' लगभग 1,000 वर्ष पूर्व बना था। ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, अहिल्याबाई होल्कर के ससुर मल्हार राव होल्कर के एक मंत्री ने राज्य कोष से धन चुराया था। जब वह धन एक पवित्र तुलसी के पौधे के नीचे से बरामद हुआ, तो राजा ने उसे जनहित और धर्म-कार्य में लगाते हुए इस विशाल घाट का निर्माण कराया।

यह घाट 60 फीट चौड़ा और 64 सीढ़ियों वाला है। श्रद्धालु नाव द्वारा त्रिवेणी संगम के मध्य तक जाते हैं और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान संपन्न करते हैं।

श्रीरंगम का अम्मा मंडपम — दक्षिण भारत की पितृ श्रद्धा का केंद्र

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में कावेरी नदी के तट पर स्थित श्रीरंगम का 'अम्मा मंडपम' घाट पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए विश्व-स्तर पर प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में कावेरी को अत्यंत पवित्र माना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार ताई अमावस्या, महालय अमावस्या (पितृ पक्ष) और आदि अमावस्या के विशेष अवसरों पर यहाँ हज़ारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। भक्त कावेरी में स्नान कर पुजारियों के वैदिक मार्गदर्शन में अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए 'तर्पणम्' संपन्न करते हैं। इस क्षेत्र में मान्यता है कि पूर्वजों का तर्पण करने से लौकिक कष्ट दूर होते हैं और पारिवारिक समृद्धि आती है।

अम्मा मंडपम में अनुष्ठान पूर्ण करने के पश्चात् ही श्रद्धालु भगवान श्रीरंगनाथ स्वामी के मुख्य मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं — यह परंपरा जीवन और मृत्यु के बीच के संतुलन को रेखांकित करती है।

नर्मदा (रेवा) — पितरों की पुत्री और अक्षय पुण्य की नदी

भारत की मोक्ष-यात्राओं का वर्णन नर्मदा के उल्लेख के बिना अधूरा है। स्कंद पुराण के 'रेवा खंड' सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में नर्मदा को 'रेवा' नाम से संबोधित किया गया है। वायु पुराण में नर्मदा को 'पितरों की पुत्री' बताया गया है, जो इस नदी के पिंडदान संदर्भ में महत्व को और गहरा करता है।

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, रेवा (नर्मदा) के किसी भी तट पर किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान 'अक्षय' — अर्थात् कभी नष्ट न होने वाला — पुण्य प्रदान करता है। अन्य नदियों से भिन्न, नर्मदा में केवल स्नान ही नहीं, बल्कि दर्शन मात्र से भी पापों का नाश माना गया है। नर्मदा तल से प्राप्त 'नर्मदेश्वर' या 'बाण लिंग' की पूजा बिना प्राण-प्रतिष्ठा के भी संभव है।

पितृ पक्ष में अमरकंटक से लेकर भरूच तक फैले नर्मदा तट पर पिंडदान से पूर्वजों की तृप्ति और आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलने की मान्यता सदियों से प्रचलित है।

इन तीर्थों का सामूहिक महत्व

शूलपाणेश्वर की पौराणिक गाथा, चाणोद का त्रिवेणी संगम, श्रीरंगम का अम्मा मंडपम और रेवा की मोक्षदायिनी धारा — ये सभी तीर्थस्थल मनुष्य को उसकी जड़ों और पूर्वजों की स्मृति से जोड़ते हैं। पितृ पक्ष के दौरान इन स्थानों पर श्रद्धालुओं की उपस्थिति भारत की अटूट श्राद्ध-परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है।

संपादकीय दृष्टिकोण

ऐतिहासिक स्थापत्य और जीवंत लोक-परंपरा एकसाथ मिलती हैं। शूलपाणेश्वर का जलमग्न होना और उसका पुनर्निर्माण विकास बनाम विरासत के उस तनाव को भी रेखांकित करता है जो सरदार सरोवर परियोजना से जुड़ा रहा है। चाणोद जैसे कम-चर्चित तीर्थों का 'दक्षिणी प्रयाग' के रूप में उभरना बताता है कि भारत की श्राद्ध-परंपरा केवल काशी या गया तक सीमित नहीं है — वह नदी-नदी और घाट-घाट पर फैली है। मुख्यधारा की कवरेज प्रायः इन क्षेत्रीय तीर्थों की सांस्कृतिक गहराई को अनदेखा कर देती है।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शूलपाणेश्वर महादेव तीर्थ क्यों पवित्र माना जाता है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने अंधकासुर वध के बाद अपने त्रिशूल को शुद्ध करने के लिए नर्मदा तट पर उसे गाड़ा था, जहाँ स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। यहाँ नर्मदा स्नान और पितरों का तर्पण पापमुक्ति का माध्यम माना गया है।
चाणोद को 'दक्षिणी प्रयाग' क्यों कहते हैं?
गुजरात के वडोदरा जिले में स्थित चाणोद में नर्मदा, ओरसंग और गुप्त सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है, जो प्रयागराज की तरह तीन नदियों के मिलन का पवित्र स्थल है। इसी कारण इसे 'दक्षिणी प्रयाग' की उपाधि दी गई है और यह अस्थि विसर्जन व पिंडदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रीरंगम के अम्मा मंडपम पर पितृ तर्पण के लिए कब जाएँ?
हिंदू पंचांग के अनुसार ताई अमावस्या, महालय अमावस्या (पितृ पक्ष) और आदि अमावस्या के अवसरों पर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में कावेरी तट पर स्थित अम्मा मंडपम पर विशेष तर्पणम् किया जाता है। इन दिनों हज़ारों श्रद्धालु यहाँ एकत्र होते हैं।
नर्मदा नदी को पितृ पक्ष में इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
वायु पुराण में नर्मदा को 'पितरों की पुत्री' कहा गया है और स्कंद पुराण के रेवा खंड में इसके किसी भी तट पर किया गया श्राद्ध 'अक्षय पुण्य' देने वाला बताया गया है। अमरकंटक से भरूच तक के तट पिंडदान के लिए पवित्र माने जाते हैं।
मल्हार राव घाट (चाणोद) का निर्माण किसने और कब कराया था?
ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, लगभग 1,000 वर्ष पूर्व अहिल्याबाई होल्कर के ससुर मल्हार राव होल्कर के एक मंत्री द्वारा चुराए गए राज्य कोष के धन को एक तुलसी पौधे के नीचे से बरामद कर राजा ने जनहित में इस 60 फीट चौड़े और 64 सीढ़ियों वाले घाट का निर्माण कराया।
राष्ट्र प्रेस
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