पितृपक्ष 2026: नासिक की गोदावरी और पंढरपुर की चंद्रभागा पर पितृकर्म की पावन परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
पितृपक्ष के पावन अवसर पर महाराष्ट्र के दो प्रमुख तीर्थ — नासिक और पंढरपुर — पूर्वजों की आत्मा की शांति एवं मोक्ष की कामना लेकर आए श्रद्धालुओं से भर उठते हैं। नासिक में गोदावरी नदी के तट पर और पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के घाट पर स्नान, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। इन स्थलों को हिंदू मान्यताओं में पितृकर्म के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
नासिक और गोदावरी तट का महत्व
गोदावरी नदी को 'दक्षिण गंगा' के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान गोदावरी के पवित्र जल में स्नान कर पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण करने और पिंडदान करने से पूर्वजों को शांति एवं तृप्ति प्राप्त होती है। नासिक के पंचवटी क्षेत्र और रामकुंड को इस दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है।
श्रद्धालु रामकुंड में स्नान के पश्चात ब्राह्मण भोजन एवं दान-दक्षिणा का आयोजन करते हैं। मान्यता है कि इन विधि-विधान से किए गए कार्यों से पितरों की आत्मा प्रसन्न होती है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है।
त्र्यंबकेश्वर — गोदावरी के उद्गम पर विशेष अनुष्ठान
नासिक के निकट स्थित त्र्यंबकेश्वर को पितृकर्म की दृष्टि से धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है। यह स्थान गोदावरी नदी के उद्गम क्षेत्र के रूप में श्रद्धालुओं के बीच पूजनीय है। यहाँ त्रिपिंडी श्राद्ध और नारायण नागबली जैसे विशिष्ट अनुष्ठान संपन्न किए जाने की परंपरा है।
मान्यता है कि त्रिपिंडी श्राद्ध से अतृप्त पितरों को तृप्ति और मुक्ति मिलती है। कुशावर्त कुंड को भी इस क्षेत्र में तर्पण का महत्वपूर्ण केंद्र माना गया है। पितृपक्ष में देशभर से श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर पूर्वजों की शांति की कामना करते हैं।
पंढरपुर और चंद्रभागा तट का धार्मिक संदर्भ
महाराष्ट्र का पंढरपुर भगवान श्री विट्ठल और माता रुक्मिणी के पवित्र धाम के रूप में देशभर में प्रसिद्ध है। यहाँ से प्रवाहित होने वाली भीमा नदी अपने अर्धचंद्राकार प्रवाह के कारण चंद्रभागा के नाम से पहचानी जाती है।
पितृपक्ष में श्रद्धालु चंद्रभागा नदी के घाट पर स्नान कर पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान संपन्न करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहाँ विधिवत किए गए पितृकर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।
विष्णुपद मंदिर और पिंडदान की परंपरा
पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के मध्य स्थित विष्णुपद मंदिर भी पितृकर्म से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ भगवान विष्णु के चरण-चिह्न अंकित हैं। श्रद्धालु यहाँ पितरों के मोक्ष और शांति की कामना लेकर पिंडदान एवं श्राद्ध कर्म करते हैं।
गौरतलब है कि पितृपक्ष की यह परंपरा केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि यह पीढ़ियों के बीच आत्मीय जुड़ाव और कृतज्ञता का भाव भी है। नासिक और पंढरपुर जैसे तीर्थ इस सांस्कृतिक निरंतरता के जीवंत प्रतीक हैं। आने वाले दिनों में पितृपक्ष की समाप्ति तक इन दोनों तीर्थों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहेगी।