पुनपुन घाट: गया से पहले 'मोक्ष का प्रथम द्वार', जानें पितृपक्ष में इसका धार्मिक महत्व
सारांश
मुख्य बातें
पुनपुन नदी का घाट, जो पटना जिले के समीप स्थित है, हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष के दौरान असाधारण महत्व रखता है। मान्यताओं के अनुसार, गयाजी धाम में पिंडदान करने से पहले इस घाट पर स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान करना अनिवार्य माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में इसे 'मोक्ष का प्रथम द्वार' और 'आदिगंगा' की संज्ञा दी गई है।
पितृपक्ष क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण
पितृपक्ष हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का पवित्र काल है। इन दिनों श्रद्धालु अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वजों के नाम से किए गए दान-पुण्य से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस काल में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बिहार स्थित गयाजी धाम पहुँचते हैं। गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में गयाजी को पितृ कर्मों के लिए सर्वोच्च तीर्थ बताया गया है।
गयाजी का पौराणिक और धार्मिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नामक तपस्वी असुर के शरीर पर भगवान विष्णु ने अपने चरण रखे थे। जहाँ भगवान विष्णु का पदचिह्न माना जाता है, वहीं आज प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे पवित्र चरण चिह्न विद्यमान हैं, जिनमें शंख, चक्र और गदा जैसे नौ प्रतीक अंकित हैं।
गयाजी में 48 प्रमुख वेदियाँ और अनेक पवित्र स्थल हैं — विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी तट, अक्षयवट, सीता कुंड, पंचतीर्थ, प्रेतशिला, रामशिला, ब्रह्मकुंड और गया शिरोमणि क्षेत्र प्रमुख हैं। धार्मिक मान्यता है कि यहाँ विधि-विधान से किए गए पिंडदान से पितरों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
पुनपुन घाट: गया से पहले का 'प्रथम पड़ाव'
धार्मिक परंपरा में एक ऐसे तथ्य की अक्सर अनदेखी होती है कि गयाजी पहुँचने से पहले पुनपुन नदी के घाट पर तर्पण और प्रथम पिंडदान करना आवश्यक बताया गया है। पटना जिले के निकट स्थित यह घाट पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं की यात्रा का पहला पवित्र पड़ाव माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पुनपुन में स्नान और तर्पण के बाद प्रथम पिंडदान किया जाता है। इसके पश्चात गयाजी जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और अन्य कर्मकांड संपन्न होते हैं। यही कारण है कि पितृपक्ष में आज भी अनेक श्रद्धालु अपनी धार्मिक यात्रा पुनपुन से ही आरंभ करते हैं।
भगवान राम और माता सीता की पौराणिक कथा
पुनपुन घाट से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता भगवान राम और माता सीता (जानकी) से संबंधित है। धार्मिक आख्यानों के अनुसार, जब भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान करने के लिए निकले, तब उन्होंने गया जाने से पहले पुनपुन नदी के तट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था।
कथा के अनुसार, भगवान राम ने माता जानकी के साथ पुनपुन नदी के किनारे सर्वप्रथम पिंड अर्पित किए और तत्पश्चात गया पहुँचकर फल्गु नदी के तट पर विधिपूर्वक पिंडदान किया। इसी मान्यता के आधार पर पुनपुन को 'मोक्ष का प्रथम द्वार' की संज्ञा दी जाती है। इसके साथ ही, माता सीता द्वारा फल्गु नदी तट पर स्वतंत्र रूप से पिंडदान करने की कथा भी प्रचलित है।
धार्मिक ग्रंथों में पुनपुन का उल्लेख
गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, पुनपुन नदी को 'आदिगंगा' कहा गया है। धार्मिक परंपरा में यह विश्वास प्रचलित है कि पुनपुन नदी के तट पर पितरों के लिए तर्पण करने से पूर्वजों का उद्धार होता है और सात पीढ़ियों तक इसका पुण्य प्राप्त होता है। यह आस्था पुनपुन घाट को पितृपक्ष की तीर्थयात्रा का एक अपरिहार्य अंग बनाती है।
पितृपक्ष की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति और पारिवारिक निरंतरता की भावना को भी जीवित रखती है — और पुनपुन घाट इस यात्रा का वह प्रथम बिंदु है जहाँ से पितरों के मोक्ष की यह पवित्र यात्रा आरंभ होती है।