30 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पुनपुन घाट पर पितृपक्ष: औरंगाबाद में हजारों श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, गया जी के लिए हुए रवाना

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पुनपुन घाट पर पितृपक्ष: औरंगाबाद में हजारों श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, गया जी के लिए हुए रवाना

सारांश

बिहार के औरंगाबाद में पुनपुन घाट पर पितृपक्ष मेले के दौरान हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से उमड़ रहे हैं। आदिगंगा के तट पर पिंडदान कर पितरों को मोक्ष दिलाने की यह परंपरा त्रेता काल से अनवरत चली आ रही है — और आज भी उतनी ही जीवंत है।

मुख्य बातें

औरंगाबाद, बिहार के पुनपुन घाट पर 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन पहुँच रहे हैं।
आदिगंगा पुनपुन को मगध क्षेत्र की प्रथम वेदी माना जाता है; यहाँ पिंडदान के बाद श्रद्धालु गया जी के लिए प्रस्थान करते हैं।
पुरोहितों के अनुसार पुराणों में वर्णित 45 वेदियों में 5 प्रमुख तीर्थ हैं, जिनमें आदि गंगा पुनपुन एक है।
वायु पुराण और पद्म पुराण में उल्लेख है कि भगवान राम और माता सीता ने यहाँ पितरों के लिए सर्वप्रथम पिंडदान किया था।
मदनपुर पहाड़ी स्थित सीता थापा दर्शनीय स्थल पर माता सीता के हाथ के निशान होने की धार्मिक मान्यता है।
मध्य प्रदेश के सतना , ग्वालियर सहित दूरदराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु पारिवारिक पितरों के श्राद्ध के लिए पहुँच रहे हैं।

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित पुनपुन घाट पर 30 सितंबर को आस्था का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले के दौरान देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आदिगंगा के नाम से विख्यात पुनपुन नदी के तट पर पहुँच रहे हैं। अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान सम्पन्न कर श्रद्धालु गया जी के लिए प्रस्थान कर रहे हैं।

पितृपक्ष का धार्मिक महत्व

पुनपुन घाट पर उपस्थित तीर्थ पुरोहित के अनुसार, पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तिथि तक मनाया जाता है। इस अवधि में पितरों को सद्गति प्रदान करने हेतु श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पितृ कर्मों का विशेष आयोजन होता है। पुरोहित ने बताया, 'पुराणों में कुल 45 वेदियों की कथा है, जिनमें पाँच तीर्थ अत्यंत प्रमुख हैं — सीता कुंड, फल्गु तीर्थ, विष्णु पद, प्रेत शिला और आदि गंगा पुनपुन।'

एक अन्य विद्वान ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्वज पृथ्वी लोक पर भटकते रहते हैं और उन्हें तब तक मोक्ष नहीं मिलता जब तक उनके वंशज गया जी में पिंडदान न करें। गरुड़ पुराण में इस परंपरा का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार पितृ ऋण से मुक्ति तभी संभव है जब पुत्र अपने माता-पिता का विधिवत श्राद्ध करे।

श्रद्धालुओं की आस्था

मध्य प्रदेश के सतना से आए एक श्रद्धालु ने बताया, 'हम अपने पिताजी का पिंडदान करने आए हैं। हमारे पूर्वज बताते हैं कि बिना पुनपुन में पिंडदान किए गया जी का श्राद्ध अधूरा है। गया श्राद्ध करने से हमारे पितरों को मुक्ति मिलती है।'

ग्वालियर से आई एक महिला श्रद्धालु ने कहा, 'जो हमारे बड़े-बुजुर्ग बताते हैं, उसी परंपरा के अनुसार हम यहाँ पूजा-पाठ और जल अर्पण करने आए हैं ताकि हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिले। मैं अपने ससुर, सास और बाबा ससुर का श्राद्ध करने आई हूँ।' एक अन्य महिला ने बताया कि वह अपने बेटे के साथ अपने पति का श्राद्ध सम्पन्न करने पुनपुन तट पर पहुँची हैं।

पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, मगध क्षेत्र की प्रथम वेदी मानी जाने वाली आदिगंगा पुनपुन के तट पर पिंडदान का विशेष महत्व है। वायु पुराण एवं पद्म पुराण में उल्लेख है कि त्रेता काल में भगवान श्री राम और माता सीता ने गया क्षेत्र की प्रथम वेदी — आदि गंगा पुनपुन — के तट पर अपने पितरों के मोक्ष हेतु सर्वप्रथम पिंडदान किया था।

इसके पश्चात उन्होंने माँ उमगेश्वरी की पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में रात्रि विश्राम किया, जिसे आज सीता थापा के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि वहाँ आज भी माता सीता के हाथ के निशान मौजूद हैं। यह स्थल औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड की मदनपुर पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से भगवान राम दूसरे दिन गया जी के लिए प्रस्थान किए थे।

द्वापर काल में महाभारत युद्ध के उपरांत पांडवों ने भी अपने पितरों और युद्ध में मारे गए स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए गया जी आकर पिंडदान किया था। तब से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है।

आगे क्या

पितृपक्ष मेला जारी है और प्रतिदिन श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है। पुनपुन घाट पर पिंडदान के बाद श्रद्धालु गया जी की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ पितृपक्ष के दौरान देशभर से लाखों तीर्थयात्री जुटते हैं। यह धार्मिक यात्रा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस सांस्कृतिक निरंतरता की है जो सहस्राब्दियों से मगध की माटी में जड़ें जमाए हुए है। गौरतलब है कि जब आधुनिकता के दौर में धार्मिक परंपराओं के क्षीण होने की चर्चा होती है, तब सतना और ग्वालियर जैसे दूरदराज स्थानों से आए श्रद्धालु यह संकेत देते हैं कि पितृपक्ष की आस्था न केवल जीवित है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजबूत हो रही है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर भीड़ के आँकड़ों तक सिमट जाती है, जबकि असली कहानी उस सामाजिक ताने-बाने में है जो यह तीर्थयात्रा बुनती है — परिवारों को जोड़ते हुए, स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हुए।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुनपुन घाट पर पिंडदान का क्या महत्व है?
पुनपुन घाट को हिंदू धर्मशास्त्रों में मगध क्षेत्र की प्रथम वेदी और आदिगंगा माना जाता है। मान्यता है कि गया जी में श्राद्ध से पहले यहाँ पिंडदान करना अनिवार्य है, अन्यथा गया का श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
पितृपक्ष मेला कब और कितने दिनों तक चलता है?
पितृपक्ष मेला आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से आरंभ होकर अमावस्या तिथि तक 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान श्रद्धालु प्रतिदिन पुनपुन घाट पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं।
भगवान राम और पुनपुन घाट का क्या संबंध है?
वायु पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, त्रेता काल में भगवान राम और माता सीता ने अपने पितरों के मोक्ष हेतु गया क्षेत्र की प्रथम वेदी — आदि गंगा पुनपुन — पर सर्वप्रथम पिंडदान किया था। इसके बाद वे मदनपुर पहाड़ी पर रुककर गया जी के लिए रवाना हुए थे।
सीता थापा क्या है और यह कहाँ स्थित है?
सीता थापा औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड की मदनपुर पहाड़ी पर स्थित एक धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि यहाँ माता सीता के हाथ के निशान मौजूद हैं और यहाँ भगवान राम ने पिंडदान के बाद रात्रि विश्राम किया था।
पुनपुन में पिंडदान से कौन-से पितृ कर्म किए जाते हैं?
पुनपुन घाट पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान — तीनों प्रमुख पितृ कर्म सम्पन्न किए जाते हैं। पुरोहितों के अनुसार इन कर्मों से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है और उनके वंशजों को सुख, शांति व समृद्धि मिलती है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 19 घंटे पहले
  2. 4 दिन पहले
  3. 1 सप्ताह पहले
  4. 1 साल पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले