22 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पितृपक्ष 2026: गया से पहले पुनपुन नदी घाट पर पिंडदान क्यों है ज़रूरी, भगवान राम की मान्यता से जुड़ा है रहस्य

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पितृपक्ष 2026: गया से पहले पुनपुन नदी घाट पर पिंडदान क्यों है ज़रूरी, भगवान राम की मान्यता से जुड़ा है रहस्य

सारांश

गया जी से पहले पुनपुन नदी — यह सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि पितृमोक्ष यात्रा का पहला द्वार है। भगवान राम ने स्वयं यहाँ प्रथम पिंड अर्पित किया था, और गरुड़ पुराण इसे 'आदिगंगा' कहता है। पितृपक्ष 2026 में जानें इस घाट का संपूर्ण महत्व।

मुख्य बातें

पुनपुन नदी घाट , पटना जिले के समीप, पितृपक्ष में गया से पहले प्रथम पिंडदान का स्थान माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान राम ने राजा दशरथ के श्राद्ध के लिए गया जाने से पूर्व यहाँ माता जानकी के साथ तर्पण किया था।
गरुड़ पुराण में पुनपुन नदी को 'आदिगंगा' कहा गया है।
मान्यता है कि यहाँ तर्पण से सात पीढ़ियों को पुण्यफल मिलता है।
पिंडदान का सही क्रम है — पहले पुनपुन में प्रथम पिंडदान, फिर गया जी में फल्गु नदी के तट पर संपूर्ण अनुष्ठान।

पितृपक्ष 2026 के अवसर पर देशभर के श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं। बिहार के गया जी को पितरों के पिंडदान के लिए सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है, किंतु धार्मिक परंपराओं के अनुसार गया पहुँचने से पूर्व पुनपुन नदी के घाट पर तर्पण और प्रथम पिंडदान करना अनिवार्य बताया गया है। इस घाट को धार्मिक मान्यताओं में 'पितृमोक्ष का पहला द्वार' कहा जाता है।

पुनपुन घाट का धार्मिक महत्व

पटना जिले के समीप स्थित पुनपुन नदी का यह घाट पितृपक्ष के दौरान विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गया में पिंडदान करने से पहले श्रद्धालुओं को पुनपुन नदी में स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान करना चाहिए। इसके पश्चात गया जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

यह परंपरा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि पितृमोक्ष की यात्रा का क्रमबद्ध विधान मानी जाती है। गौरतलब है कि पुनपुन से यात्रा शुरू करने की यह परिपाटी सदियों से चली आ रही है और आज भी लाखों श्रद्धालु इसी परंपरा का पालन करते हैं।

भगवान राम और माता सीता से जुड़ी पौराणिक कथा

पुनपुन घाट की सबसे विशिष्ट पहचान उससे जुड़ी भगवान राम और माता जानकी की पौराणिक कथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान करने के लिए निकले, तो उन्होंने गया प्रस्थान से पूर्व पुनपुन नदी के तट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था।

मान्यता है कि भगवान राम ने माता जानकी के साथ पुनपुन नदी के किनारे सर्वप्रथम पिंड अर्पित किया। इसके बाद वे गया पहुँचे और फल्गु नदी के तट पर विधि-विधान से पिंडदान किया। इसी पौराणिक संदर्भ के कारण पुनपुन को 'मोक्ष का प्रथम द्वार' कहा जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में पुनपुन नदी का उल्लेख

पुनपुन नदी को लेकर धार्मिक ग्रंथों में भी महत्वपूर्ण मान्यताएँ मिलती हैं। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार इसे 'आदिगंगा' कहा गया है। यह मान्यता है कि पुनपुन नदी के तट पर पितरों के लिए तर्पण करने से पूर्वजों का उद्धार होता है और सात पीढ़ियों को इसका पुण्यफल प्राप्त होता है।

यह ऐसे समय में विशेष प्रासंगिक है जब पितृपक्ष के दौरान गया में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और पुनपुन घाट उनकी धार्मिक यात्रा का पहला पड़ाव बनता है।

पिंडदान का सही क्रम और विधि

धार्मिक परंपरा के अनुसार पिंडदान यात्रा का क्रम इस प्रकार है — सर्वप्रथम पुनपुन नदी के तट पर स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान, और उसके बाद गया जी में फल्गु नदी के तट पर पूर्ण विधि-विधान के साथ पिंडदान एवं अन्य कर्मकांड। श्रद्धालुओं के लिए यह दोहरी यात्रा पितृमोक्ष की पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है।

यही कारण है कि पितृपक्ष में आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी धार्मिक यात्रा पुनपुन से आरंभ करते हैं। आने वाले दिनों में पितृपक्ष के समापन तक पुनपुन घाट और गया जी में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और बढ़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की तीर्थयात्रा संस्कृति में क्रमबद्ध अनुष्ठान-विज्ञान की झलक भी है — जहाँ यात्रा का हर पड़ाव एक उद्देश्य से जुड़ा है। गौरतलब है कि पितृपक्ष के दौरान गया में भारी भीड़ और व्यवस्थागत दबाव के बीच पुनपुन जैसे सहायक तीर्थों की महत्ता और बढ़ जाती है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर केवल गया पर केंद्रित रहती है और इस 'प्रथम द्वार' की उपेक्षा करती है, जबकि पौराणिक और पुराणिक साक्ष्य इसे यात्रा का अभिन्न अंग बताते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह जानना ज़रूरी है कि पितृमोक्ष की पूर्ण यात्रा पुनपुन से शुरू होती है, गया पर समाप्त नहीं।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुनपुन नदी घाट पर पिंडदान क्यों करना ज़रूरी है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार पुनपुन नदी घाट को 'पितृमोक्ष का पहला द्वार' कहा जाता है और गया में पिंडदान से पहले यहाँ प्रथम पिंडदान करना अनिवार्य माना गया है। स्वयं भगवान राम ने राजा दशरथ के श्राद्ध के लिए गया जाने से पूर्व यहाँ तर्पण किया था।
पुनपुन नदी को 'आदिगंगा' क्यों कहा जाता है?
गरुड़ पुराण की मान्यता के अनुसार पुनपुन नदी को 'आदिगंगा' का दर्जा दिया गया है। यह नदी पितृकर्म के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है और इसके तट पर तर्पण से सात पीढ़ियों को पुण्यफल मिलने की मान्यता है।
गया पिंडदान यात्रा का सही क्रम क्या है?
धार्मिक परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम पटना जिले के समीप पुनपुन नदी के घाट पर स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान किया जाता है। इसके बाद गया जाकर फल्गु नदी के तट पर विधि-विधान से पिंडदान और अन्य कर्मकांड संपन्न किए जाते हैं।
भगवान राम का पुनपुन नदी से क्या संबंध है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए गया प्रस्थान से पूर्व माता जानकी के साथ पुनपुन नदी के तट पर प्रथम पिंड अर्पित किया था। इसी मान्यता के आधार पर यह स्थान पितृमोक्ष यात्रा का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है।
पितृपक्ष 2026 में पुनपुन घाट कहाँ स्थित है?
पुनपुन नदी का यह पवित्र घाट बिहार के पटना जिले के समीप स्थित है। पितृपक्ष के दौरान यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी गया यात्रा से पहले तर्पण और प्रथम पिंडदान के लिए पहुँचते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 सप्ताह पहले
  2. 1 साल पहले
  3. 1 साल पहले
  4. 1 साल पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले