पितृपक्ष 2026: गया से पहले पुनपुन नदी घाट पर पिंडदान क्यों है ज़रूरी, भगवान राम की मान्यता से जुड़ा है रहस्य
सारांश
मुख्य बातें
पितृपक्ष 2026 के अवसर पर देशभर के श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं। बिहार के गया जी को पितरों के पिंडदान के लिए सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है, किंतु धार्मिक परंपराओं के अनुसार गया पहुँचने से पूर्व पुनपुन नदी के घाट पर तर्पण और प्रथम पिंडदान करना अनिवार्य बताया गया है। इस घाट को धार्मिक मान्यताओं में 'पितृमोक्ष का पहला द्वार' कहा जाता है।
पुनपुन घाट का धार्मिक महत्व
पटना जिले के समीप स्थित पुनपुन नदी का यह घाट पितृपक्ष के दौरान विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गया में पिंडदान करने से पहले श्रद्धालुओं को पुनपुन नदी में स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान करना चाहिए। इसके पश्चात गया जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।
यह परंपरा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि पितृमोक्ष की यात्रा का क्रमबद्ध विधान मानी जाती है। गौरतलब है कि पुनपुन से यात्रा शुरू करने की यह परिपाटी सदियों से चली आ रही है और आज भी लाखों श्रद्धालु इसी परंपरा का पालन करते हैं।
भगवान राम और माता सीता से जुड़ी पौराणिक कथा
पुनपुन घाट की सबसे विशिष्ट पहचान उससे जुड़ी भगवान राम और माता जानकी की पौराणिक कथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान करने के लिए निकले, तो उन्होंने गया प्रस्थान से पूर्व पुनपुन नदी के तट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था।
मान्यता है कि भगवान राम ने माता जानकी के साथ पुनपुन नदी के किनारे सर्वप्रथम पिंड अर्पित किया। इसके बाद वे गया पहुँचे और फल्गु नदी के तट पर विधि-विधान से पिंडदान किया। इसी पौराणिक संदर्भ के कारण पुनपुन को 'मोक्ष का प्रथम द्वार' कहा जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में पुनपुन नदी का उल्लेख
पुनपुन नदी को लेकर धार्मिक ग्रंथों में भी महत्वपूर्ण मान्यताएँ मिलती हैं। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार इसे 'आदिगंगा' कहा गया है। यह मान्यता है कि पुनपुन नदी के तट पर पितरों के लिए तर्पण करने से पूर्वजों का उद्धार होता है और सात पीढ़ियों को इसका पुण्यफल प्राप्त होता है।
यह ऐसे समय में विशेष प्रासंगिक है जब पितृपक्ष के दौरान गया में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और पुनपुन घाट उनकी धार्मिक यात्रा का पहला पड़ाव बनता है।
पिंडदान का सही क्रम और विधि
धार्मिक परंपरा के अनुसार पिंडदान यात्रा का क्रम इस प्रकार है — सर्वप्रथम पुनपुन नदी के तट पर स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान, और उसके बाद गया जी में फल्गु नदी के तट पर पूर्ण विधि-विधान के साथ पिंडदान एवं अन्य कर्मकांड। श्रद्धालुओं के लिए यह दोहरी यात्रा पितृमोक्ष की पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है।
यही कारण है कि पितृपक्ष में आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी धार्मिक यात्रा पुनपुन से आरंभ करते हैं। आने वाले दिनों में पितृपक्ष के समापन तक पुनपुन घाट और गया जी में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और बढ़ने की संभावना है।