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पितृपक्ष 2026: पुष्कर के 52 घाटों पर उमड़े श्रद्धालु, जानें श्राद्ध-पिंडदान का धार्मिक महत्व

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पितृपक्ष 2026: पुष्कर के 52 घाटों पर उमड़े श्रद्धालु, जानें श्राद्ध-पिंडदान का धार्मिक महत्व

सारांश

तीर्थ गुरु पुष्कर के 52 घाट पितृपक्ष में एक बार फिर श्रद्धा और परंपरा का संगम बन गए हैं। भगवान श्रीराम के पुष्कर में महाराज दशरथ के पिंडदान से जुड़ी पौराणिक कथा और पद्म पुराण में वर्णित महात्म्य इस स्थल को देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ-तीर्थों में स्थापित करता है।

मुख्य बातें

पुष्कर सरोवर के 52 घाटों पर पितृपक्ष में देशभर से हज़ारों श्रद्धालु श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए पहुँचते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने पुष्कर में महाराज दशरथ का बालू-जल से पिंडदान किया था, जो इस परंपरा का पौराणिक आधार है।
प्रमुख घाटों में वराह घाट , ब्रह्मा घाट और गौ घाट शामिल हैं, जहाँ पितृ कर्म किए जाते हैं।
पद्म पुराण में पुष्कर तीर्थ के श्राद्ध को पितरों की तृप्ति और उच्च लोक-प्राप्ति से जोड़ा गया है।
अश्विन माह के 15 दिवसीय पितृ पक्ष में पिंडदान का धार्मिक महत्व सर्वाधिक माना जाता है।

पितृपक्ष के पावन अवसर पर राजस्थान के पुष्कर में स्थित पुष्कर सरोवर के 52 घाटों पर देशभर से हज़ारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने पहुँच रहे हैं। ब्रह्माजी की नगरी और तीर्थ गुरु के रूप में विख्यात पुष्कर में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों के लिए किए गए इन अनुष्ठानों से उन्हें तृप्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अश्विन माह में मनाया जाने वाला यह 15 दिवसीय पितृ पक्ष हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और श्रद्धांजलि का सर्वोच्च काल माना गया है।

पुष्कर में पितृ कर्म का पौराणिक आधार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने वनवास काल में पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पुष्कर पहुँचकर अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान किया था। श्रीराम ने बालू और जल से पिंड निर्मित कर महाराज दशरथ का तर्पण संपन्न किया था। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण पुष्कर सरोवर के घाटों पर पितृ कर्म की परंपरा को असाधारण धार्मिक महत्व प्राप्त हुआ है।

इसके अतिरिक्त, पद्म पुराण में भी पुष्कर तीर्थ में किए गए श्राद्ध और पिंडदान को पितरों की तृप्ति और उन्हें उच्च लोक की प्राप्ति से सीधे जोड़ा गया है। यह ऐसे समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है जब देश के कई तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध कर्म होते हैं, परंतु पुष्कर को 'तीर्थ गुरु' का दर्जा मिला होने के कारण यहाँ की धार्मिक आस्था विशिष्ट मानी जाती है।

पुष्कर सरोवर के 52 घाट — आस्था के केंद्र

पुष्कर सरोवर के 52 घाट धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें वराह घाट, ब्रह्मा घाट और गौ घाट प्रमुख रूप से प्रसिद्ध हैं। श्रद्धालु इन घाटों पर पवित्र स्नान के पश्चात तर्पण और पिंडदान के अनुष्ठान संपन्न करते हैं।

पुष्कर झील की उत्पत्ति को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार इसका पवित्र जल भगवान विष्णु की नाभि से प्रकट हुआ था, जबकि दूसरी कथा में कहा गया है कि ब्रह्माजी द्वारा कमल का पुष्प गिराए जाने से इस सरोवर का अस्तित्व हुआ। इसी धार्मिक महत्ता के कारण पुष्कर युगों से हिंदू श्रद्धालुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में अग्रणी स्थान पर है।

श्राद्ध और पिंडदान का आध्यात्मिक महत्व

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान जन्म और पुनर्जन्म के कर्म-चक्र से मुक्ति तथा दिवंगत प्रियजनों एवं पूर्वजों की आत्मा के कल्याण के लिए किया जाता है। अश्विन माह में पिंडदान का महत्व अन्य समयों की तुलना में कहीं अधिक माना गया है।

गौरतलब है कि 15 दिवसीय पितृ पक्ष में पूरे देश के श्रद्धालु अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए तीर्थ स्थलों का रुख करते हैं, किंतु पुष्कर की विशेषता यह है कि यहाँ किया गया श्राद्ध पितरों को विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।

आम श्रद्धालुओं पर असर और आगे की स्थिति

पितृपक्ष के दौरान पुष्कर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियाँ विशेष व्यवस्थाएँ करती हैं। देश के कोने-कोने से आने वाले तीर्थयात्री यहाँ पहुँचकर वराह घाट, ब्रह्मा घाट और गौ घाट पर पूजन-अर्चन करते हैं।

पितृपक्ष की समाप्ति के साथ ही सर्व पितृ अमावस्या पर इस अनुष्ठान का चरमोत्कर्ष होता है, जब सबसे अधिक श्रद्धालु पुष्कर सरोवर के घाटों पर एकत्रित होते हैं। पुष्कर की यह धार्मिक परंपरा आने वाली पीढ़ियों को पितृ-भक्ति और भारतीय सनातन संस्कृति से जोड़ती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जल-संरक्षण और सामूहिक स्मृति के अंतर्संबंध को भी उजागर करता है। एक ओर लाखों श्रद्धालु पवित्र सरोवर में तर्पण करते हैं, वहीं पुष्कर झील की घटती जलसतह और बढ़ता प्रदूषण भार एक मूक विरोधाभास प्रस्तुत करता है जिसे मुख्यधारा की धार्मिक कवरेज प्रायः अनदेखा कर देती है। पितृ-भक्ति की यह परंपरा तभी सार्थक रहेगी जब उस सरोवर का संरक्षण भी उतनी ही गंभीरता से हो, जितनी श्रद्धा से उसके घाटों पर पिंड अर्पित किए जाते हैं।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुष्कर में पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और पिंडदान का क्या महत्व है?
पुष्कर को 'तीर्थ गुरु' माना जाता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ पितृपक्ष में किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पूर्वजों को तृप्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण में भी इसका उल्लेख पितरों को उच्च लोक दिलाने वाले तीर्थ के रूप में किया गया है।
पुष्कर में पिंडदान की परंपरा का पौराणिक आधार क्या है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान सीता और लक्ष्मण के साथ पुष्कर पहुँचकर बालू और जल से पिंड बनाकर अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध और तर्पण किया था। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण पुष्कर में पितृ कर्म की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पुष्कर सरोवर के 52 घाटों में प्रमुख घाट कौन-से हैं?
पुष्कर सरोवर के 52 घाटों में वराह घाट, ब्रह्मा घाट और गौ घाट सबसे प्रमुख हैं। श्रद्धालु इन्हीं घाटों पर पवित्र स्नान, तर्पण और पिंडदान के अनुष्ठान करते हैं।
पिंडदान किसलिए किया जाता है और अश्विन माह में इसका महत्व क्यों बढ़ जाता है?
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार पिंडदान जन्म-पुनर्जन्म के कर्म-चक्र से मुक्ति और दिवंगत पूर्वजों की आत्मा के कल्याण के लिए किया जाता है। अश्विन माह में पड़ने वाले 15 दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान का महत्व अन्य समयों की तुलना में विशेष रूप से अधिक माना गया है।
पुष्कर झील की उत्पत्ति के बारे में क्या मान्यताएँ हैं?
पुष्कर झील की उत्पत्ति को लेकर दो प्रमुख मान्यताएँ प्रचलित हैं — पहली के अनुसार इसका पवित्र जल भगवान विष्णु की नाभि से प्रकट हुआ, जबकि दूसरी कथा में ब्रह्माजी द्वारा कमल का पुष्प गिराए जाने से इस सरोवर के अस्तित्व को जोड़ा गया है। इन्हीं पौराणिक मान्यताओं के कारण पुष्कर युगों से हिंदू श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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