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पितृ पक्ष 2026: वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, पुजारी ने ऑनलाइन श्राद्ध को बताया 'सनातन का मज़ाक'

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पितृ पक्ष 2026: वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, पुजारी ने ऑनलाइन श्राद्ध को बताया 'सनातन का मज़ाक'

सारांश

पितृ पक्ष के पहले दिन काशी के पिशाचमोचन कुंड पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु उमड़े। लेकिन इस बार सिर्फ आस्था नहीं, बहस भी है — ऑनलाइन श्राद्ध की बढ़ती प्रवृत्ति पर पुजारी नीरज कुमार ने इसे 'सनातन धर्म का मज़ाक' करार दिया और कहा कि भोजन की तरह श्राद्ध भी हाथों से ही होता है।

मुख्य बातें

27 सितंबर 2026 को वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड पर पितृ पक्ष के पहले दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।
इस वर्ष पितृ पक्ष सामान्य पंद्रह के बजाय चौदह दिन का है; आज प्रतिपदा श्राद्ध था।
पुजारी नीरज कुमार ने ऑनलाइन श्राद्ध को 'सनातन धर्म का मज़ाक' बताते हुए इसका विरोध किया।
मान्यता के अनुसार पिशाचमोचन कुंड पर पिंडदान से काशी के बाहर मृत पितरों को भी मोक्ष मिलता है।
जो तीर्थस्थल नहीं जा सकते, उन्हें नज़दीकी मंदिर में ब्राह्मण भोजन कराने की सलाह दी गई।

पितृ पक्ष के पहले दिन 27 सितंबर 2026 को वाराणसी के ऐतिहासिक पिशाचमोचन कुंड पर देशभर से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लोग वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति की कामना लेकर यहाँ तर्पण और पिंडदान करने पहुँचे। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस पवित्र कुंड पर पिंडदान करने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है।

मुख्य घटनाक्रम

पिशाचमोचन कुंड परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। लोगों ने तर्पण और पिंडदान के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-पुण्य किया। यह दृश्य पितृ पक्ष की आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित करता है, जो भारतीय सनातन परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

पुजारी का स्पष्टीकरण: प्रतिपदा श्राद्ध का महत्व

कुंड परिसर के पुजारी नीरज कुमार ने बताया कि इस बार पितृ पक्ष चौदह दिन का है, जबकि सामान्यतः यह पंद्रह दिन का होता है। उन्होंने कहा, 'कल श्राद्ध पूर्णिमा थी और आज से पितृ पक्ष का पहला दिन — प्रतिपदा श्राद्ध — शुरू हुआ है। यह दिन पूरी तरह पितरों को समर्पित है। आज श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम का श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराते हैं।'

पुजारी नीरज कुमार ने पिशाचमोचन कुंड के आध्यात्मिक महत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है — कहावत है, 'मरने को देश है, तरने को काशी।' उनके अनुसार, 'काशी में मरने वाले को मोक्ष मिलता ही है, लेकिन जो काशी के बाहर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनकी मुक्ति के लिए यह कुंड है। यह व्यवस्था स्वयं परमेश्वर महादेव द्वारा बनाई गई है।'

ऑनलाइन श्राद्ध पर पुजारी की कड़ी आपत्ति

आधुनिक युग में बढ़ती ऑनलाइन श्राद्ध की प्रवृत्ति पर पुजारी नीरज कुमार ने कड़ी असहमति जताई। उन्होंने कहा, 'ऑनलाइन श्राद्ध नहीं होना चाहिए। जैसे मैं ऑनलाइन भोजन नहीं कर सकता, वैसे ही ऑनलाइन श्राद्ध भी नहीं हो सकता। श्राद्ध का अर्थ है पितरों को भोजन देना और भोजन हमेशा अपने हाथ से ही दिया जाता है।'

उन्होंने आगे कहा, 'आज श्राद्ध ऑनलाइन हो रहा है, दर्शन ऑनलाइन हो रहे हैं — यह हमारे सनातन धर्म का मज़ाक बनाना है। इस परंपरा को रोकना ज़रूरी है।' यह भी उल्लेखनीय है कि जब भी कोई श्रद्धालु उनके पास ऑनलाइन श्राद्ध की माँग लेकर आता है, वे सीधे मना कर देते हैं।

वैकल्पिक उपाय: तीर्थ न जा सकें तो क्या करें

पुजारी नीरज कुमार ने उन श्रद्धालुओं को भी मार्गदर्शन दिया जो किसी कारणवश पिशाचमोचन या गया जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों पर नहीं पहुँच सकते। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को अपने निकटतम मंदिर या शिवालय में जाकर ब्राह्मणों को दान देना, भोजन कराना और तर्पण करना चाहिए। उनके अनुसार, 'ऑनलाइन श्राद्ध से बचना चाहिए और पितरों की मुक्ति के लिए साक्षात ब्राह्मण भोजन कराना ही सबसे उत्तम है।'

आगे क्या

पितृ पक्ष इस वर्ष चौदह दिन तक चलेगा और इस अवधि में पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहने की उम्मीद है। काशी के अन्य घाटों पर भी तर्पण की परंपरा जारी रहेगी। यह पर्व भारतीय सनातन संस्कृति में पीढ़ियों के बीच के अटूट बंधन का प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल ऑनलाइन श्राद्ध की बढ़ती माँग को लेकर है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर धार्मिक अनुष्ठानों की पेशकश एक बड़े बदलाव का संकेत है जो सुविधा और आस्था के बीच टकराव पैदा कर रहा है। पुजारी की आपत्ति सैद्धांतिक रूप से सही हो सकती है, पर इस पर कोई विनियामक या धार्मिक संस्थागत मार्गदर्शन अब तक नहीं आया है। जब तक सनातन परंपरा के संरक्षक इस प्रश्न का सामूहिक उत्तर नहीं देते, डिजिटल श्राद्ध सेवाएँ बिना किसी जाँच के फलती-फूलती रहेंगी।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पिशाचमोचन कुंड वाराणसी का क्या महत्व है?
पिशाचमोचन कुंड काशी (वाराणसी) का एक पवित्र तीर्थ है जहाँ पिंडदान और तर्पण करने से काशी के बाहर मृत पितरों को भी मोक्ष मिलने की मान्यता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह व्यवस्था स्वयं महादेव द्वारा स्थापित बताई जाती है।
पितृ पक्ष 2026 कितने दिन का है और पहला दिन कौन सा था?
इस वर्ष पितृ पक्ष 2026 सामान्य पंद्रह दिन के बजाय चौदह दिन का है। 27 सितंबर 2026 को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ पितृ पक्ष का पहला दिन प्रारंभ हुआ।
ऑनलाइन श्राद्ध क्यों नहीं करना चाहिए?
पिशाचमोचन कुंड के पुजारी नीरज कुमार के अनुसार, श्राद्ध का अर्थ पितरों को भोजन देना है और भोजन हमेशा हाथों से ही दिया जाता है — जैसे कोई ऑनलाइन भोजन नहीं कर सकता। उनके मतानुसार ऑनलाइन श्राद्ध सनातन धर्म की परंपरा के विरुद्ध है।
जो लोग तीर्थस्थल नहीं जा सकते वे श्राद्ध कैसे करें?
पुजारी नीरज कुमार की सलाह है कि जो श्रद्धालु पिशाचमोचन या गया जैसे तीर्थों पर नहीं पहुँच सकते, वे अपने नज़दीकी मंदिर या शिवालय में जाकर ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, दान दें और तर्पण करें।
पितृ पक्ष में पिंडदान और तर्पण का क्या अर्थ है?
तर्पण में जल और तिल से पितरों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जबकि पिंडदान में पके हुए चावल के पिंड अर्पित कर पितरों को तृप्त किया जाता है। दोनों अनुष्ठान पितृ ऋण चुकाने और पूर्वजों को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से किए जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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