पितृपक्ष 2026: गयाजी से पहले काशी में पिंडदान क्यों जरूरी? पिशाचमोचन कुंड का विशेष महत्व
सारांश
मुख्य बातें
पितृपक्ष के अवसर पर वाराणसी एक बार फिर श्रद्धा का केंद्र बन गई है। 26 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरू हो रही है और 27 सितंबर को पहला श्राद्ध किया जाएगा। लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए तीर्थों की ओर प्रस्थान करते हैं, लेकिन काशी के धर्मशास्त्रियों की एक विशेष मान्यता है जो इस नगरी को गया से भी पहले श्राद्ध का प्रथम द्वार बनाती है।
काशी क्यों है श्राद्ध का प्रथम द्वार
सामान्यतः श्राद्ध कर्म का नाम आते ही गयाजी का स्मरण होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गया में पिंडदान से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। किंतु काशी के विद्वानों और धर्मशास्त्रियों के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में — विशेषकर जब किसी की अकाल मृत्यु हुई हो — गया जाने से पूर्व काशी में पिंडदान अनिवार्य माना जाता है।
यही कारण है कि ऐसे परिवार पहले वाराणसी आते हैं, यहाँ कर्मकांड संपन्न करते हैं और उसके बाद गया के लिए प्रस्थान करते हैं। धर्मशास्त्रियों के अनुसार काशी को पितरों के श्राद्ध का 'प्रथम द्वार' इसीलिए कहा जाता है।
अकाल मृत्यु की स्थिति में क्यों बदलती है क्रम-व्यवस्था
काशी के विद्वानों के अनुसार, जिन व्यक्तियों की मृत्यु दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या या किसी अन्य अस्वाभाविक कारण से होती है, उनकी आत्मा के प्रेत योनि में भटकने की आशंका रहती है। ऐसी आत्माओं को सीधे गया में किए गए पिंडदान का फल नहीं मिलता।
इसलिए पहले काशी में विशेष कर्मकांड द्वारा आत्मा को प्रेत बाधा से मुक्त किया जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से श्राद्ध संपन्न होने पर आत्मा प्रेत योनि से निकलकर पितृ योनि में प्रवेश करती है, और तत्पश्चात गया में किया गया पिंडदान उन्हें तृप्त करके मोक्ष की ओर ले जाता है।
पिशाचमोचन कुंड: अकाल मृत्यु के श्राद्ध का प्रमुख केंद्र
वाराणसी में इस विशेष कर्मकांड के लिए दो स्थान विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं — पिशाचमोचन कुंड और मणिकर्णिका घाट। इनमें पिशाचमोचन कुंड को अकाल मृत्यु के श्राद्ध का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।
यहाँ नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान जैसे अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान और पिंडदान से अतृप्त आत्माओं को शांति प्राप्त होती है।
मणिकर्णिका घाट और मोक्ष की कामना
मणिकर्णिका घाट को काशी का महाश्मशान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहाँ स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र प्रदान करते हैं। यहाँ किया गया तर्पण भी पितरों की सद्गति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
यह उल्लेखनीय है कि किस स्थान पर कौन-सा कर्मकांड किया जाएगा, यह मृत्यु की परिस्थिति और कुल पुरोहित की सलाह पर निर्भर करता है।
पितृपक्ष 2026 की तिथियाँ और श्रद्धालुओं की तैयारी
इस वर्ष पितृपक्ष की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर 2026 से प्रारंभ हो रही है, जबकि पहला श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा। देशभर के तीर्थ स्थलों — गया, प्रयागराज, हरिद्वार और वाराणसी — में तर्पण और पिंडदान की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। काशी में पुरोहितों और धर्मशास्त्रियों का कहना है कि इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहले काशी और फिर गया की यात्रा पर निकलेंगे।