रामनगर के तीन भाई सोशल मीडिया पर जीवित रख रहे हैं कुमाऊंनी लोक संगीत की विरासत
सारांश
मुख्य बातें
नैनीताल जिले के रामनगर के तीन युवा — सुयश सती, हर्षित सती और प्रांजल सती — हारमोनियम, तबला, ढोलकी और हुड़के जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के ज़रिये कुमाऊंनी लोकगीतों को डिजिटल दुनिया तक पहुँचाने में जुटे हैं। आधुनिक ट्रेंडिंग गानों के शोर के बीच ये तीनों युवा उत्तराखंड की विलुप्त होती सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
परिवार और संगीत की साझी डोर
तीनों एक ही परिवार से जुड़े हैं। सुयश और हर्षित सगे भाई हैं, जबकि प्रांजल उनके ताऊजी के बेटे हैं। सुयश वर्तमान में बीटेक की पढ़ाई कर रहे हैं, हर्षित इंटरमीडिएट के छात्र हैं, और प्रांजल संस्कृत विद्यालय से इंटरमीडिएट कर रहे हैं। पढ़ाई की व्यस्तता के बावजूद तीनों नियमित रूप से संगीत का अभ्यास करते हैं।
संगीत की औपचारिक शिक्षा तीनों ने रामनगर के स्वर साधना संगीत विद्यालय में मोहन पाठक से ली है। सुयश हारमोनियम वादन में पारंगत हैं, हर्षित ढोलकी और तबला बजाते हैं, और प्रांजल हुड़का वादन करते हैं — तीनों के मेल से कुमाऊंनी प्रस्तुतियों को एक अलग पहचान मिलती है।
सोशल मीडिया से सांस्कृतिक अभियान
सुयश सती के अनुसार, बचपन से ही उनकी इच्छा अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की रही है। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भाइयों के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया और सोशल मीडिया पर रील के ज़रिये कुमाऊंनी लोकगीतों की प्रस्तुतियाँ साझा करनी शुरू कीं। उन्होंने बताया कि पहाड़ी गाने उन्होंने यूट्यूब की मदद से सीखे और धीरे-धीरे अपनी प्रस्तुतियों को निखारा।
पिछले करीब एक महीने से ये प्रस्तुतियाँ सोशल मीडिया पर नियमित रूप से साझा की जा रही हैं और स्थानीय स्तर पर इन्हें सराहना मिल रही है। हर्षित सती ने कहा कि उनकी कोशिश है कि लोग अपनी संस्कृति को भूलें नहीं और उससे जुड़ाव बनाए रखें।
विलुप्त होती संस्कृति को बचाने की पहल
प्रांजल सती ने कहा कि उत्तराखंड की विलुप्त होती सांस्कृतिक पहचान को फिर से ज़िंदा करना उनका मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर हो रही है और डिजिटल माध्यम इस खाई को पाटने का सशक्त ज़रिया बन सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में लोक कलाओं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के जानकार कम होते जा रहे हैं और हुड़के जैसे वाद्य यंत्र प्रायः उत्सवों तक सीमित होकर रह गए हैं। इन तीन युवाओं की पहल इस परिदृश्य में एक ताज़ी हवा की तरह है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और जुनून
सुयश और हर्षित के पिता धीरज सती निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और माँ हेमा सती निजी शिक्षिका हैं। प्रांजल के पिता प्रकाश सती चाय की दुकान चलाते हैं और माँ गृहिणी हैं। सीमित संसाधनों और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच भी संगीत के प्रति इन युवाओं का समर्पण उल्लेखनीय है।
आगे की राह
तीनों युवाओं की यह संगीत यात्रा अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन उनका संकल्प स्पष्ट है — पढ़ाई के साथ-साथ कुमाऊंनी लोकगीतों और उत्तराखंड की पारंपरिक धुनों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना। आने वाले समय में यह तिकड़ी और व्यापक मंच पर अपनी पहाड़ी सांस्कृतिक विरासत की अलख जगाने की तैयारी में है।