पंडित जसराज की पुण्यतिथि: जसरंगी जुगलबंदी से हवेली संगीत तक, 3 नवाचारों ने बदली शास्त्रीय संगीत की दिशा
सारांश
मुख्य बातें
पंडित जसराज — मेवाती घराने के वह महान स्वर-साधक, जिनकी आवाज़ की पहुँच साढ़े तीन सप्तकों तक थी — ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को न केवल जिया, बल्कि उसे नई परिभाषाएँ दीं। 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के पीली मंदोरी गाँव में जन्मे जसराज ने अपने नवाचारों से शास्त्रीय संगीत की दुनिया में ऐसी छाप छोड़ी, जो आज भी अमिट है। 17 अगस्त 2020 को उनके निधन के पाँच वर्ष बाद भी उनकी विरासत उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत है।
बचपन की त्रासदी और संगीत की साधना
जसराज के जीवन में दुख जल्दी आया। 24 अप्रैल 1934 को, जब वे मात्र चार वर्ष के थे, उनके पिता पंडित मोतीराम का निधन हो गया। पिता की छाया के बिना पले-बढ़े जसराज ने अपने बड़े भाइयों — पंडित मणिराम और पंडित प्रताप नारायण — के संरक्षण में मेवाती घराने की गायकी का अभ्यास प्रारंभ किया। उनकी लगन इतनी अटूट थी कि वे प्रतिदिन 14 घंटे तक रियाज़ करते थे। इसी साधना में उन्होंने 'भाव' और 'भक्ति' का वह संगम विकसित किया, जो आगे चलकर उनकी सांगीतिक पहचान बना।
युवावस्था में वे गुजरात के साणंद पहुँचे, जहाँ महाराज जयवंत सिंह वाघेला ने उनके सांगीतिक ज्ञान को और परिष्कृत किया। उनके पेशेवर सफर का पहला ऐतिहासिक मोड़ 1952 में आया, जब मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्होंने काठमांडू में नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह के दरबार में 'राग मुल्तानी' की प्रस्तुति दी। राजा इस प्रदर्शन से इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने युवा गायक को 5,000 स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में देने की घोषणा कर दी। एक साक्षात्कार में जसराज ने स्वयं बताया था कि इतनी बड़ी घोषणा सुनकर वे पसीने से भीग गए थे।
तीन नवाचार जिन्होंने संगीत की परिभाषा बदली
पंडित जसराज केवल परंपरा के वाहक नहीं थे — वे उसके सृजक भी थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत को तीन महत्वपूर्ण नवाचारों से समृद्ध किया।
पहला नवाचार था 'जसरंगी जुगलबंदी' — प्राचीन मूर्च्छना सिद्धांत पर आधारित एक अनूठी युगलबंदी शैली, जिसमें एक पुरुष और एक महिला गायक एक साथ किंतु अलग-अलग राग गाते हैं — जैसे नट भैरव और मधुवंती। यह प्रयोग आवाज़ की प्राकृतिक पिच की रक्षा करता है और शिव-शक्ति के अद्वैत का सांगीतिक अनुभव कराता है।
दूसरा नवाचार था 'हवेली संगीत' को मंदिरों की चौखट से निकालकर वैश्विक मंचों तक पहुँचाना। इस अर्ध-शास्त्रीय विधा को उन्होंने इतनी कुशलता से प्रस्तुत किया कि यह देश-विदेश में लोकप्रिय हो गई।
तीसरा नवाचार था उनकी 'कण-गायकी' और 'मींड-प्रधान' अलंकृत शैली, जिसमें सूफी-भक्ति रस का समावेश था। इस शैली ने ख्याल गायकी को श्रोताओं के लिए अधिक भावनात्मक, सुलभ और आध्यात्मिक बना दिया।
साढ़े तीन सप्तक और प्रकृति का मोह
संगीत में 'साढ़े तीन सप्तक' का अर्थ है — मंद्र, मध्य और तार सप्तक के साथ चौथे सप्तक के आधे स्वर, यानी कुल 42 स्वर-स्थानों की सीमा। यह किसी भी गायक के लिए असाधारण विस्तार माना जाता है। जसराज की इसी असाधारण स्वर-सीमा का एक अविस्मरणीय प्रसंग है — 1996 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में सुबह लगभग 6 बजे, जब वे 5,000 से अधिक श्रोताओं के समक्ष 'राग तोड़ी' गा रहे थे, तभी एक हिरण दौड़ता हुआ आया और मंच के निकट उनके गायन से मंत्रमुग्ध होकर खड़ा हो गया।
सिनेमा और सम्मान
पंडित जसराज ने भारतीय सिनेमा को भी अपनी आवाज़ का वरदान दिया। उन्होंने वी. शांताराम की फिल्म 'लड़की सह्याद्रि की' (1966) में 'राग अहीर भैरव' पर आधारित 'वंदना करो अर्चना करो राग' गाया। 1973 में 'बीरबल माय ब्रदर' में उन्होंने पंडित भीमसेन जोशी के साथ जुगलबंदी की। आधुनिक सिनेमा में '1920' (2008) और 'लाइफ ऑफ पाई' (2012) में भी उनकी आवाज़ गूँजी।
भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और वर्ष 2000 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने 11 नवंबर 2006 को मंगल और बृहस्पति के बीच खोजे गए एक क्षुद्रग्रह का नाम उनके सम्मान में 'पंडित जसराज' रखा। इस खगोलीय पिंड का आधिकारिक नंबर 300128 है — जो उनकी जन्म तिथि 28/01/1930 का उल्टा क्रम है। इस सम्मान के साथ वे मोज़ार्ट और बीथोवेन जैसे विश्व-प्रसिद्ध संगीतकारों की श्रेणी में शामिल होने वाले पहले भारतीय संगीतकार बन गए।
विरासत और अंतिम यात्रा
अपने पिता और भाई की स्मृति को जीवित रखने के लिए उन्होंने 'पंडित मोतीराम पंडित मणिराम संगीत समारोह' की स्थापना की, जो प्रतिवर्ष 30 नवंबर को हैदराबाद के चौमहल्ला पैलेस में आयोजित होता है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी वे अमेरिका से ऑनलाइन माध्यम से अपने शिष्यों को संगीत की शिक्षा देते रहे।
17 अगस्त 2020 को न्यू जर्सी, अमेरिका में उनका निधन हो गया और मुंबई में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी 92वीं जयंती पर 28 जनवरी 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'पंडित जसराज कल्चरल फाउंडेशन' का शुभारंभ किया, ताकि उनकी संगीत-विरासत को वैश्विक पटल पर आगे बढ़ाया जा सके। जसराज की गायकी का वह जादू — जो हिरणों को भी रोक देता था — आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाता रहेगा।