पद्मभूषण पंडित बसवराज राजगुरु: विभाजन में ट्रेन के नीचे लटककर बची जान, संगीत से रचा इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान साधक पंडित बसवराज राजगुरु का नाम उन विरले कलाकारों में शामिल है, जिन्होंने न केवल अपनी गायकी से पीढ़ियों को प्रभावित किया, बल्कि 1947 के विभाजन की भयावह हिंसा से जीवित बचकर संगीत की विरासत को जीवंत रखा। कथित तौर पर उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए ट्रेन के एक डिब्बे के नीचे लटककर सीमा से दिल्ली तक का सफर तय किया। 24 अगस्त 1917 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के यालीवाल गाँव में जन्मे राजगुरु को भारत सरकार ने 1975 में पद्मश्री और 1991 में पद्मभूषण से सम्मानित किया।
संगीत की नींव और गुरु की खोज
राजगुरु के पिता तंजावुर परंपरा में प्रशिक्षित कर्नाटक संगीत के जानकार थे, जिसके कारण बचपन से ही संगीत उनके रक्त में समा गया। छोटी उम्र में ही वह नाटक कंपनियों के निर्माताओं से गाने का अवसर माँगते थे और वामनराव मास्टर की घूमने वाली नाटक कंपनी से जुड़े।
जब वह लगभग 13 वर्ष के थे, तब पिता का निधन हो गया। उनके चाचा उन्हें संस्कृत की पढ़ाई के लिए हुबली ले गए, जहाँ उनकी भेंट संत और संगीत गुरु पंचाक्षरी गवई से हुई। गवई ने उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।
कठोर साधना और पहली बड़ी प्रस्तुति
गुरु पंचाक्षरी गवई के सान्निध्य में राजगुरु की संगीत साधना अत्यंत कठिन थी — वह प्रतिदिन 12 से 15 घंटे तक रियाज करते थे। 1936 में हम्पी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की 600वीं वर्षगाँठ के अवसर पर उन्होंने अपने गुरु के साथ करीब 15 हजार श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुति दी — यह उनके जीवन के शुरुआती बड़े मंचों में से एक था।
1944 में गुरु पंचाक्षरी गवई के निधन के बाद राजगुरु मुंबई पहुँचे, जहाँ सवाई गंधर्व से सीखने का अवसर मिला, किंतु उनकी तबीयत ठीक न होने के कारण उन्होंने सुरेशबाबू माने से संगीत-शिक्षा ली। इसके बाद वह कराची पहुँचे, जहाँ उस्ताद लतीफ खान से करीब छह महीने तक प्रशिक्षण प्राप्त किया। विभिन्न गुरुओं और परंपराओं से अर्जित यह ज्ञान उनकी गायकी को बहुआयामी बनाता गया।
विभाजन की त्रासदी: ट्रेन के नीचे लटककर बची जान
यह 1947 का वह दौर था जब देश के बँटवारे की आग में लाखों लोग जल रहे थे। उस्ताद लतीफ खान की सलाह पर राजगुरु हिंदुओं से भरी एक ट्रेन में सवार होकर भारत लौट रहे थे। सीमा के निकट ट्रेन रोकी गई और यात्रियों पर हमला हुआ — बड़ी संख्या में लोगों की हत्या कर दी गई। राजगुरु ने कथित तौर पर ट्रेन के एक डिब्बे के नीचे लटककर सीमा से दिल्ली तक का सफर तय किया और इस प्रकार अपनी जान बचाई। यह घटना उनके जीवन का सबसे भयावह और अविस्मरणीय अध्याय बन गई।
भारत वापसी और संगीत की निरंतर यात्रा
भारत लौटने के बाद राजगुरु ने पुणे में रहकर एक दिन में दो से तीन संगीत कार्यक्रम तक किए। बाद में वह अपने गृह जनपद धारवाड़ लौटे, जो उनकी संगीत-साधना का स्थायी केंद्र बन गया। वह खयाल, ध्रुपद-धमार, वचन, नाट्यगीत, ठुमरी और गजल — अनेक शैलियों में और कई भाषाओं में प्रस्तुति देते थे।
सम्मान और विरासत
भारत सरकार ने 1975 में उन्हें पद्मश्री और 1991 में पद्मभूषण से नवाजा। पद्म पुरस्कार के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी 1991 के पद्मभूषण के लिए उनका नाम दर्ज है। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी से भी सम्मान प्राप्त हुआ और कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ ने उन्हें मानद डॉक्टरेट प्रदान की। 21 जुलाई 1991 को उनका निधन हो गया, किंतु हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनकी गायकी की गूँज आज भी जीवित है।