पंडित जसराज की पुण्यतिथि: जसरंगी जुगलबंदी से हवेली संगीत तक, संगीत जगत को दिए 3 अमर नवाचार
सारांश
मुख्य बातें
पंडित जसराज — मेवाती घराने के वह अप्रतिम स्वर-साधक जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को भक्ति, भाव और नवाचार की त्रिवेणी से सींचा — 17 अगस्त 2020 को न्यू जर्सी, अमेरिका में इस दुनिया से विदा हुए। उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र प्रेस उनके उन तीन संगीत-क्रांतियों को याद कर रहा है जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की दिशा और दशा दोनों बदल दीं।
संगीत-परिवार में जन्म, त्रासदी से शुरुआत
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के पीली मंदोरी गाँव में एक ऐसे परिवार में हुआ जिसकी चार पीढ़ियाँ संगीत को समर्पित थीं। किंतु 24 अप्रैल 1934 को जब वे मात्र चार वर्ष के थे, उनके पिता पंडित मोतीराम का निधन हो गया। पिता के असमय जाने के बाद उन्होंने अपने बड़े भाइयों — पंडित मणिराम और पंडित प्रताप नारायण — की छत्रछाया में मेवाती घराने की गायकी सीखी। साधना इतनी गहन थी कि वे प्रतिदिन 14 घंटे तक रियाज करते थे।
काठमांडू दरबार से शुरू हुआ ऐतिहासिक सफर
युवावस्था में वे गुजरात के साणंद गए, जहाँ महाराज जयवंत सिंह वाघेला ने उनके सांगीतिक ज्ञान को और परिष्कृत किया। पेशेवर जीवन का निर्णायक मोड़ 1952 में आया जब मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्होंने काठमांडू में नेपाल नरेश त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह के दरबार में राग मुल्तानी में अपनी प्रस्तुति दी। राजा इस प्रस्तुति से इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने इस युवा गायक को 5,000 स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में देने की घोषणा कर दी। पंडित जसराज ने एक साक्षात्कार में स्वयं बताया था कि यह सुनकर वे पसीने से तर-ब-तर हो गए थे।
उनकी आवाज़ की पहुँच साढ़े तीन सप्तकों तक थी — अर्थात् 42 स्वर-स्थानों की असाधारण सीमा, जिसमें मंद्र, मध्य और तार सप्तक के साथ चौथे सप्तक के आधे स्वर शामिल थे। इसी जादुई स्वर-विस्तार के बारे में कहा जाता है कि 1996 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में प्रातः लगभग 6 बजे, 5,000 से अधिक श्रोताओं के बीच राग तोड़ी गाते समय एक हिरण दौड़ता हुआ आया और मंच के पास उनके गायन से मंत्रमुग्ध होकर खड़ा हो गया।
संगीत जगत को दिए 3 अमर नवाचार
पहला नवाचार — जसरंगी जुगलबंदी: यह प्राचीन मूर्च्छना सिद्धांत पर आधारित एक अभूतपूर्व प्रयोग है जिसमें एक पुरुष और एक महिला गायक एक साथ किंतु अलग-अलग राग — जैसे नट भैरव और मधुवंती — गाते हैं। यह शैली आवाज़ की प्राकृतिक पिच को अक्षुण्ण रखती है और शिव-शक्ति के अद्वैत का अनुभव कराती है।
दूसरा नवाचार — हवेली संगीत का वैश्वीकरण: पंडित जसराज ने हवेली संगीत को मंदिरों की सीमाओं से बाहर निकालकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया। इस प्रयास ने इस अर्ध-शास्त्रीय विधा को एक नई, व्यापक पहचान दी और भक्ति-संगीत को वैश्विक श्रोताओं तक सुलभ बनाया।
तीसरा नवाचार — कण-गायकी और मींड-प्रधान शैली: मेवाती घराने की परंपरा में रहते हुए भी उन्होंने कण-गायकी और मींड का ऐसा भावपूर्ण उपयोग किया जिसमें सूफी-भक्ति रस घुला हुआ था। इस अलंकृत शैली ने ख्याल गायकी को आम श्रोताओं के लिए अधिक भावनात्मक, सुलभ और आध्यात्मिक बना दिया।
सिनेमा में भी गूँजी वह दिव्य आवाज़
पंडित जसराज ने भारतीय सिनेमा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने वी. शांताराम की फिल्म 'लड़की सह्याद्रि की' (1966) में राग अहीर भैरव पर आधारित 'वंदना करो अर्चना करो राग' गाया। उल्लेखनीय है कि वी. शांताराम की पुत्री मधुरा शांताराम से उनका विवाह हुआ था। 1973 में 'बीरबल माय ब्रदर' में उन्होंने पंडित भीमसेन जोशी के साथ यादगार जुगलबंदी की। आधुनिक सिनेमा में उन्होंने फिल्म '1920' (2008) और 'लाइफ ऑफ पाई' (2012) में भी अपनी आवाज़ दी।
सम्मान: पद्म विभूषण से क्षुद्रग्रह तक
भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और वर्ष 2000 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने 11 नवंबर 2006 को मंगल और बृहस्पति के बीच खोजे गए एक क्षुद्रग्रह का नाम उनके सम्मान में 'पंडित जसराज' रखा। इस आकाशीय पिंड का आधिकारिक नंबर 300128 है — जो उनकी जन्म तिथि 28/01/1930 का ठीक उल्टा क्रम है। इस खगोलीय सम्मान के साथ वे मोज़ार्ट और बीथोवेन जैसे विश्व-प्रसिद्ध संगीत दिग्गजों के विशेष वर्ग में शामिल होने वाले पहले भारतीय संगीतकार बन गए।
अपने पिता और भाई की स्मृति में उन्होंने पंडित मोतीराम पंडित मणिराम संगीत समारोह की स्थापना की, जो प्रतिवर्ष 30 नवंबर को हैदराबाद के चौमहल्ला पैलेस में आयोजित होता है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी वे अमेरिका से ऑनलाइन माध्यम से अपने शिष्यों को संगीत की शिक्षा देते रहे। 17 अगस्त 2020 को न्यू जर्सी में उनका निधन हुआ और मुंबई में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी 92वीं जयंती पर 28 जनवरी 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'पंडित जसराज कल्चरल फाउंडेशन' का शुभारंभ किया, ताकि उनकी विरासत पीढ़ियों तक जीवित रहे।