रेखा ने 'उमराव जान' के लिए नहीं ली थी एक भी फीस, निर्देशक मुजफ्फर अली ने खोला राज
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री रेखा और 1981 में रिलीज हुई फिल्म 'उमराव जान' का रिश्ता महज एक अभिनेत्री और उसकी भूमिका का नहीं, बल्कि एक कलाकार और उसके जुनून का रिश्ता है। यही वजह है कि रेखा ने इस कालजयी फिल्म के लिए एक रुपए भी पारिश्रमिक नहीं लिया था — यह खुलासा खुद फिल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली ने किया था। जून 2025 में फिल्म की री-रिलीज के अवसर पर दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने इस दिलचस्प किस्से को साझा किया।
कैसे हुई रेखा की एंट्री
मुजफ्फर अली के अनुसार, 'उमराव जान' के किरदार के लिए रेखा उनकी पहली और एकमात्र पसंद थीं। वह अपनी पत्नी सुभाषिनी के साथ रेखा की माँ से मिलने पहुँचे और सीधे बता दिया कि वह फिल्म बनाना चाहते हैं, लेकिन पारिश्रमिक देने में असमर्थ हैं। जब रेखा घर लौटीं तो माँ ने उनके सामने यह बात रखी। रेखा ने कहानी सुनने के लिए निर्देशक से मुलाकात की और कहानी की गहराई में यों खो गईं कि फीस का सवाल ही नहीं उठा।
मुजफ्फर अली ने रेखा से कहा था — 'मैं तुम्हें फीस तो नहीं दे पाऊंगा, लेकिन इस फिल्म से तुम्हें अमर कर दूंगा।' निर्देशक का वह वादा सच साबित हुआ। रेखा को इस भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
रेखा की तैयारी और शायरी का सफर
निर्देशक ने बताया कि रेखा ने 'उमराव जान' के किरदार में ढलने के लिए शायरी पर विशेष ध्यान दिया। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से करीब एक साल पहले ही शायरी पर काम शुरू हो गया था। कविता और शायरी के जरिए उन्होंने किरदार की आंतरिक भावनाओं को समझा। उनकी अदायगी, संवाद बोलने का ढंग और चेहरे के सूक्ष्म भाव इसी गहन तैयारी का परिणाम थे।
मुजफ्फर अली ने कहा, 'रेखा की आंखों में एक खास तरह की गहराई थी। वह एक ही पल में टूटने और फिर संभलने वाले भावों को अपने चेहरे पर उतार सकती हैं। इसी वजह से इस किरदार के लिए उन्हें चुना गया।'
किरदार और फिल्म की पृष्ठभूमि
फिल्म में रेखा ने अमीरन का किरदार निभाया, जो हालात के थपेड़ों से उमराव जान बन जाती है। उसकी जिंदगी दर्द, मोहब्बत, तन्हाई और शायरी के रंगों से बुनी है — और उसी के जरिए वह अपनी पहचान कायम करती है।
'उमराव जान' मशहूर उर्दू लेखक मिर्जा हादी रुसवा के 1899 में प्रकाशित उपन्यास 'उमराव जान अदा' पर आधारित थी। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, फारूक शेख और राज बब्बर भी प्रमुख भूमिकाओं में थे। संगीत खय्याम ने तैयार किया था और गानों को आवाज आशा भोसले ने दी थी।
आज भी अमर है यह किरदार
चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब 'उमराव जान' का जिक्र होता है तो रेखा का चेहरा स्वतः सामने आ जाता है। जून 2025 में फिल्म की री-रिलीज ने एक बार फिर इस क्लासिक को नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुँचाया और साबित किया कि श्रेष्ठ कला समय की सीमाओं को पार कर जाती है।