ऋत्विक सान्याल: काशी की धुन को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाले ध्रुपद के संरक्षक
सारांश
Key Takeaways
- ऋत्विक सान्याल का जन्म 12 अप्रैल 1953 को हुआ था।
- उन्होंने ध्रुपद संगीत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
- उन्हें पद्म श्री जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं।
- उनकी गायकी में काशी की मिट्टी की खुशबू है।
- वे एक शिक्षक के रूप में भी संगीत की बारीकियाँ सिखाते हैं।
नई दिल्ली, 11 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। काशी केवल एक शहर नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं, घाटों, गंगा और संगीत की गूंज का अद्भुत संगम है। इसी काशी की मिट्टी से पंडित ऋत्विक सान्याल का जन्म हुआ, जिन्होंने ध्रुपद जैसे गंभीर और आध्यात्मिक संगीत को न केवल संजोया बल्कि इसे सात समुंदर पार भी पहुंचा दिया।
बिहार के कटिहार में 12 अप्रैल 1953 को जन्मे ऋत्विक सान्याल का संगीत से नाता बचपन से ही रहा। लेकिन उनका असली सफर तब शुरू हुआ जब उन्होंने ध्रुपद की डागर परंपरा में विधिवत प्रशिक्षण लेना आरंभ किया। उन्होंने उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर जैसे महान कलाकारों से शिक्षा प्राप्त की। यह कोई सरल यात्रा नहीं थी; ध्रुपद में हर स्वर साधना की मांग करता है, हर राग समय और धैर्य की परीक्षा लेता है, लेकिन सान्याल ने इसे केवल सीखा नहीं, बल्कि इसे जीया।
वे केवल गायक ही नहीं हैं, बल्कि एक विद्वान भी हैं जिन्होंने संगीत को केवल सुना या गाया नहीं, बल्कि उसे समझा, परखा और उस पर लिखा भी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और डीन के रूप में उन्होंने अनगिनत छात्रों को ध्रुपद की बारीकियाँ सिखाईं। उनके लिए संगीत केवल मंच तक सीमित नहीं था, बल्कि कक्षा में भी उतना ही जीवंत था।
उनकी विशेषता यह है कि वे परंपरा को निभाते हुए समय के साथ चलना जानते हैं। ध्रुपद को अक्सर लोग गंभीर या कठिन संगीत मानते हैं, लेकिन ऋत्विक सान्याल ने इसे आम श्रोताओं के लिए सुलभ बनाने का प्रयास किया। उन्होंने नए रागों की रचना की, ध्रुपद को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया और यह प्रदर्शित किया कि यह शैली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
उनका सफर केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियों से ध्रुपद का जादू बिखेरा। विदेशी श्रोता, जो इस शैली से पहले अपरिचित थे, उनकी गायकी सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उनकी आवाज में काशी की मिट्टी की खुशबू साफ महसूस होती है। गंगा की शांति, मंदिरों की घंटियां और सुबह के रियाज की ताजगी सब कुछ उनकी आवाज में समाया हुआ है। यही वजह है कि जब वे विदेशों में गाते हैं, तो केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं।
उनके योगदान को देश ने भी सराहा है। उन्हें पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनके भीतर का साधक आज भी वैसा ही है। वे आज भी उतने ही विनम्र, समर्पित और सीखने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं, जितने अपने शुरुआती दिनों में थे।