सरना धर्म कोड की मांग: CM हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति, PM मोदी और राज्यपाल को लिखा पत्र, जनगणना 2027 में अलग पहचान की अपील
सारांश
Key Takeaways
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 3 मई 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को पत्र लिखकर जनगणना 2027 में आदिवासी समाज के 'सरना धर्म' को पृथक धर्म कोड के रूप में मान्यता देने की माँग की है। सोरेन ने अपने पत्र में सरना धर्म को आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार बताते हुए इसे जनगणना में अलग श्रेणी में दर्ज करने के पक्ष में कई तर्क प्रस्तुत किए हैं।
मुख्यमंत्री ने क्या कहा
मुख्यमंत्री सोरेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जनगणना 2027 की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए केंद्र सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तथ्य आधारित नीति निर्माण किसी भी राष्ट्र के संतुलित विकास के लिए अनिवार्य है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2021 में प्रस्तावित जनगणना विभिन्न कारणों से स्थगित हो गई थी, और अब इसका आरंभ होना एक महत्वपूर्ण कदम है।
सोरेन ने बताया कि राज्य सरकार इस प्रक्रिया में पूर्ण सहयोग कर रही है और उन्होंने स्वयं स्व-गणना कर इसमें भागीदारी सुनिश्चित की है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग पूजा पद्धति, प्रकृति पूजा, ग्राम देवता, कूल देवता और पारंपरिक त्योहार इसे अन्य धर्मों से स्पष्ट रूप से अलग करते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और 2011 की जनगणना का हवाला
मुख्यमंत्री ने बताया कि स्वतंत्रता पूर्व जनगणना में विभिन्न धर्मों को अलग-अलग दर्ज किया जाता था, लेकिन आज़ादी के बाद आदिवासी धर्म को अलग श्रेणी में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए कहा कि अलग कोड नहीं होने के बावजूद देशभर में करीब 50 लाख लोगों ने स्वयं को 'सरना' धर्म से संबंधित बताया था, जो इस माँग की गंभीरता को रेखांकित करता है। गौरतलब है कि यह आँकड़ा बिना किसी आधिकारिक मान्यता के स्वतःस्फूर्त रूप से दर्ज हुआ था।
झारखंड विधानसभा प्रस्ताव और संवैधानिक आधार
सोरेन ने झारखंड विधानसभा द्वारा पारित सरना धर्म कोड संबंधी सर्वसम्मत प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य का गठन ही आदिवासी पहचान के आधार पर हुआ है। उन्होंने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को लिखे पत्र में संविधान के अनुच्छेद 244 और पाँचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों के अधिकारों की रक्षा की विशेष जिम्मेदारी राज्यपाल पर है। उन्होंने राज्यपाल की भूमिका को आदिवासी अस्मिता के संरक्षक के रूप में रेखांकित किया और उनसे केंद्र सरकार के समक्ष मजबूत अनुशंसा करने का आग्रह किया।
नीति निर्माण पर संभावित प्रभाव
मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि यदि जनगणना में किसी समुदाय की विशिष्ट पहचान को दर्ज नहीं किया गया तो भविष्य की नीतियों और योजनाओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल तकनीक के इस दौर में जनगणना में अलग कोड देना पूरी तरह संभव और व्यावहारिक है। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार जनगणना 2027 की तैयारियाँ शुरू कर चुकी है।
आगे की राह
सोरेन ने आग्रह किया है कि जनगणना के दूसरे चरण में धर्म संबंधी कॉलम में 'सरना' धर्म को पृथक पहचान दी जाए, ताकि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके। यह माँग अब केंद्र सरकार के पाले में है और जनगणना 2027 की अधिसूचना से पहले इस पर निर्णय लिया जाना अपेक्षित है।