शारदीय नवरात्र 2026: 51 शक्तिपीठों का पौराणिक महत्व — पुष्कर के गायत्री धाम से त्रिपुरा के माताबाड़ी तक
सारांश
मुख्य बातें
शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से आरंभ हो रहे हैं और इस पावन पर्व में 51 शक्तिपीठों का दर्शन सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जहाँ-जहाँ देवी सती के शरीर के अंग गिरे, उन स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित हो गए। ये तीर्थस्थल आज भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका तक फैले हैं और भारतीय सांस्कृतिक एकता के जीवंत प्रतीक हैं।
शक्तिपीठों की पौराणिक उत्पत्ति
सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, देवी सती के देह-त्याग के पश्चात भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर विलाप करते हुए भटकने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 अंग काट दिए, जो पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे। आज वे सभी स्थल शक्तिपीठ के रूप में पूजित हैं। नवरात्र में इन पीठों पर विशेष पूजा, तंत्र साधना और मेलों का आयोजन होता है। मान्यता है कि नवरात्र में एक भी शक्तिपीठ के दर्शन से भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
पुष्कर का गायत्री शक्तिपीठ, राजस्थान
अजमेर से लगभग 11 किमी उत्तर-पश्चिम में पुष्कर के निकट गायत्री पहाड़ के पास स्थित गायत्री शक्तिपीठ को मणिदेविका शक्तिपीठ भी कहा जाता है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, यहाँ माता की कलाई गिरी थी। इस पीठ की शक्ति को गायत्री और शिव को सर्वानंद के नाम से जाना जाता है। यहाँ पहुँचने के लिए अजमेर तक ट्रेन और बस की सुविधा उपलब्ध है; अजमेर से पुष्कर के लिए टैक्सी या रिक्शा मिलता है। निकटतम हवाई अड्डा जयपुर है।
विराट नगर के पापड़ी गाँव में स्थित श्री अंबिका शक्तिपीठ भी राजस्थान का एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। मान्यता है कि यहाँ सती देवी के पैर का बायाँ अंगूठा गिरा था। ऐतिहासिक रूप से पापड़ी को 'पाव पड़ी' कहा जाता था, और विराट नगर प्राचीन मत्स्य साम्राज्य की राजधानी था, जिस पर राजा विराट का शासन था। बीजाक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह पीठ ध्यान और उपासना के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।
चन्द्रभागा शक्तिपीठ और सोमनाथ क्षेत्र, गुजरात
चन्द्रभागा शक्तिपीठ शाक्त दर्शन की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है, जिसमें देवी को सर्वोच्च शक्ति — सृष्टि की सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता — के रूप में माना जाता है। देवी के विविध रूप जैसे दुर्गा, काली और लक्ष्मी उनकी अलग-अलग शक्तियों के प्रतीक हैं।
गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। जूनागढ़ के निकट हवाई अड्डा है और देश के प्रत्येक भाग से यहाँ ट्रेन तथा निजी बस सेवाएँ उपलब्ध हैं।
करवीरपुर शक्तिपीठ, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित करवीरपुर शक्तिपीठ — जिसे शिवहरकर शक्तिपीठ भी कहते हैं — में माता की तीन नेत्र गिरी थीं। यहाँ की शक्ति महिषासुरमर्दिनी तथा भैरव क्रोधीश हैं। पुराणों में कोल्हापुर को करवीर क्षेत्र कहा गया है, जिसका उल्लेख देवीगीता में मिलता है। पौराणिक मान्यता यह भी है कि यही वह स्थान है जहाँ स्वयं भगवान शिव ने सती के वियोग में तांडव किया था। कोल्हापुर सड़क, रेल और वायु मार्ग से सुगम रूप से जुड़ा हुआ है।
त्रिपुर सुंदरी — माताबाड़ी शक्तिपीठ, त्रिपुरा
त्रिपुरा के उदयपुर के निकट राधा किशोरपुर गाँव में स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर — जिसे माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है — में माता का दायाँ पैर गिरा था। यह मंदिर अगरतला से लगभग 55 किमी दूर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जो कछुए के कूबड़ की आकृति से मिलती-जुलती है, इसीलिए इसे कूर्म पीठ भी कहते हैं।
यह मंदिर असम के कामाख्या मंदिर के बाद उत्तर-पूर्वी भारत में सर्वाधिक दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है। विशेष ऐतिहासिक महत्व की बात यह है कि त्रिपुरा राज्य का नामकरण इसी मंदिर के नाम पर हुआ है। इसका निर्माण महाराजा धान्य माणिक्य ने 1501 ईस्वी में बंगाली एक-रत्न शैली में कराया था। निकटतम हवाई अड्डा अगरतला और निकटतम रेलवे स्टेशन कुमारघाट है, जो अगरतला से 140 किमी दूर है।
नवरात्र 2026 में इन शक्तिपीठों पर लाखों श्रद्धालुओं के उमड़ने की संभावना है, और धार्मिक पर्यटन के दृष्टिकोण से भी ये स्थल देश की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत रखते हैं।