सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ: 'अर्धशक्तिपीठ' का रहस्य, 18 भुजाओं वाली मां और नवरात्र 2026 की तैयारी
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के नासिक जिले में वणी क्षेत्र स्थित सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ को देश के 51 शक्तिपीठों में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह महाराष्ट्र के विशेष 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' में से एक है। 11 अक्टूबर 2026 से शारदीय नवरात्र शुरू होने के साथ ही यहाँ लाखों श्रद्धालुओं के पहुँचने की उम्मीद है। इस मंदिर की सबसे अनोखी पहचान यह है कि इसे 'अर्धशक्तिपीठ' कहा जाता है — एक ऐसा दर्जा जो किसी अन्य शक्तिपीठ को प्राप्त नहीं है।
अर्धशक्तिपीठ क्यों कहलाता है यह तीर्थ
महाराष्ट्र की धार्मिक परंपरा में 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' की एक विशिष्ट अवधारणा प्रचलित है। इसमें तुलजापुर की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहुर की रेणुका माता को 'पूर्ण शक्तिपीठ' माना गया है। सप्तश्रृंगी देवी को इस व्यवस्था में 'अर्धशक्तिपीठ' का स्थान इसलिए प्राप्त है, क्योंकि यहाँ मां की उपस्थिति कुमारी (बालिका) रूप में मानी जाती है — जो पूर्ण विवाहित देवी-रूप नहीं, बल्कि एक कुँवारी शक्ति का स्वरूप है। इसी वजह से इसे 'अर्धपीठ' कहा जाता है।
पौराणिक कथा: माता सती की दाहिनी भुजा का गिरना
शिव पुराण और देवी पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने जब महायज्ञ का आयोजन किया, तो उसमें भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया गया था। फिर भी जब माता सती वहाँ पहुँचीं और दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती यज्ञ-अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिया। माता सती की मृत्यु से क्रोधित होकर भगवान शिव ने उनका पार्थिव शरीर कंधे पर उठाया और प्रलयकारी तांडव करने लगे।
संसार को इस प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग-प्रत्यंग काटे। मान्यता है कि इस प्रक्रिया में माता सती की दाहिनी भुजा नासिक के पास वणी क्षेत्र के सात पर्वत-शिखरों (सप्तश्रृंग) पर आकर गिरी। इसी पवित्र स्थान पर सप्तश्रृंगी देवी का यह मंदिर स्थापित हुआ।
मूर्ति की विशेषता: 18 भुजाएँ और सिंदूर-आवरण
भागवत पुराण में उल्लेख है कि देवी ने महिषासुर का वध करने के बाद अपने रौद्र रूप को शांत करने के लिए सह्याद्रि की इन सात चोटियों पर विश्राम लिया था। यहाँ उनके पूर्ण रौद्र रूप का केवल एक सौम्य, अर्ध-अंश भक्तों को दिखाई देता है।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, सप्तश्रृंगी देवी की यह प्रतिमा साक्षात् महालक्ष्मी का स्वरूप है। इन्हें 'अष्टदशभुजा' कहा जाता है — अर्थात् 18 भुजाओं वाली देवी — हालाँकि कुछ संदर्भों में इन्हें अष्टभुजा (8 भुजाओं वाली) के रूप में भी वर्णित किया गया है। माता की यह भव्य प्रतिमा लगभग 8 फीट (2.4 मीटर) ऊँची है और पूरी तरह सिंदूर से ढकी होने के कारण गहरे केसरिया रंग में दिखती है।
देवी के हाथों में शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण का शंख, अग्नि-देव की ज्वाला, वायु का धनुष-बाण, वज्र, इंद्र की घंटी, यम का दंड, अक्षमाला, ब्रह्मा का कमंडल, सूर्य-किरण, काली की तलवार और ढाल, विश्वकर्मा का परशु, कुबेर का मदिरा-पात्र तथा गदा आदि धारण किए हुए बताए गए हैं।
ऋषि मार्कंडेय और देवी महात्म्य का संबंध
मान्यता के अनुसार, ऋषि मार्कंडेय ने 'देवी महात्म्य' की रचना इसी पावन स्थल पर की थी। यहाँ माता की मूर्ति की ग्रीवा एक ओर थोड़ी झुकी हुई है — कहा जाता है कि जब ऋषि मार्कंडेय सामने वाले पर्वत पर बैठकर 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कर रहे थे, तो माता उनकी स्तुति सुनने के लिए उस दिशा में झुक गई थीं।
मंदिर पहुँचने का मार्ग और नवरात्र परंपराएँ
सप्तश्रृंगी देवी का मंदिर नासिक से लगभग 65 किलोमीटर दूर 4800 फीट की ऊँचाई पर सप्तश्रृंग पर्वत पर स्थित है। एक ओर गहरी खाई और दूसरी ओर ऊँचे पहाड़ के बीच बने इस मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 472 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। गुफा में तीन द्वार हैं — शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार — जिनसे माँ के दर्शन किए जाते हैं।
नवरात्र के दौरान यहाँ देवी की 'गोद भराई' की विशेष परंपरा होती है। भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, फूल और मिठाई अर्पित करते हैं। मंदिर में पूरन पोली का प्रसाद वितरित किया जाता है। 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले शारदीय नवरात्र में यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।