13 अक्टूबर 2026
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सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ: 18 भुजाओं वाली माता, नवरात्र में उमड़ रही भक्तों की भीड़

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सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ: 18 भुजाओं वाली माता, नवरात्र में उमड़ रही भक्तों की भीड़

सारांश

नवरात्र में महाराष्ट्र के सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ में श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है। 4,800 फीट की ऊँचाई पर विराजमान 18 भुजाओं वाली अष्टदशभुजा देवी, ऋषि मार्कंडेय की रचनास्थली और माता सती की दाहिनी भुजा के गिरने की पौराणिक कथा — यह तीर्थ आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम है।

मुख्य बातें

सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ महाराष्ट्र के नासिक से 65 किलोमीटर दूर 4,800 फीट ऊँचे सप्तश्रृंग पर्वत पर स्थित है।
यह 51 शक्तिपीठों में से एक और महाराष्ट्र के 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' में 'अर्धशक्तिपीठ' के रूप में विशेष दर्जा रखता है।
माता की प्रतिमा 8 फीट (2.4 मीटर) ऊँची, 18 भुजाओं वाली और पूर्णतः सिंदूर से आच्छादित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस स्थान पर माता सती की दाहिनी भुजा गिरी थी।
ऋषि मार्कंडेय ने देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) की रचना यहीं की थी; माता की ग्रीवा का झुकाव इसी से जुड़ी मान्यता है।
मंदिर तक पहुँचने के लिए 472 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं; नवरात्र में गोद भराई और पूरन पोली के प्रसाद की विशेष परंपरा है।

महाराष्ट्र के नासिक से करीब 65 किलोमीटर दूर 4,800 फीट की ऊँचाई पर स्थित सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ में शारदीय नवरात्र 2026 के अवसर पर श्रद्धालुओं का अपार जनसैलाब उमड़ रहा है। 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखने वाला यह मंदिर महाराष्ट्र की प्रसिद्ध 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' की परंपरा में भी अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहाँ माता की 8 फीट (2.4 मीटर) ऊँची अष्टदशभुजा — अर्थात् 18 भुजाओं वाली — प्रतिमा श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करती है।

'साढ़े तीन शक्तिपीठ' और सप्तश्रृंगी का विशेष स्थान

महाराष्ट्र में तुलजापुर की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहुर की रेणुका माता को पूर्ण शक्तिपीठ माना गया है। सप्तश्रृंगी देवी यहाँ कुमारी (बालिका) रूप में विराजमान हैं, इसीलिए इसे 'अर्धशक्तिपीठ' का दर्जा प्राप्त है और इसे अर्धपीठ भी कहा जाता है। इस प्रकार चारों मिलकर महाराष्ट्र की विशेष धार्मिक परंपरा — 'साढ़े तीन शक्तिपीठ' — की रचना करते हैं।

पौराणिक आधार: माता सती की दाहिनी भुजा का गिरना

शिव पुराण और देवी पुराण की मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया गया था। बिना निमंत्रण के पहुँचीं माता सती ने दक्ष द्वारा शिव का अपमान सहन न कर यज्ञाग्नि में प्राण दे दिए। क्रोध और विरह में भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर प्रलयकारी तांडव करने लगे। तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग काटे। मान्यता है कि उस दौरान माता सती की दाहिनी भुजा वणी क्षेत्र के सप्तशृंग (सात पर्वतों) पर आ गिरी, जिससे यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हुआ।

देवी का स्वरूप: 18 भुजाएँ और सिंदूरी आभा

धार्मिक मान्यता के अनुसार भागवत पुराण में वर्णित है कि महिषासुर वध के पश्चात् देवी ने सह्याद्रि की इन सात चोटियों पर आकर विश्राम किया। यहाँ उनके रौद्र रूप का केवल सौम्य और आधा अंश भक्तों को दर्शन देता है। माता की 8 फीट ऊँची यह मूर्ति पूरी तरह सिंदूर से आच्छादित है, जिससे यह गहरे सिंदूरी (केसरिया) रंग की दिखती है। मार्कंडेय पुराण (देवी महात्म्य) में इन्हें साक्षात् महालक्ष्मी का स्वरूप बताया गया है।

देवी की 18 भुजाओं में शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण का शंख, अग्नि की लपटें, वायु का धनुष-बाण, इंद्र का वज्र और घंटा, यम का डंडा, दक्ष की अक्षमाला, ब्रह्मा का कमंडलु, सूर्यदेव की किरणें, काली की तलवार-ढाल, विश्वकर्मा का परशु, कुबेर का मदिरा-प्याला और गदा सुशोभित हैं।

ऋषि मार्कंडेय और झुकी ग्रीवा की अनूठी कथा

धार्मिक परंपरा के अनुसार माना जाता है कि ऋषि मार्कंडेय ने देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) की रचना इसी पावन स्थल पर की थी। मान्यता है कि जब वे सामने वाले पर्वत पर बैठकर 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कर रहे थे, तो माता उनकी स्तुति ध्यान से सुनने के लिए उस दिशा में झुक गईं — इसीलिए माता की मूर्ति की ग्रीवा एक ओर थोड़ी झुकी हुई है।

मंदिर की विशेषताएँ और नवरात्र की परंपराएँ

मंदिर परिसर तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को 472 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर की गुफा में शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार — तीन द्वारों से माता के दर्शन किए जा सकते हैं। एक तरफ गहरी खाई और दूसरी ओर ऊँचा पर्वत होने से यह स्थल नैसर्गिक रूप से भव्य और रहस्यमय है। नवरात्र के दौरान देवी की गोद भराई की जाती है, जिसमें भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, फूल और मिठाई अर्पित करते हैं। यहाँ प्रसाद के रूप में पूरन पोली वितरित की जाती है। नवरात्र के आगामी दिनों में भी श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का केंद्रबिंदु है — जहाँ पौराणिकता, स्थापत्य और जनआस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' की परंपरा पूरी तरह महाराष्ट्रीय लोकसंस्कृति में गहरे पैठी है, फिर भी राष्ट्रीय मीडिया में इसे उतनी गहराई से शायद ही कवर किया जाता है। नवरात्र में यहाँ लाखों श्रद्धालुओं का आना स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी व्यापक असर डालता है, जो चर्चा का विषय बनना चाहिए।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ कहाँ स्थित है और कैसे पहुँचें?
सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ महाराष्ट्र के नासिक जिले में वणी क्षेत्र में नासिक शहर से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर 4,800 फीट ऊँचे सप्तश्रृंग पर्वत पर स्थित है। मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए 472 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
सप्तश्रृंगी देवी को अर्धशक्तिपीठ क्यों कहा जाता है?
महाराष्ट्र की 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' की परंपरा में तुलजापुर, कोल्हापुर और माहुर को पूर्ण शक्तिपीठ माना गया है। सप्तश्रृंगी देवी यहाँ कुमारी (बालिका) रूप में विराजमान हैं, इसीलिए इसे 'अर्धशक्तिपीठ' कहा जाता है।
सप्तश्रृंगी देवी की 18 भुजाओं में क्या-क्या है?
देवी की 18 भुजाओं में त्रिशूल, सुदर्शन चक्र, शंख, अग्नि की लपटें, धनुष-बाण, वज्र, घंटा, डंडा, अक्षमाला, कमंडलु, सूर्यकिरणें, तलवार-ढाल, परशु, मदिरा-प्याला और गदा जैसे विभिन्न देवताओं के अस्त्र-शस्त्र हैं। इन्हें 'अष्टदशभुजा' कहा जाता है।
ऋषि मार्कंडेय का सप्तश्रृंगी से क्या संबंध है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार ऋषि मार्कंडेय ने 'देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती)' की रचना इसी स्थान पर की थी। जब वे सामने वाले पर्वत पर बैठकर पाठ कर रहे थे, तो माता उनकी स्तुति सुनने के लिए उस ओर झुक गईं — इसीलिए माता की मूर्ति की ग्रीवा एक ओर थोड़ी झुकी हुई दिखती है।
नवरात्र में सप्तश्रृंगी मंदिर में क्या विशेष परंपराएँ होती हैं?
नवरात्र में यहाँ देवी की 'गोद भराई' की जाती है, जिसमें भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, फूल और मिठाई अर्पित करते हैं। मंदिर में प्रसाद के रूप में पूरन पोली वितरित की जाती है और तीनों द्वारों — शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार — से दर्शन किए जा सकते हैं।
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