क्या झारखंड आंदोलन के जननायक शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण मिल रहा है?

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क्या झारखंड आंदोलन के जननायक शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण मिल रहा है?

सारांश

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया है। यह सम्मान उनके द्वारा किए गए संघर्ष और झारखंड आंदोलन के प्रति देश की कृतज्ञता को दर्शाता है। जानें उनके जीवन की उपलब्धियों और उनके प्रभाव के बारे में।

Key Takeaways

  • शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष और समाज के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
  • उन्हें मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान मिला है।
  • झारखंड राज्य आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
  • उनका जन्म 11 अप्रैल 1944 को हुआ था।
  • झारखंड विधानसभा ने उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित किया है।

रांची, 25 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और अलग झारखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख नायक शिबू सोरेन को भारत सरकार ने मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान प्रदान करने का निर्णय लिया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी पद्म पुरस्कारों की सूची में उनका नाम शामिल किया गया है। इसे आदिवासी समाज, झारखंड आंदोलन और जनसंघर्षों की राजनीति को राष्ट्रीय मंच पर मिली महत्वपूर्ण मान्यता के रूप में देखा जा रहा है।

नई दिल्ली में शिबू सोरेन का निधन पिछले साल 4 अगस्त को इलाज के दौरान हुआ था। उनका जीवन संघर्ष, विद्रोह और सामाजिक चेतना का प्रतीक रहा है। उनका जन्म 11 अप्रैल 1944 को तत्कालीन बिहार राज्य के हजारीबाग जिले (अब रामगढ़) के गोला प्रखंड के नेमरा गांव में हुआ था। जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, तब उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या सूदखोर महाजनों ने कर दी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।

बालक शिबू सोरेन ने तभी संकल्प किया कि वे न केवल अपने पिता की हत्या का बदला लेंगे, बल्कि आदिवासी समाज को महाजनी शोषण से मुक्त कराएंगे। पिता की हत्या के बाद उन्होंने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान परिवार को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन यही संघर्ष उन्हें जनआंदोलन की दिशा में ले गया। उन्होंने गांव-गांव जाकर आदिवासियों को संगठित करने का कार्य शुरू किया और महाजनों के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। धनबाद, हजारीबाग और गिरिडीह क्षेत्रों में यह आंदोलन कई बार हिंसक रूप ले चुका था।

शिबू सोरेन और उनके समर्थक तीर-धनुष के साथ चलते थे। उन्होंने ‘धान काटो आंदोलन’ का नेतृत्व किया, जिसमें आदिवासी महिलाएं खेतों में उतरतीं और पुरुष पहरा देते थे। इस संघर्ष के कारण वे प्रशासन के लिए एक चुनौती बन गए। कई मामलों में उन्हें जेल जाना पड़ा और कई बार अंडरग्राउंड भी रहना पड़ा। उन्होंने पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी के जंगलों में समय बिताया, लेकिन उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया। इसी दौरान उन्होंने ‘सोनोत संताल’ संगठन की स्थापना की और आदिवासी चेतना को संगठित स्वर दिया।

संताली समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी, जिसका अर्थ है ‘देश का नेता’। 4 फरवरी 1972 को धनबाद में ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (जेएमएम) की स्थापना हुई। यह संगठन शिबू सोरेन के ‘सोनोत संताल’ और विनोद बिहारी महतो के ‘शिवाजी समाज’ के विलय से बना। शिबू सोरेन महासचिव बने और विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष।

जेएमएम ने शीघ्र ही झारखंड, ओडिशा और बंगाल के आदिवासी इलाकों में मजबूत आधार बना लिया। शिबू सोरेन 1980 में पहली बार दुमका से सांसद चुने गए। 1991 में विनोद बिहारी महतो के निधन के बाद वे जेएमएम के केंद्रीय अध्यक्ष बने और पार्टी के पर्याय बन गए। उनके नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंचा और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ। वे 2005, 2008 और 2009 में तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और दो बार केंद्रीय मंत्री भी रहे।

बता दें कि झारखंड विधानसभा ने अगस्त 2025 में उनके निधन के बाद सर्वसम्मति से उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। अब मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान को उनके संघर्षपूर्ण जीवन, आदिवासी चेतना और झारखंड आंदोलन के प्रति देश की कृतज्ञता के रूप में देखा जा रहा है।

Point of View

उनके संघर्ष और समर्पण की राष्ट्रीय पहचान है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का प्रतीक है, बल्कि यह आदिवासी समाज और उनकी आवाज को भी मान्यता देता है।
NationPress
05/02/2026

Frequently Asked Questions

शिबू सोरेन का जन्म कब हुआ?
शिबू सोरेन का जन्म 11 अप्रैल 1944 को हुआ था।
शिबू सोरेन को मरणोपरांत कौन सा सम्मान मिला?
उन्हें मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान दिया गया है।
शिबू सोरेन ने किस आंदोलन का नेतृत्व किया?
उन्हें अलग झारखंड राज्य आंदोलन का प्रमुख नायक माना जाता है।
शिबू सोरेन का निधन कब हुआ?
उनका निधन 4 अगस्त 2022 को हुआ था।
झारखंड विधानसभा ने उन्हें कौन सा प्रस्ताव भेजा?
झारखंड विधानसभा ने उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित किया।
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