क्या स्वामी विवेकानंद के विचारों ने महात्मा गांधी को बदल दिया?
सारांश
Key Takeaways
- स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को प्रेरित किया।
- उनकी सोच स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए महत्वपूर्ण थी।
- महात्मा गांधी पर उनका गहरा प्रभाव था।
- उनके विचार आज भी समाज को प्रेरित करते हैं।
- स्वामी विवेकानंद का जीवन एक प्रेरणा है।
नई दिल्ली, 11 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। किसी भी राष्ट्र के महापुरुष उस देश के लिए एक 'पावर हाउस' के समान होते हैं और भारत के महापुरुष केवल अपने देश के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए 'पावर हाउस' का कार्य करते हैं। स्वामी विवेकानंद ऐसे ही महापुरुष थे, जिनकी संकल्प शक्ति, विचारों की ऊर्जा, आध्यात्मिकता और आत्मविश्वास को 'पावर हाउस' कहा जा सकता है। "उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" स्वामी विवेकानंद के इस प्रकार के कई संदेश देश और दुनिया के लाखों-करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं।
19वीं सदी में भारत में अंग्रेजी शासन का राज था। आजादी की लहर के उस युग में 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ। माता-पिता ने उन्हें नरेंद्र नाम दिया। आगे चलकर वे आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत होकर स्वामी विवेकानंद बने।
कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद के जीवन में 'रोसोगुल्ला' का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें खाने-पीने का बहुत शौक था। इसी शौक के इर्द-गिर्द एक पुस्तक 'स्वामी विवेकानंद: द फीस्टिंग, फास्टिंग मॉन्क' लिखी गई। रोम्या रोलां ने 'लाइफ ऑफ विवेकानंद' में उल्लेख किया है, "स्वामी विवेकानंद का शरीर एक पहलवान की तरह मजबूत और शक्तिशाली था। उनकी लंबाई 5 फीट 8 इंच थी। कभी-कभी विवेकानंद स्वयं को 'मोटा स्वामी' कहकर मजाक करते थे।"
हालांकि, स्वामी विवेकानंद की सोच और दर्शन विश्वबंधुत्व की भावना से भरे हुए थे। वे ऐसा समाज चाहते थे, जहां सत्य का सम्मान हो। सत्य उनके लिए देवता था और वे पूरी दुनिया को अपना देश मानते थे।
9 सितंबर 1895 को श्री आलसिंगा पेरूमल को एक पत्र में उन्होंने लिखा, "मेरे बारे में तुम इतना जान लो कि मैं किसी के कहने पर नहीं चलूंगा। मेरे जीवन का व्रत मैं स्वयं तय करता हूं। किसी राष्ट्र-विशेष के प्रति न मेरा अनुराग है और न विद्वेष। जैसे मैं भारत का हूं, वैसे ही पूरी दुनिया का हूं।"
जब स्वामी विवेकानंद अपने जीवन के चरम पर थे, उस समय भारत ब्रिटिश उपनिवेश था। उन्होंने युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा, "उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। तुम जो सोच रहे हो, उसे अपनी जिंदगी का विचार बनाओ। उसके बारे में सोचो। उसके लिए सपने देखो, उस विचार के साथ जीयो। तुम्हारे दिमाग में, तुम्हारी मांसपेशियों में, तुम्हारी नसों में और तुम्हारे शरीर के हर हिस्से में वो विचार भरा होना चाहिए। यही सफलता का सूत्र है।"
"तुम लोग कमर कसकर काम में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल शुरुआत है, मेरे बच्चों..."
यह स्वामी विवेकानंद ने 1895 में स्वामी ब्रह्मानंद को भेजे पत्र में लिखा था। यह युवाओं को उत्साहित करने और उनमें आत्मविश्वास जागरूक करने के लिए था, ताकि वे बड़ी ऊर्जा और संकल्प के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें और परिवर्तन ला सकें। इन विचारों ने भारत के युवाओं के मन में स्वतंत्रता और स्वाभिमान के बीज बोए। स्वामी विवेकानंद ने भारत के लोगों को अपने देश से प्यार करना सिखाया।
स्वामी विवेकानंद के विचारों की महत्ता को इस प्रकार समझा जा सकता है कि महात्मा गांधी ने उनके साहित्य का अध्ययन किया था। इसके बाद महात्मा गांधी ने लिखा, "मैंने स्वामी विवेकानंद के विचारों को गहराई से समझा और उनके विचारों में उतरने के बाद मेरा देश के प्रति प्रेम एक हजार गुना बढ़ गया।"
स्वामी विवेकानंद के पास 70-80 वर्ष जीने की क्षमता थी, लेकिन उन्होंने पहले ही कह दिया था कि वे 40 की उम्र पूरी नहीं करेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी सच निकली। स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष, 5 महीने और 22 दिन के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया।