तिरुपति लड्डू मिलावट विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका को खारिज किया
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका खारिज की।
- आंध्र प्रदेश सरकार की जांच और एसआईटी की जांच अलग-अलग चलेंगी।
- तिरुपति लड्डुओं में मिलावट के आरोप गंभीर हैं।
- प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच शुरू की है।
- समिति ने 45 दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
नई दिल्ली, 23 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर की गई एक रिट याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय समिति को चुनौती दी गई थी। यह समिति तिरुमाला लड्डुओं के लिए कथित तौर पर मिलावटी घी की आपूर्ति से संबंधित मामले में दोषी अधिकारियों के खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करने के लिए बनाई गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा की जा रही प्रशासनिक जांच और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) अलग-अलग दायरे में कार्यरत हैं। इसलिए, दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चल सकती हैं।
याचिका में कहा गया था कि एक सदस्यीय समिति की जांच, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित एसआईटी की जांच में हस्तक्षेप कर रही है। यह मामला तिरुपति मंदिर में प्रसाद के रूप में दिए जाने वाले लड्डुओं में इस्तेमाल हुए घी में मिलावट के आरोपों से संबंधित है।
याचिका खारिज करते हुए पीठ ने स्पष्ट कहा कि अदालत की चिंता केवल यह है कि दोनों जांच प्रक्रियाओं में कोई टकराव या दोहराव न हो। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास हस्तक्षेप की मांग करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
अपने आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों प्रक्रियाएं कानून के अनुसार सख्ती से जारी रहें। सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यह याचिका पूरी तरह से दुर्भावना से दायर की गई है, ताकि विभागीय कार्रवाई को रोका जा सके।
तिरुपति मंदिर के लड्डू में कथित मिलावट के पीछे मुख्य लोगों की पहचान करने के लिए समिति बनाने का निर्णय 3 फरवरी को मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया था। सरकार ने समिति को 45 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। समिति यह देखेगी कि प्रशासनिक स्तर पर कहां चूक हुई, क्या निर्णय नियमों के अनुसार और सावधानी से लिए गए थे, किन अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी बनती है और उनके खिलाफ क्या अनुशासनात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए। समिति का दायरा केवल प्रशासनिक पहलुओं तक सीमित रहेगा।
इससे पहले 4 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने लड्डू में कथित मिलावट की जांच एक स्वतंत्र एसआईटी को सौंप दी थी, जो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में कार्य कर रही थी। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई की अगुवाई वाली एसआईटी ने 23 जनवरी 2026 को नेल्लोर स्थित एंटी करप्शन ब्यूरो की अदालत में अंतिम चार्जशीट दाखिल की। साथ ही कुछ अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश भी की गई।
चार्जशीट में आईसीएआर के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है। संस्थान ने जुलाई 2024 में टैंकर से लिए गए चार सीलबंद घी के नमूनों की जांच की थी। प्रयोगशाला रिपोर्ट में नमूनों में लार्ड या जानवरों की चर्बी नहीं पाई गई। हालांकि, जांचकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि घी में वेजिटेबल ऑयल और लैब एस्टर का मिश्रण मिलाया गया था, जिसे डेयरी पैरामीटर की केमिकल नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस मामले में धन शोधन निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया है। एजेंसी ने सीबीआई की चार्जशीट के आधार पर जांच शुरू की है।
सूत्रों के अनुसार, इसमें हवाला के जरिए लेनदेन के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि निजी डेयरी कंपनियों और बिचौलियों ने घी के टेंडर और गुणवत्ता मंजूरी से जुड़े टीटीडी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए हवाला चैनलों के माध्यम से रिश्वत पहुंचाई। प्रवर्तन निदेशालय अब पैसों के पूरे लेनदेन की कड़ी और कथित हवाला नेटवर्क की भूमिका की जांच करेगा।