फिस्कल डेफिसिट और रेवेन्यू डेफिसिट: क्या है इन दोनों का अंतर?
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आगामी केंद्रीय बजट 2026 को लेकर बाजार, निवेशक और आम नागरिक सभी की निगाहें सरकार की वित्तीय सेहत पर केंद्रित हैं। बजट में कर और खर्च की घोषणाओं के साथ-साथ कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े होते हैं, जो देश की आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) और रेवेन्यू डेफिसिट (राजस्व घाटा) की होती है। इसलिए इन दोनों के बारे में जानकारी प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है।
फिस्कल डेफिसिट का अर्थ है सरकार के कुल खर्च और उसकी कुल आय (उधारी को छोड़कर) के बीच का अंतर। सरल भाषा में कहें तो यह दर्शाता है कि सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कितनी राशि उधार लेनी होगी। उदाहरण के लिए, यदि केंद्र सरकार एक वर्ष में 50 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है, जबकि टैक्स और अन्य स्रोतों से उसकी आय 35 लाख करोड़ रुपए है, तो फिस्कल डेफिसिट 15 लाख करोड़ रुपए होगा।
फिस्कल डेफिसिट बजट में देखे जाने वाले प्रमुख आंकड़ों में से एक है, क्योंकि यह सरकार के वित्तीय अनुशासन को दर्शाता है। एक कम फिस्कल डेफिसिट यह संकेत देता है कि सरकार अपने खर्च और आय पर नियंत्रण रखती है, जिससे निवेशकों का विश्वास बढ़ता है।
इसके विपरीत, अधिक फिस्कल डेफिसिट का अर्थ है अधिक उधारी, जिससे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और निजी निवेश पर दबाव पड़ सकता है। यह निर्धारित करता है कि सरकार के पास इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं और रक्षा पर खर्च करने के लिए कितनी गुंजाइश है।
सरकार आमतौर पर फिस्कल डेफिसिट को उधारी के माध्यम से पूरा करती है, जिसमें घरेलू बाजार में सरकारी बॉंड जारी किए जाते हैं। इसके अलावा, छोटी बचत योजनाओं और भविष्य निधि से धन लिया जाता है और कुछ हद तक विदेशी उधारी भी की जाती है। आज की अधिक उधारी आने वाले वर्षों में ब्याज का बोझ बढ़ा देती है, जिससे भविष्य के बजट में विकास से जुड़े खर्चों के लिए स्थान कम हो जाता है।
हालांकि, अधिक फिस्कल डेफिसिट हमेशा नकारात्मक नहीं होता। आर्थिक सुस्ती, वैश्विक अनिश्चितता या महामारी जैसी असाधारण परिस्थितियों में सरकार का अधिक खर्च अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है। लेकिन यदि लंबे समय तक फिस्कल डेफिसिट ऊंचा बना रहता है, तो इससे सरकारी कर्ज बढ़ता है और महंगाई तथा ब्याज दरों पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए सरकारें आमतौर पर मध्यम अवधि के लिए फिस्कल कंसोलिडेशन यानी घाटा कम करने का रोडमैप तैयार करती हैं।
दूसरी ओर, रेवेन्यू डेफिसिट उस स्थिति को दर्शाता है जब सरकार का दैनिक खर्च उसकी नियमित आय से अधिक हो जाता है। इसे सरकार के रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (राजस्व व्यय) और रेवेन्यू रिसीप्ट्स (राजस्व प्राप्ति) के बीच के अंतर के रूप में समझा जा सकता है। जब खर्च आय से अधिक होता है, तो रेवेन्यू डेफिसिट दर्ज किया जाता है।
रेवेन्यू रिसीप्ट्स में सरकार की टैक्स से होने वाली आय जैसे इनकम टैक्स, जीएसटी और कॉरपोरेट टैक्स, साथ ही नॉन-टैक्स आय जैसे सरकारी कंपनियों से मिलने वाला डिविडेंड, फीस और ब्याज शामिल होते हैं। वहीं, रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में वे खर्च आते हैं जिनसे कोई स्थायी संपत्ति नहीं बनती, जैसे कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, सब्सिडी, रक्षा खर्च, कल्याणकारी योजनाएं और ब्याज भुगतान।
रेवेन्यू डेफिसिट की गणना सरल है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार का रेवेन्यू खर्च 30 लाख करोड़ रुपए है और रेवेन्यू आय 27 लाख करोड़ रुपए है, तो रेवेन्यू डेफिसिट 3 लाख करोड़ रुपए होगा। बजट में इसे आमतौर पर जीडीपी के प्रतिशत के रूप में दर्शाया जाता है।
रेवेन्यू डेफिसिट सरकार की वित्तीय स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। अधिक रेवेन्यू डेफिसिट यह दिखाता है कि सरकार निवेश के बजाय दैनिक खर्चों के लिए उधारी ले रही है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क और रेल जैसे पूंजीगत खर्चों के लिए उपलब्ध संसाधनों की कमी हो जाती है, जो लंबे समय की आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं।
जब रेवेन्यू डेफिसिट होता है, तो सरकार को उस कमी को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिससे सार्वजनिक ऋण बढ़ता है। लंबे समय तक रेवेन्यू डेफिसिट बने रहने से भविष्य के बजट में ब्याज का बोझ बढ़ता है और निजी निवेश पर असर पड़ सकता है। इसी कारण से बजट विश्लेषक इस बात पर ध्यान रखते हैं कि सरकार अपनी आय बढ़ाने और खर्चों को तर्कसंगत बनाने के लिए क्या कदम उठा रही है।