जब किशोर कुमार और आशा भोसले को रिजेक्शन का सामना करना पड़ा था
सारांश
Key Takeaways
- आशा भोसले का संघर्ष प्रेरणादायक है।
- रिजेक्शन कभी अंत नहीं होता।
- महत्वपूर्ण है धैर्य और मेहनत।
- संगीत में संघर्षों को पार करना आवश्यक है।
- किशोर कुमार और आशा भोसले की जोड़ी अद्वितीय थी।
मुंबई, १२ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। प्रसिद्ध गायक आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन हिंदी सिनेमा और संगीत क्षेत्र के लिए एक बड़ी क्षति है। करीब सात दशकों तक अपनी आवाज से विश्वभर में एक अलग पहचान बनाने वाली आशा भोसले ने अपने करियर की शुरुआत में कई चुनौतियों का सामना किया था।
रोमांटिक और इमोशनल गानों से दर्शकों को भावुक कर देने वाली आशा भोसले को मुंबई आने के बाद कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक दिन, जब उन्हें रिजेक्शन का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने बासी बटाटा वड़ा और चाय के साथ पूरा दिन बिताया।
आशा भोसले ने महज १५ साल की उम्र में मुंबई के फेमस महालक्ष्मी स्टूडियो में गाना गाना शुरू किया था। इस स्टूडियो में जब आशा और किशोर कुमार एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचे, तो उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। माइक की ऊंचाई की वजह से गाना गाने में कठिनाई हो रही थी।
आशा ने एक पोडकास्ट में बताया कि कैसे रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने उनकी आवाज सुनकर चिल्लाया, "ये कैसी आवाज है, नहीं चलेगी!" यह सुनकर दोनों चुपचाप वहां से निकल गए। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी। किशोर कुमार और आशा भोसले महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर बैठे रहे और वहीं से बासी बटाटा वड़ा और चाय मंगवाई।
आशा ने कहा कि गाने की रिकॉर्डिंग में देरी के कारण उन्हें खाने का समय नहीं मिला, लेकिन चार साल बाद दोनों ने नाम कमा लिया। किशोर कुमार एक अभिनेता बन गए और आशा भोसले एक प्रसिद्ध सिंगर। उन्हें फिर से उसी स्टूडियो में गाने के लिए बुलाया गया, जहां पहले वे रिजेक्ट हुए थे।