19 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

असरानी को श्रद्धांजलि: 'शोले' के जेलर से लेकर हर दौर की कॉमेडी के बेताज बादशाह

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
असरानी को श्रद्धांजलि: 'शोले' के जेलर से लेकर हर दौर की कॉमेडी के बेताज बादशाह

सारांश

हिंदी सिनेमा के हास्य सम्राट असरानी अब हमारे बीच नहीं रहे — लेकिन 'शोले' का जेलर, 'चुपके चुपके' की हँसी और दशकों की कॉमिक टाइमिंग उन्हें अमर बनाती है। उनका जाना एक ऐसे युग के अंत का प्रतीक है जब कलाकार छोटे-से किरदार में भी पूरा जीवन भर देते थे।

मुख्य बातें

हिंदी सिनेमा के हास्य अभिनेता गोवर्धन कुमार असरानी का 20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
उनका जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान में हुआ था; उन्होंने FTII, पुणे से अभिनय की शिक्षा ली।
1975 में फिल्म 'शोले' में 'अंग्रेजों के जमाने के जेलर' का किरदार उनकी सबसे अमर पहचान बना।
फिल्म 'आज की ताजा खबर' के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार मिला।
'गुड्डी' , 'बावर्ची' , 'नमक हराम' , 'चुपके चुपके' और 'रफूचक्कर' समेत दर्जनों फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं।

हिंदी सिनेमा के जाने-माने हास्य अभिनेता गोवर्धन कुमार असरानी, जिन्हें दर्शक प्यार से असरानी के नाम से जानते हैं, 20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हो गए। अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग, भावपूर्ण चेहरे के हाव-भाव और अचूक डायलॉग डिलीवरी से उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई, जो आज भी दर्शकों की स्मृतियों में जीवंत है। 1975 में आई ऐतिहासिक फिल्म 'शोले' में उनका 'अंग्रेजों के जमाने के जेलर' का किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार कॉमिक चरित्रों में से एक माना जाता है।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर में एक सिंधी-हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता कालीन और साड़ियों का व्यापार करते थे और परिवार की इच्छा थी कि वे पढ़-लिखकर व्यापार संभालें। किंतु आठ भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर जन्मे असरानी का मन बचपन से ही अभिनय और संगीत की ओर खिंचता था। स्कूली दिनों में नाटकों में सक्रिय भागीदारी और ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी ने उनके भीतर कलाकार को और पुख्ता किया।

मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने अभिनेता बनने का सपना संजोना शुरू कर दिया था। प्रारंभिक प्रयास में वे मुंबई भी पहुँचे, लेकिन सही अवसर न मिलने पर वापस जयपुर लौट आए। हार न मानते हुए उन्होंने पुणे स्थित प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में दाखिला लेकर अभिनय की बारीकियाँ सीखीं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

FTII से प्रशिक्षण के बाद भी फिल्मी दुनिया में पैर जमाना आसान नहीं था। वे हर शुक्रवार पुणे से मुंबई जाते, निर्माताओं के दफ्तरों के चक्कर काटते और काम की उम्मीद लेकर लौट आते। शुरुआत में मिले छोटे-छोटे किरदारों को उन्होंने पूरी निष्ठा और लगन से निभाया।

धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा ने फिल्मकारों का ध्यान खींचा। 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'नमक हराम', 'अभिमान' और 'चुपके चुपके' जैसी चर्चित फिल्मों में उन्होंने यह साबित किया कि किसी किरदार को अमर बनाने के लिए उसका बड़ा होना ज़रूरी नहीं — उसे जीने का अंदाज़ ही असली कला है।

'शोले' का जेलर: एक अमर किरदार

असरानी के करियर का सर्वाधिक चर्चित और यादगार किरदार 1975 में आई फिल्म 'शोले' का जेलर रहा। फिल्म में उनका डायलॉग — 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' — आज भी लोगों की ज़ुबान पर है। इस किरदार में वे एक ऐसे जेलर का रोल निभाते हैं जो खुद को बेहद चालाक और दबंग समझता है, लेकिन उनकी हरकतें दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देती हैं।

गौरतलब है कि यह किरदार भले ही फिल्म का मुख्य पात्र नहीं था, लेकिन असरानी ने इसे इतनी कुशलता से निभाया कि यह हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित हास्य चरित्रों की सूची में शामिल हो गया। यह इस बात का प्रमाण है कि सच्ची प्रतिभा स्क्रीन टाइम की मोहताज नहीं होती।

पुरस्कार और उपलब्धियाँ

फिल्म 'आज की ताजा खबर' में उनके उल्लेखनीय अभिनय के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 'रफूचक्कर', 'बालिका वधू' और 'पति पत्नी और वो' जैसी फिल्मों में भी उनकी कॉमेडी दर्शकों के दिल जीतती रही।

यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में हास्य अभिनय को गंभीर कला के रूप में नहीं देखा जाता था — असरानी ने अपनी कला से उस धारणा को बदला। उनका जाना एक ऐसे युग के समापन का प्रतीक है जब कलाकार स्क्रीन पर हर पल जीते थे। हिंदी सिनेमा की अगली पीढ़ी के कॉमेडियन उनकी विरासत से सीखते रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ कलाकार मुख्य भूमिका के बिना भी दशकों तक दर्शकों के दिलों में राज करते थे। 'शोले' का जेलर महज कुछ मिनटों का किरदार था, फिर भी पचास साल बाद भी वह डायलॉग हर पीढ़ी की ज़ुबान पर है — यह उनकी कला की असली शक्ति का प्रमाण है। आज की ओटीटी-संचालित दुनिया में, जहाँ हास्य अक्सर फार्मूलाबद्ध और त्वरित खपत के लिए बनाया जाता है, असरानी जैसे कलाकारों की गहराई और सहजता दुर्लभ होती जा रही है। उनका जाना एक व्यक्ति का नहीं, एक पूरे अभिनय-दर्शन का विदाई है।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

असरानी का पूरा नाम और जन्म कब हुआ था?
असरानी का पूरा नाम गोवर्धन कुमार असरानी था। उनका जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर में एक सिंधी-हिंदू परिवार में हुआ था।
असरानी का निधन कब हुआ?
असरानी का निधन 20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की आयु में हुआ। वे हिंदी सिनेमा के सबसे प्रिय हास्य अभिनेताओं में गिने जाते थे।
'शोले' में असरानी का कौन-सा किरदार था और वह इतना लोकप्रिय क्यों हुआ?
1975 की फिल्म 'शोले' में असरानी ने 'अंग्रेजों के जमाने के जेलर' का किरदार निभाया था। यह किरदार छोटा होने के बावजूद उनकी कॉमिक टाइमिंग और हाव-भाव के कारण हिंदी सिनेमा का सबसे यादगार हास्य चरित्र बन गया।
असरानी को कौन-सा बड़ा पुरस्कार मिला था?
असरानी को फिल्म 'आज की ताजा खबर' में उत्कृष्ट अभिनय के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार मिला था। यह पुरस्कार हिंदी सिनेमा में उनकी कॉमेडी की विशेष पहचान का प्रमाण था।
असरानी ने अभिनय की पढ़ाई कहाँ से की थी?
असरानी ने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय की बारीकियाँ सीखीं। इससे पहले वे ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेते थे।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 5 महीने पहले
  3. 6 महीने पहले
  4. 9 महीने पहले
  5. 12 महीने पहले
  6. 12 महीने पहले
  7. 12 महीने पहले
  8. 12 महीने पहले