'दायरा' समीक्षा: मेघना गुलजार की 4.5 स्टार फिल्म में करीना-पृथ्वीराज का दमदार अभिनय
सारांश
मुख्य बातें
मेघना गुलजार निर्देशित 'दायरा' एक ऐसी क्राइम थ्रिलर है जो न्याय और कानूनी प्रक्रिया के बीच की महीन रेखा को बड़ी सावधानी से पर्दे पर उकेरती है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म 18 सितंबर 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है और पहली नज़र में ही इस वर्ष की सबसे प्रभावशाली हिंदी फिल्मों में से एक बनने की दावेदार लगती है। राष्ट्र प्रेस की समीक्षा में इसे 4.5 स्टार दिए जा रहे हैं।
कहानी का केंद्रीय संघर्ष
फिल्म की कहानी डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) और डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। एक गंभीर दुष्कर्म का मामला दोनों को एक साथ लाता है, लेकिन न्याय की उनकी परिभाषाएँ परस्पर विरोधी हैं। रमन का मानना है कि जघन्य अपराध के दोषियों को कठोरतम सज़ा मिलनी चाहिए, भले ही इसके लिए परंपरागत कानूनी प्रक्रिया की सीमाएँ क्यों न लाँघनी पड़ें। दूसरी ओर, अजूनी को एक मुठभेड़ की जाँच और उसकी परिस्थितियों को समझने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
जो शुरुआत में एक सीधी जाँच लगती है, वह धीरे-धीरे पुलिस के अधिकार, सबूत, जनदबाव और उस सामाजिक नज़रिए पर गहरे सवाल उठाने लगती है जिसके तहत पीड़ित महिलाओं को भी समाज के फैसले का सामना करना पड़ता है। फिल्म के केंद्र में एक असहज लेकिन ज़रूरी सवाल हर वक्त बना रहता है — जब न्याय मिलने में बहुत देर हो जाए, तो वह प्रतीक्षा खुद एक अन्याय कैसे बन जाती है?
करीना और पृथ्वीराज का अभिनय
करीना कपूर खान ने डीसीपी अजूनी कोहली के किरदार में करियर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में से एक दी है। उनके अभिनय में न अनावश्यक आक्रामकता है और न भावनाओं का अतिरेक। बॉडी लैंग्वेज, मौन और शांत अधिकार के ज़रिए वह एक ऐसी अधिकारी को जीवंत करती हैं जिसने वर्षों तक व्यवस्था को भीतर से समझा है। अजूनी को रूढ़िवादी 'कठोर महिला पुलिस' की छवि से मुक्त रखा गया है — वर्दी के बाहर भी उसकी अपनी पहचान और व्यक्तित्व है, जो किरदार को वास्तविक बनाता है।
पृथ्वीराज सुकुमारन डीसीपी रमन कुमार के किरदार में जरूरी तीव्रता लाते हैं, लेकिन उसे कहीं भी अतिरंजित नहीं होने देते। उनके बोलने, प्रतिक्रिया देने और टकराव से निपटने के तरीके में एक अंदरूनी दृढ़ता लगातार महसूस होती है। दोनों के बीच का पेशेवर संघर्ष फिल्म के सबसे रोमांचक हिस्सों में से एक बन जाता है — यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि कानून और सज़ा की दो अलग-अलग व्याख्याओं का टकराव है।
निर्देशन और पटकथा
मेघना गुलजार ने लगातार ऐसी कहानियाँ चुनी हैं जहाँ निजी फैसले व्यापक सामाजिक मुद्दों से टकराते हैं — 'दायरा' भी इसी परंपरा को आगे ले जाती है। मेघना गुलजार, सीमा अग्रवाल और यश केसवानी की पटकथा मामले के आसान जवाबों की तरफ जल्दबाजी नहीं करती। जाँच को धीरे-धीरे आगे बढ़ने देती है और जटिलताओं को स्वाभाविक रूप से उभरने का समय देती है।
फिल्म की उल्लेखनीय बात यह है कि यौन हिंसा को महज़ दर्शकों को चौंकाने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया गया — बल्कि उसके बाद की घटनाओं, संस्थागत प्रतिक्रिया और सामाजिक धारणा पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सहायक कलाकारों में कनवलजीत सिंह, तृप्ति खामकर और क्षिती जोग फिल्म की तनावपूर्ण दुनिया में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाते हैं।
कमज़ोरियाँ
फिल्म पूरी तरह खामियों से मुक्त नहीं है। दूसरे हाफ में मुठभेड़ की जाँच के दौरान कहानी कुछ अधिक तकनीकी और संवाद-प्रधान हो जाती है, जिससे गति थोड़ी धीमी महसूस होती है। कानूनी और प्रक्रियात्मक दृश्यों को कुछ जगहों पर और अधिक स्वाभाविक बनाया जा सकता था। हालाँकि फिल्म के कुल प्रभाव को देखते हुए ये कमियाँ अपेक्षाकृत मामूली हैं।
फैसला
'दायरा' आसान जवाब देने की बजाय दर्शकों के सामने असहज सवाल रख देती है और उन्हें अपने-अपने जवाब तलाशने के लिए छोड़ देती है — यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। मज़बूत अभिनय, संयमित निर्देशन और समकालीन प्रासंगिकता के साथ यह फिल्म सिनेमाघर में जाकर देखने का एक सार्थक अनुभव है। फिल्म का निर्माण जंगली पिक्चर्स और डॉ. जयंतीलाल गड़ा (पेन स्टूडियोज़) ने किया है और वितरण पेन मरुधर द्वारा किया गया है।