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गवरी देवी: राजस्थान की मरू कोकिला, जिन्होंने लोक गायन शैली मांड को नई पहचान दी

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गवरी देवी: राजस्थान की मरू कोकिला, जिन्होंने लोक गायन शैली मांड को नई पहचान दी

सारांश

गवरी देवी, जिन्हें राजस्थान की मरू कोकिला के नाम से जाना जाता है, ने पारंपरिक मांड गायन को नई ऊँचाई दी। जानिए उनकी प्रेरणादायक कहानी और संगीत में उनके योगदान के बारे में।

मुख्य बातें

गवरी देवी ने मांड गायन शैली को नई पहचान दी।
उनका जन्म 14 अप्रैल 1920 को बीकानेर में हुआ।
उन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
गवरी देवी का निधन 29 जून 1988 को हुआ।
उन्होंने 'फेस्टिवल ऑफ इंडिया' में भाग लिया।

नई दिल्ली, 13 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राजस्थान की रेतीली भूमि ने अनेक प्रतिभाओं को जन्म दिया है, लेकिन कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो समय की धारा में भी लोगों के दिलों में गूंजती रहती हैं। ऐसी ही एक अमर आवाज थीं गवरी देवी, जिन्हें राजस्थान की मरू कोकिला के नाम से जाना जाता है। उन्होंने राजस्थान की पारंपरिक लोक गायन शैली मांड को नई पहचान दी और इसे देश-विदेश तक पहुँचाया।

उनकी आवाज आज भी राजस्थानी लोक संगीत के प्रेमियों के बीच अत्यधिक प्रसिद्ध है। गवरी देवी ने मांड शैली को एक नई पहचान देकर राजस्थान की लोक परंपरा की समृद्ध व भावपूर्ण झलक को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। जब भी हम राजस्थानी लोक संगीत की चर्चा करते हैं, तो गवरी देवी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। लोकसंगीत की दुनिया में उन्हें न केवल एक गायिका के रूप में बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी सम्मानित किया गया है।

गवरी देवी का जन्म 14 अप्रैल 1920 को बीकानेर में हुआ था। उनके पिता बंशीलाल और माता जमुनादेवी बीकानेर दरबार के प्रसिद्ध गायक थे। उनके घर में ही संगीत का माहौल था, जिससे गवरी देवी की गायकी में रुचि बचपन से ही विकसित हुई। 20 वर्ष की आयु में उनका विवाह जोधपुर के मोहनलाल गमेती से हुआ, लेकिन कुछ समय बाद उनके पति के निधन ने उन्हें अकेले जीवन की चुनौतियों का सामना करने पर मजबूर कर दिया। इसी समय उन्होंने संगीत को अपना सहारा बनाया और पूरी तरह से गायकी में समर्पित हो गईं।

गवरी देवी मुख्य रूप से मांड गायन शैली के लिए प्रसिद्ध हुईं। मांड राजस्थान की एक विशिष्ट और चुनौतीपूर्ण गायन शैली है, जिसमें गहरे भाव और अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने मांड को न केवल संरक्षित किया बल्कि इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। इसके अलावा, वे ठुमरी, भजन और गज़ल गायन में भी निपुण थीं।

साल 1957 में, गवरी देवी ने रेडियो और दूरदर्शन पर मांड गायकी के कार्यक्रमों की शुरुआत की, जो अत्यधिक लोकप्रिय साबित हुए। वे हर साल राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित समारोहों में मांड प्रस्तुत करती थीं। उनकी लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही, उन्होंने ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, बंगाल, केरल, तमिलनाडु जैसे कई राज्यों में अपनी प्रस्तुतियाँ दीं।

1983 में, उन्होंने रूस की राजधानी मॉस्को में भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ में भाग लिया और ‘केसरिया बलम आवो हमारे देश’ गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके योगदान को देश और राज्य दोनों स्तर पर मान्यता मिली। 1980 में उन्हें ‘हूज हू इन एशिया’ में शामिल किया गया। 1986 में, भारत सरकार ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया, जो कलाकारों के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। यह पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरामन ने प्रदान किया था।

उन्हें मरणोपरांत राजस्थान सरकार ने 2013 में राजस्थान रत्न पुरस्कार से नवाजा। गवरी देवी का निधन 29 जून 1988 को हुआ।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो यह दर्शाती है कि कैसे एक कलाकार अपने संघर्षों के बावजूद अपनी कला के माध्यम से समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है। उनकी योगदान केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गवरी देवी का जन्म कब हुआ था?
गवरी देवी का जन्म 14 अप्रैल 1920 को बीकानेर में हुआ था।
गवरी देवी किस गायन शैली के लिए प्रसिद्ध थीं?
गवरी देवी मुख्य रूप से मांड गायन शैली के लिए प्रसिद्ध थीं।
गवरी देवी को कौन सा पुरस्कार प्राप्त हुआ था?
उन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
गवरी देवी का निधन कब हुआ?
गवरी देवी का निधन 29 जून 1988 को हुआ।
गवरी देवी ने किस कार्यक्रम में भाग लिया था?
उन्होंने 1983 में रूस की राजधानी मॉस्को में 'फेस्टिवल ऑफ इंडिया' में भाग लिया था।
राष्ट्र प्रेस
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