क्या जावेद अख्तर के डायलॉग्स ने हिंदी सिनेमा को नया आकार दिया?

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क्या जावेद अख्तर के डायलॉग्स ने हिंदी सिनेमा को नया आकार दिया?

सारांश

जावेद अख्तर का जन्मदिन एक ऐसा अवसर है जब हम उनके अद्वितीय डायलॉग्स की यात्रा पर नजर डालते हैं। उनके और सलीम खान की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार संवाद दिए हैं। आइए जानते हैं उनके कुछ बेहतरीन डायलॉग्स और उनकी महत्वता के बारे में।

Key Takeaways

  • जावेद अख्तर ने कई बेहतरीन संवाद लिखे हैं।
  • उनकी जोड़ी सलीम खान के साथ अद्वितीय रही है।
  • इनकी कलम से निकले डायलॉग्स ने सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • फिल्मों में संवादों का महत्व समझना आवश्यक है।
  • अमिताभ बच्चन के किरदारों में इनका योगदान अद्वितीय है।

मुंबई, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 70 के दशक में, जब हिंदी सिनेमा के सिनेमाघरों में सिर्फ मुख्य नायक के पोस्टर लगे होते थे, तब जावेद अख्तर ने अपनी सफलता की गाथा लिखी और अपने करीबी मित्र सलीम खान के साथ फिल्म उद्योग में छा गए।

आज, 17 जनवरी को जावेद का 80वां जन्मदिन है। इस समय के दौरान, जब अभिनेत्रियों को भी कम ही महत्व दिया जाता था, जावेद और सलीम की कलम ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। आज हम उनके प्रसिद्ध डायलॉग्स के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्होंने अमिताभ बच्चन को पहचान दिलाई, चाहे वह गब्बर का किरदार हो या एंग्री यंग मैन का।

जावेद ने संघर्ष के दिनों में सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। न तो रहने के लिए ठिकाना था और न ही खाने के लिए पैसे। सपनों की नगरी में कदम रखते हुए उन्होंने अपनी मेहनत से अपना करियर बनाया। उन्होंने 1971 में 'अंदाज़' से लेकर 'जंजीर', 'दीवार' और 1975 में आई 'शोले' जैसी फिल्मों में काम किया, जिससे उनकी पहचान बनी।

जावेद का मानना था कि कहानी, कलाकार और संवाद एक साथ मिलकर ही जीवित रहते हैं। अगर इनमें से कोई एक भी कमजोर हो जाए, तो किरदार का अस्तित्व मिट जाता है। उन्होंने अमिताभ बच्चन की 'जंजीर', 'दीवार', 'त्रिशूल', और 'डॉन' में डायलॉग लिखे। फिल्म जंजीर में कहा गया, "जब तक बैठने को ना कहा जाए, शराफत से खड़े रहो। ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं।" फिल्म डॉन में कहा गया, "डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।" और फिल्म दीवार में, "आज खुश तो बहुत होगे तुम!", "मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।" और "मेरे पास मां है।" ये डायलॉग आज भी दर्शकों के बीच गूंजते हैं।

फिल्म शोले के गब्बर के प्रसिद्ध डायलॉग भी इसी जोड़ी ने लिखे। उन्होंने "कितने आदमी थे?", "ये हाथ हमको दे दे ठाकुर!" और "जो डर गया, समझो मर गया।" जैसे सदाबहार डायलॉग्स लिखे। गब्बर को पहचान दिलाने वाले और अमरीश पुरी को 'मोगैंबो' बनाने वाले भी जावेद और सलीम ही थे। उन्होंने "मोगैंबो खुश हुआ!" और फिल्म त्रिशूल में अमिताभ बच्चन का डायलॉग "मेरे जख्म जल्दी नहीं भरते" भी लिखा।

Point of View

जो न केवल फिल्म के किरदारों को जीवंत बनाते हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों में भी गहरी छाप छोड़ते हैं। इनके संवाद आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं, जो सिनेमा के प्रति उनके योगदान को दर्शाते हैं।
NationPress
17/01/2026

Frequently Asked Questions

जावेद अख्तर के कौन से डायलॉग्स सबसे प्रसिद्ध हैं?
जावेद अख्तर के कुछ प्रसिद्ध डायलॉग्स में 'मेरे पास मां है', 'डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है' और 'जब तक बैठने को ना कहा जाए, शराफत से खड़े रहो' शामिल हैं।
जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी ने किस प्रकार का योगदान दिया?
इनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार और आइकॉनिक डायलॉग्स दिए हैं, जो आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं।
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