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जीत की नई बंगाली फिल्म: 'समाज हीरो-विलेन का फैसला बिना सोचे करता है, ध्यान घट रहा है'

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जीत की नई बंगाली फिल्म: 'समाज हीरो-विलेन का फैसला बिना सोचे करता है, ध्यान घट रहा है'

सारांश

जीत की नई फिल्म सिर्फ एक बायोपिक नहीं — यह आईना है उस समाज का जो बिना पूरी कहानी जाने फैसले सुना देता है। अनंत सिंह क्रांतिकारी थे या डाकू? यही सवाल 1960 के कोलकाता की पृष्ठभूमि में जीत को परदे पर जीवंत करना है।

मुख्य बातें

अभिनेता जीत की आगामी बंगाली फिल्म 'केउ बोले बिप्लोबी, केउ बोले डकैत' क्रांतिकारी अनंत सिंह के जीवन पर आधारित बायोग्राफिकल एक्शन ड्रामा है।
फिल्म 1960 के दशक के कोलकाता की पृष्ठभूमि पर है और पथिकृत बसु के निर्देशन में बनी है।
जीत ने कहा कि आज समय की कमी के कारण लोग किसी को भी जल्दी हीरो या विलेन मान लेते हैं।
जीत ने जेन-ज़ी पीढ़ी को समझदार और शानदार बताते हुए उनकी तारीफ की।
फिल्म में मिमी चक्रवर्ती , तोता रॉय चौधरी और कौशिक सेन सहित कई दिग्गज कलाकार हैं।

बंगाली सिनेमा के चर्चित अभिनेता जीत अपनी आगामी बायोग्राफिकल एक्शन ड्रामा 'केउ बोले बिप्लोबी, केउ बोले डकैत' के साथ एक तीखा सामाजिक सवाल उठा रहे हैं — क्या हम किसी इंसान को पूरी तरह समझे बिना ही उसे हीरो या विलेन घोषित कर देते हैं? 11 अगस्त को दिए एक इंटरव्यू में जीत ने इस विषय पर बेबाकी से अपने विचार रखे।

समाज की जल्दबाजी पर जीत का नज़रिया

जीत ने कहा, 'मैं इस बात से सहमत हूं कि समाज अक्सर लोगों को बहुत जल्दी हीरो या विलेन की श्रेणी में रख देता है। इसका कारण समय की कमी है। आज लोगों के पास हर चीज के लिए बहुत कम समय है। इसी वजह से किसी व्यक्ति या घटना को गहराई से समझने के बजाय तुरंत फैसला सुनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।' उनके अनुसार, घटती अटेंशन स्पैन और सूचनाओं की बाढ़ ने मिलकर इस सतही निर्णय-प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है।

युवा पीढ़ी पर सकारात्मक सोच

इसी बातचीत में जीत ने जेन-ज़ी और आने वाली पीढ़ियों की तारीफ भी की। उन्होंने कहा, 'आज की पीढ़ी काफी समझदार और स्मार्ट है। मैं खुद घर पर युवा पीढ़ी के लोगों के साथ रहता हूं और इसलिए मुझे करीब से समझने का मौका मिलता है। इसी अनुभव के आधार पर मैं मानता हूं कि जेनजी और उनसे आगे आने वाली पीढ़ियां कई मामलों में बेहद शानदार हैं।' यह टिप्पणी उस आम धारणा के उलट है जो युवाओं को अधीर या सतही बताती है।

फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि

पथिकृत बसु के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1960 के दशक के कोलकाता की पृष्ठभूमि पर आधारित है और क्रांतिकारी अनंत सिंह के जीवन से प्रेरित है। फिल्म के शीर्षक का अर्थ है — 'कोई उन्हें क्रांतिकारी कहता है, तो कोई डाकू।' अनंत सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मास्टरदा सूर्य सेन के साथ काम किया था। आज़ादी के बाद व्यवस्था से मोहभंग होने पर उन्होंने ताकतवर और भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ साहसिक कदम उठाए — जिन्हें कुछ लोग अपराध मानते हैं और कुछ न्याय की लड़ाई।

कहानी अलग-अलग समयकालों के बीच आगे बढ़ती है। फिल्म में इंस्पेक्टर दुर्गा रॉय अनंत सिंह को पकड़ने की कोशिश करते हैं, जिससे एक तनावपूर्ण आँख-मिचौली का ताना-बाना बुनता है। यह द्वंद्व दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि कानून और न्याय हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते।

स्टारकास्ट

फिल्म में जीत के साथ तोता रॉय चौधरी, कौशिक सेन, रजत दत्त, चंदन सेन, लोकनाथ डे और मिमी चक्रवर्ती महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नज़र आएंगे। यह स्टारकास्ट बंगाली सिनेमा के दिग्गजों का एक दुर्लभ संगम है।

सामाजिक संदर्भ और प्रासंगिकता

यह ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर किसी भी व्यक्ति को रातोंरात 'ट्रेंड' बनाकर महिमामंडित या बर्बाद किया जा सकता है। जीत की फिल्म और उनके विचार इस डिजिटल युग की एक बड़ी विडंबना को रेखांकित करते हैं — जितनी ज़्यादा जानकारी, उतनी कम समझ। गौरतलब है कि बंगाली सिनेमा में ऐतिहासिक और राजनीतिक विषयों पर बनी फिल्में पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बटोर चुकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह फिल्म उस बहस को गहराई देगी या महज़ एक्शन-ड्रामा तक सिमट जाएगी। बंगाली सिनेमा में ऐतिहासिक बायोपिक की समृद्ध परंपरा रही है, और 'केउ बोले बिप्लोबी' उसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है — बशर्ते कि यह किरदार की नैतिक जटिलता को सरल नायक-खलनायक के साँचे में न ढाल दे।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीत की नई फिल्म 'केउ बोले बिप्लोबी, केउ बोले डकैत' किस पर आधारित है?
यह फिल्म क्रांतिकारी अनंत सिंह के जीवन से प्रेरित बायोग्राफिकल एक्शन ड्रामा है, जो 1960 के दशक के कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी है। अनंत सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन में मास्टरदा सूर्य सेन के साथ काम किया था और आज़ादी के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
फिल्म के शीर्षक 'केउ बोले बिप्लोबी, केउ बोले डकैत' का क्या अर्थ है?
इस बंगाली शीर्षक का हिंदी में अर्थ है — 'कोई उन्हें क्रांतिकारी कहता है, तो कोई डाकू।' यह शीर्षक फिल्म के केंद्रीय विचार को दर्शाता है कि एक ही व्यक्ति को समाज के अलग-अलग वर्ग अलग नज़रिए से देखते हैं।
जीत ने समाज की हीरो-विलेन वाली सोच पर क्या कहा?
जीत ने कहा कि समाज अक्सर लोगों को बहुत जल्दी हीरो या विलेन की श्रेणी में रख देता है, क्योंकि आज लोगों के पास हर चीज़ के लिए बहुत कम समय है। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति या घटना को गहराई से समझने के बजाय तुरंत फैसला सुनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
फिल्म में जीत के साथ कौन-कौन से कलाकार हैं?
फिल्म में जीत के साथ तोता रॉय चौधरी, कौशिक सेन, रजत दत्त, चंदन सेन, लोकनाथ डे और मिमी चक्रवर्ती महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं। फिल्म का निर्देशन पथिकृत बसु ने किया है।
जीत ने युवा पीढ़ी के बारे में क्या राय दी?
जीत ने जेन-ज़ी और आने वाली पीढ़ियों की तारीफ करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी काफी समझदार और स्मार्ट है। उन्होंने कहा कि घर पर युवाओं के साथ रहने के अनुभव के आधार पर वे मानते हैं कि यह पीढ़ी कई मामलों में बेहद शानदार है।
राष्ट्र प्रेस
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