नवरात्र पर कंगना रनौत का पारंपरिक शिल्प से सजा लुक, छत्तीसगढ़ में गरबा उत्सव का जश्न
सारांश
मुख्य बातें
भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने 18 अक्टूबर 2026 को नवरात्र के पावन अवसर पर भारत की पारंपरिक शिल्प कला और सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हुए अपना उत्सव मनाया। छत्तीसगढ़ में गरबा फोटोशूट के दौरान उन्होंने पारंपरिक परिधान में अपनी झलकियाँ सोशल मीडिया पर साझा कीं, जो सांस्कृतिक जड़ों के प्रति उनके जुड़ाव को दर्शाती हैं।
इंस्टाग्राम पर साझा किया बीटीएस वीडियो
कंगना ने इंस्टाग्राम पर फोटोशूट के 'बिहाइंड-द-सीन्स' (बीटीएस) पल साझा करते हुए लिखा, 'हमारे अपने पारंपरिक शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को पहनना बहुत खुशी की बात है। गरबा उत्सव के लिए छत्तीसगढ़ में होना भी बहुत अच्छा लग रहा है।' उन्होंने इस वीडियो में खुद को पारंपरिक परिधान में अलग-अलग पोज देते और नृत्य करते हुए प्रस्तुत किया।
परिधान और आभूषण — विरासत की झलक
'तनु वेड्स मनु' और 'क्वीन' जैसी फिल्मों में अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवा चुकीं कंगना ने इस अवसर पर कई रंगों वाला भारी कढ़ाई का लहंगा-चोली पहना। उनके लुक को काली चूड़ियों और चाँदी के आभूषणों ने और भव्य बना दिया। फोटोशूट में जोड़े गए गाने 'नगाड़ा संग ढोल' को संजय लीला भंसाली ने कंपोज किया है, जिसे श्रेया घोषाल और उस्मान मीर ने गाया है तथा बोल सिद्धार्थ-गरिमा ने लिखे हैं।
नवरात्र और स्त्री शक्ति पर कंगना का संदेश
कंगना ने नवरात्र के आध्यात्मिक महत्व पर एक भावपूर्ण संदेश भी साझा किया। उन्होंने कहा, 'नवरात्र स्त्रीत्व का उत्सव है और गरबा जीवन का नृत्य है। इन सबके केंद्र में देवी (शक्ति) हैं। नवरात्र की शुभकामनाएं।' गौरतलब है कि शारदीय नवरात्र 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ हुई थी और यह 20 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) के साथ संपन्न होगा।
साथियों की प्रतिक्रिया
कंगना की इस पोस्ट पर फिल्म जगत के कई दिग्गजों ने प्रतिक्रिया दी। अभिनेता अनुपम खेर ने टिप्पणी करते हुए लिखा, 'आप सबसे बेहतरीन हैं।' इसके अलावा, अन्य साथियों ने भी इमोजी के ज़रिए अपना स्नेह व्यक्त किया।
हिमाचली जड़ों से गहरा नाता
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के भांबला गाँव से ताल्लुक रखने वाली कंगना अपनी हिमाचली जड़ों पर गर्व करती हैं। वे नवरात्र जैसे हिंदू त्योहारों पर मंदिरों में जाकर और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अपनी आस्था प्रकट करती रही हैं। यह उत्सव उनकी सांस्कृतिक पहचान और सार्वजनिक छवि दोनों का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।