नवरात्र 2026: राजकोट और जामनगर में महिलाओं का पारंपरिक तलवार रास, 45 साल पुरानी परंपरा जीवंत
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के राजकोट और जामनगर में इस नवरात्र पर्व पर वीरता और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला, जब 13 अक्टूबर 2026 की रात राजपूत एवं क्षत्रिय समाज की महिलाओं ने पारंपरिक तलवार रास की प्रस्तुति दी। हाथों में चमचमाती तलवारें, रंग-बिरंगे परंपरागत परिधान और चेहरों पर आत्मविश्वास की चमक लिए ये महिलाएं मैदान में उतरीं, तो दर्शक अभिभूत हो उठे। यह प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि गुजरात में नवरात्र केवल गरबा और डांडिया तक सीमित नहीं, बल्कि यह पर्व सदियों पुरानी रणशक्ति की स्मृति को भी ताज़ा करता है।
राजकोट पैलेस में क्षत्रिय महिलाओं की तलवारबाज़ी
राजकोट पैलेस के ऐतिहासिक मैदान में पिछले लगभग 18-19 वर्षों से नवरात्र के दौरान क्षत्रिय समाज की महिलाएं तलवार रास की विशेष प्रस्तुति देती आ रही हैं। इस आयोजन को एक सांस्कृतिक संस्था संचालित करती है, जिसका उद्देश्य प्राचीन गरबा और रास संस्कृति को संरक्षित रखना है। इस वर्ष भी बड़ी संख्या में दर्शक दूर-दूर से इस दुर्लभ प्रदर्शन को देखने के लिए राजकोट पहुँचे।
प्रस्तुति में शामिल एक महिला प्रतिभागी ने बताया, 'हमारी संस्था प्राचीन गरबा संस्कृति के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। इसके लिए हमने बहुत मेहनत की है। यहां हमें बहुत अच्छे से सिखाया जाता है। जिन महिलाओं को तलवार चलाना नहीं आता, उन्हें भी बारीकी से प्रशिक्षण दिया जाता है। फिलहाल पैलेस में यह आयोजन बहुत अच्छे से चल रहा है।'
डेढ़ महीने की कठोर तैयारी
इस आयोजन से 15 वर्षों से जुड़ी एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि प्रतिभागी महिलाएं नवरात्रि से लगभग एक से डेढ़ महीना पहले ही अभ्यास शुरू कर देती हैं। उन्होंने कहा, 'पैलेस ग्राउंड में होने वाले इस प्रदर्शन में तलवार के सभी प्रकार के दाँव और स्टंट दिखाए जाते हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि तलवार में वजन होने के कारण पहली बार हाथ में लेने पर पूरे शरीर में दर्द होता है, इसी लिए एक महीने का निरंतर अभ्यास कराया जाता है ताकि प्रस्तुति के दौरान कोई चूक न हो।
जामनगर में आशापुरा गरबी मंडल की 45 साल पुरानी परंपरा
जामनगर की हाथी कॉलोनी स्थित आशापुरा गरबी मंडल में भी इस वर्ष तलवार रास का भव्य प्रदर्शन हुआ, जहाँ युवा लड़कियाँ पारंपरिक परिधानों में सजकर तलवार रास करती दिखीं। मंडल के आयोजक गिरीश पांड्या के अनुसार यहाँ गरबे का आयोजन पिछले 45 वर्षों से हो रहा है, जबकि तलवार रास की परंपरा 20 वर्षों से निभाई जा रही है।
पांड्या ने बताया, 'तलवार रास के ज़रिए महिला सशक्तीकरण का संदेश दिया जाता है। जब महिलाएं देवी जगदंबा के रूप में हाथ में तलवार लेकर रास करती हैं, तो यह उनकी शक्ति, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की क्षमता को दर्शाता है।' उन्होंने बताया कि नवरात्रि से डेढ़ महीना पहले से ही महिलाएं और युवतियाँ अभ्यास शुरू कर देती हैं।
महिला सशक्तीकरण और सांस्कृतिक विरासत का संगम
यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर नई पहलें हो रही हैं। गौरतलब है कि तलवार रास की यह परंपरा राजपूत और क्षत्रिय समाज में सदियों पुरानी रणनीतिक कौशल एवं स्त्री-शक्ति के प्रतीक के रूप में मान्यता रखती है। नवरात्र जैसे धार्मिक पर्व के साथ इसे जोड़ना इसे और भी अर्थपूर्ण बनाता है।
आने वाले वर्षों में इन संस्थाओं की योजना है कि अधिक से अधिक युवतियों को इस विधा से जोड़ा जाए, ताकि यह दुर्लभ परंपरा अगली पीढ़ी तक सहज रूप से पहुँचती रहे।