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जामनगर में 37 वर्षों से जीवंत चारण संस्कृति, त्रिशूल रास से देवी शक्ति की आराधना

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जामनगर में 37 वर्षों से जीवंत चारण संस्कृति, त्रिशूल रास से देवी शक्ति की आराधना

सारांश

जब देशभर में गरबा का स्वरूप बदल रहा है, जामनगर का चारण समुदाय 37 वर्षों से त्रिशूल रास और मनियारो रास की अपनी अनूठी परंपरा थामे खड़ा है — यह महज उत्सव नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतिरोध है।

मुख्य बातें

जामनगर में चारण समुदाय पिछले 37 वर्षों से पारंपरिक गरबा का आयोजन कर रहा है।
'श्री सोनल माता नवरात्रि समिति' और 'सोनल गरबी मंडल' इस उत्सव के संयुक्त आयोजक हैं।
युवतियाँ त्रिशूल रास और पुरुष मनियारो रास के ज़रिए देवी शक्ति की आराधना करते हैं।
आयोजक करना गढ़वी के अनुसार, इस परंपरा का उद्देश्य नई पीढ़ी को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
प्रतिभागी विजया अलाभाई खेलिया ने त्रिशूल रास को 'दिव्य अनुभव' बताया।

जामनगर में नवरात्रि का उत्सव महज आधुनिक गरबा की चकाचौंध तक सीमित नहीं है — यहाँ चारण समुदाय पिछले 37 वर्षों से अपनी पारंपरिक लोक विरासत को अटूट निष्ठा के साथ सँजोए हुए है। 'श्री सोनल माता नवरात्रि समिति' और 'सोनल गरबी मंडल' के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह गरबा समारोह केवल नृत्य का मंच नहीं, बल्कि चारण समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और अटूट भक्ति का जीवंत प्रमाण है। गौरतलब है कि जब देश भर में गरबा का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है, तब यह आयोजन परंपरा और आस्था की रक्षा का प्रतीक बन चुका है।

त्रिशूल रास — शक्ति की आराधना का अनूठा रूप

इस गरबे की सबसे विशिष्ट परंपरा है त्रिशूल रास, जिसमें समुदाय की युवतियाँ हाथों में त्रिशूल लेकर देवी शक्ति के स्वरूप को साकार करती हैं। पुरुष मनियारो रास के माध्यम से वीरता और उत्साह का प्रदर्शन करते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूँजती थाप पर गाए जाने वाले पारंपरिक भक्ति गीत और लोक संगीत दूर-दूर से श्रद्धालुओं को खींच लाते हैं।

बुधवार रात त्रिशूल रास में सहभागी रहीं विजया अलाभाई खेलिया ने कहा, 'हम यहाँ पूरी तरह से पारंपरिक गरबा खेलते हैं और हमारी वेशभूषा भी सबसे अलग है। जहाँ अन्य जगहों पर लोग अलग-अलग आधुनिक शैलियों में गरबा करते हैं, वहीं हम अपनी सदियों पुरानी परंपरा का पालन करते हैं। जब हम हाथों में त्रिशूल लेकर रास करते हैं, तो ऐसा दिव्य एहसास होता है, मानो स्वयं देवी जगदंबा हमारे बीच आ गई हों।'

आयोजन के पीछे की आस्था और मान्यता

सोनल गरबी मंडल के आयोजक करना गढ़वी ने इस परंपरा की धार्मिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए कहा, 'मान्यता है कि जब माता जगदंबा ने राक्षसों का संहार किया था, तब उन्होंने अपने त्रिशूल का प्रयोग किया था। जब भी देवताओं पर संकट आया, उन्होंने व्याकुल होकर देवी की प्रार्थना की और उनके दुखों को हरने के लिए माँ भगवती सामने आईं, जिन्होंने सभी असुरों का विनाश किया। उसी शक्ति स्वरूपा की आराधना हम इस रास के माध्यम से करते हैं।'

नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का संकल्प

करना गढ़वी के अनुसार, इस परंपरा को निरंतर बनाए रखने का मूल उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में लोक संस्कृति के विलुप्त होने की आशंका को देखते हुए 37 वर्ष पूर्व यह प्रयास शुरू किया गया था, जो आज भी उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ जीवित है।

यह ऐसे समय में विशेष रूप से उल्लेखनीय है जब गरबा का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने के बाद भी उसके मूल लोक-रूपों को दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण की ज़रूरत बनी हुई है। चारण समुदाय का यह आयोजन उस कमी को कम करने की एक सामुदायिक कोशिश है।

आगे की राह

समिति का यह उत्सव नवरात्रि के शेष दिनों तक जारी रहेगा। आयोजकों के अनुसार, हर वर्ष इस समारोह में भाग लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है, जो इस सांस्कृतिक मिशन की सफलता का प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो उसके मूल लोक-रूपों का दस्तावेज़ीकरण और राज्य-स्तरीय संरक्षण अभी भी अधूरा क्यों है? चारण जैसे छोटे समुदाय बिना किसी सरकारी सहायता के 37 वर्षों से यह काम कर रहे हैं, जो बताता है कि सांस्कृतिक संरक्षण की असली ज़िम्मेदारी अभी भी समुदायों के कंधों पर है, संस्थाओं के नहीं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर बड़े शहरी गरबा मेलों तक सिमट जाती है — ऐसे सामुदायिक प्रयास अनदेखे रह जाते हैं।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जामनगर में चारण समुदाय का गरबा अन्य जगहों से अलग कैसे है?
जामनगर में चारण समुदाय का गरबा आधुनिक शैलियों की जगह सदियों पुरानी परंपराओं पर आधारित है। इसमें युवतियाँ त्रिशूल रास और पुरुष मनियारो रास प्रस्तुत करते हैं, जो इस समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।
त्रिशूल रास क्या है और इसका धार्मिक महत्व क्या है?
त्रिशूल रास चारण समुदाय का पारंपरिक नृत्य है जिसमें महिलाएँ हाथों में त्रिशूल लेकर देवी शक्ति की आराधना करती हैं। मान्यता है कि माता जगदंबा ने राक्षसों के संहार के समय त्रिशूल का प्रयोग किया था, और इस रास के ज़रिए उसी शक्ति स्वरूपा की पूजा की जाती है।
सोनल गरबी मंडल का यह आयोजन कब से चल रहा है?
'श्री सोनल माता नवरात्रि समिति' और 'सोनल गरबी मंडल' द्वारा यह आयोजन पिछले 37 वर्षों से निरंतर जारी है। आयोजकों के अनुसार इसकी शुरुआत लोक संस्कृति को जीवित रखने के संकल्प के साथ हुई थी।
इस परंपरा को बनाए रखने का उद्देश्य क्या है?
आयोजक करना गढ़वी के अनुसार, इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को चारण समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। आधुनिकता की दौड़ में लोक संस्कृति के लुप्त होने की आशंका के कारण यह प्रयास 37 साल पहले शुरू किया गया था।
मनियारो रास क्या है?
मनियारो रास चारण समुदाय का पारंपरिक पुरुष नृत्य है जो वीरता और उत्साह का प्रतीक है। यह त्रिशूल रास के साथ इस गरबे का अभिन्न हिस्सा है और ढोल-नगाड़ों की थाप पर किया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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